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‘जमाईटोला’ बनते जा रहे झारखंड के ये इलाके, बढ़ी आबादी, बदली डेमोग्राफी...और डरे आदिवासी!

झारखंड के आदिवासी इलाकों में काफी कुछ ऐसा चल रहा है, जिसे संदेह की नजर से देखना जरूरी हो जाता है. ये इलाके उन हिस्सों से सीधे जुड़े हैं, जहां अक्सर सीमा-पार से होने वाली गतिविधियों की खबर आती है. ऊपर से सब सामान्य, लेकिन सतह के नीचे जैसे काफी कुछ खदबदाता हुआ. खतरे की आहट-सा. मामले की पड़ताल हमें 1700 किलोमीटर दूर ले गई. कल आपने आदिवासी जमीनों पर अलग बसाहट पर पढ़ा. आज पढ़िए, विवादित थ्योरी का वो हिस्सा, जिसे लव-जिहाद भी कहा जा रहा है.

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Illustration- Vani Gupta/Aaj Tak
Illustration- Vani Gupta/Aaj Tak

सरहद से सटे इलाकों में घुसपैठ, धर्म परिवर्तन, लव जिहाद, लैंड जिहाद के आरोपों पर संथाल-परगना के तीन जिलों में हमारी पड़ताल जारी है. पिछले हिस्से में आपने पढ़ा कि कैसे आदिवासी लड़कियों से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की शादियां इस इलाके में सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक बदलाव की वजह बन रही हैं और इन्हें लेकर आदिवासी समाज की कैसी चिंताएं हैं. आज पढ़िए, रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा.

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कल की कहानी: आदिवासी दुल्हन, दान की जमीन और हावी होता दीन...झारखंड के इस इलाके में खतरनाक खेल!

‘शादी की अगली सुबह थी. जब नई-नवेली बहू की मुंह दिखाई होती है, मेरे पति ने मुझे एक तोहफा दिया. वे रंजीत कोहली नहीं, रकीबुल हसन थे, और चाहते थे कि मैं भी मुस्लिम हो जाऊं. 40 दिन कैद रही. कुत्ते की छोड़ी दूध-रोटी खाई, मारपीट झेली, और रेप. ससुराल से भागते हुए शरीर पर इतने जख्म थे कि फिर कभी शूटिंग नहीं कर सकी. बाद में जाना, मैं देश की पहली 'लव-जिहाद विक्टिम' थी.’

जुलाई 2014!

अब से ठीक दस साल पहले एक शूटर हुआ करती थीं तारा शाहदेव. रांची का ये तारा दुनिया के आसमान पर जगर-मगर करता, उससे पहले ही एक हादसा हुआ. धर्म छिपाकर शादी. और फिर मजहब बदलने का दबाव. 9 साल चले केस में कई खौफनाक पहलू परत-दर-परत खुलते चले गए.

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तारा और रकीबुल का रिश्ता किए और अनकिए के बीच वो अंधेरी कहानी है, जो अक्सर कही-सुनी जाती हैं. खासकर झारखंड के आदिवासी-बहुल जिलों में.

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इन रास्तों को पार करते हुए हम सीमा के आखिरी हिस्से तक पहुंचे. 

कहानी का अंत 'फिक्स' नहीं. लड़की का मजहब बदल सकता है. उसकी मौत हो सकती है. या फिर वो मोहरा भी बन सकती है.

महीना बदलकर सर्च कीजिए, संथाल-परगना का कोई न कोई किस्सा दिख जाएगा, जो इस तरफ इशारा करता है.

गैर-धर्म में हुई हर असफल प्रेम-कहानी के बारे में आदिवासी युवा यही कह रहे हैं. इसके तार आटे में नमक जितने महीन ढंग से बांग्लादेशी घुसपैठ से भी गुंथे हुए हैं.

ये कहानी है सच और झूठ के बीच ठिठके एक शब्द लव-जिहाद की. बदलकर खो चुके नामों की. और उन कस्बाई किरदारों की, जो 'बदला हुआ नाम' होकर खबरों का हिस्सा बन गए. कुछ और नाम भी हैं. अंकिता, जो पेट्रोल से जला दी गई. रूबिका, जो इलेक्ट्रिक आरी से काट दी गई. और अनाम-नाबालिग, जो चार महीने के गर्भ के साथ फांसी पर लटका दी गई...

झारखंड के संथाल-परगना में कहीं भी जाइए, आदिवासी बुजुर्ग और युवक ये शिकायत करते मिलेंगे.

ये नाकामयाब प्यार भी तो हो सकता है, साजिश नहीं!

शक उछालने पर झुंझलाता हुआ जवाब आता है- हमारे इलाके के इलाके जमाईटोला बन रहे हैं. गांव में एक आता है, हमारी लड़की से शादी करता है और फिर एक-एक करके इतने सारे हो जाते हैं कि हम कम पड़ जाएं. ज्यादा दिन नहीं, जब हमारी बोली-बानी सब छू-मंतर हो जाएगी.

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गुस्से से उबलते इस आदिवासी युवक से मुलाकात से पहले हम दुमका के श्रीअमड़ा गांव पहुंचे. हाईवे से सटी हुई सड़क के बहुत करीब ही एक टूटी हुई झोपड़ी. मौसम के आने-जाने से ज्यादा किसी दर्द में उजड़े हुए लगते इस कच्चे घर के सामने आम का पुराना पेड़.

सितंबर 2022 में इसी पेड़ पर करीब 15 साल की लड़की फांसी से लटकती मिली. आदिवासी समाज की ये बच्ची प्रेग्नेंट थी.

तफ्तीश में कई बातें निकलकर आईं. गरीब घर की नाबालिग मजदूरी के लिए घर छोड़कर वहां आई थी. काम के दौरान ही उसकी मुलाकात अरमान अंसारी से हुई. रिश्ता आगे बढ़ा और नाबालिग गर्भवती हो गई. शादी की बात करने पर अरमान हील-हुज्जत करने लगा. बात इतनी बढ़ी कि ठिकाने लगाने के लिए युवक ने उसकी हत्या कर दी. कत्ल को खुदकुशी दिखाने के लिए लाश पेड़ से ऐसे लटका दी कि पहली नजर में फांसी का भ्रम हो.

इन सबसे ऊपर- हत्या से पहले लड़की का बर्बर बलात्कार भी हुआ था. युवक पकड़ में आ गया. हत्या, रेप और ST-SC एक्ट समेत कई धाराएं लगीं. खबरें बनीं. कहानी खत्म.

यूनिवर्सिटी से कुछ ही किलोमीटर के दायरे में जहां ये घटना हुई, वहां एक मदरसा बना हुआ है. शुक्रवार का दिन. बच्चे नमाज के लिए तैयार हो रहे थे. सामने ही कुर्सी लगाए मौलवी साहब बैठे हुए. आसपास की तस्वीरें लेता देखकर कुछ चौंकन्ने से. हम पूछताछ करें, इसके पहले वे हमसे कई सवाल-जबाव कर डालते हैं.

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इसी पेड़ पर गर्भवती नाबालिग की लाश लटकती मिली.

अब बारी हमारी.

आप लड़की की हत्या के बारे में कुछ जानते हैं! मीडिया में इसे लव-जिहाद कहा गया.

लव-जिहाद क्या होता है. दो लोगों में रिश्ता हुआ. नहीं बनी. अलगाव हो जाएगा. मरना-मारना गलत है. सुकून से मिल-बैठकर अलग होना चाहिए.

वो नाबालिग थी. मरने से पहले रेप भी हुआ था उसका.

अब इसपर मैं क्या कहूं. पुलिस जानती होगी.

आप कभी अरमान अंसारी से मिले थे क्या? आसपास काम करता था. सुनते हैं उसकी भी पढ़ाई मदरसे में हुई थी.

मदरसे से इसका मतलब! यहां साइंस भी होती है, गणित भी, इंग्लिश भी. बच्चे डॉक्टर-इंजीनियर बन रहे हैं. आप कहां की बात कहां जोड़ रही हैं.

जी-जी. हम बस समझना चाहते हैं. मदरसे में आपके पास अभी कितने बच्चे रहते हैं.

तीसेक हैं.

गरीब घरों से हैं क्या?

हां. लेकिन यहां उन्हें कोई दिक्कत नहीं.

आपके पास उनके रहने-खाने के पैसे कहां से आते हैं?

इमदाद (मदद) मिलती है. जिनके पास ज्यादा है, वे देते हैं. हर कोई बूते-भर दे देता है.

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घटनास्थल से कुछ ही मीटर पर बना मदरसा.

मदरसे के रजिस्ट्रेशन का कागज वगैरह भी होगा! और बच्चों के पहचान पत्र.

इस सबका आपसे क्या वास्ता! नमाज का वक्त हो रहा है. भड़कते हुए ही मौलवी साहब हमें विदा कर देते हैं. अपने सामने ही फोटो डिलीट करवाते हुए.

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तीन जिले नापते हुए बहुत से लोगों से मुलाकात हुई. गांव के आदिवासी मुखिया. कथित बाहर से आए लोग. राजनैतिक पार्टियों के लीडर. और पुलिस-प्रशासन के अधिकारी.

ऑफ-कैमरा बात करते हुए पुलिस का एक टॉप सूत्र कहता है- बीते दो दशकों में संथाल-परगना की डेमोग्राफी बहुत तेजी से बदली, इस बात को दस्तावेजों-सबूतों की जरूरत नहीं. कोर्ट में याचिका भी दायर हुई ताकि घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाए. हालांकि इसपर कुछ हुआ नहीं.

आने के बाद अवैध लोग सबसे पहले पहचान पत्र बनाते हैं. दूसरा काम वे यह करते हैं कि यहां की मूल आबादी से जुड़ जाएं. कमजोर घरों की आदिवासी लड़कियां मोहरा बन रही हैं. नब्बे की शुरुआत में 17 हजार से ज्यादा अवैध बांग्लादेशियों की पहचान यहीं हुई थी. उनके वोटिंग राइट तो निरस्त हो गए. लेकिन वे कहां हैं, ये किसी को नहीं पता. वक्त के साथ खतरा बढ़ा है.

लेकिन झारखंड ही क्यों? देश में कई राज्य हैं, जिनके पास ज्यादा पैसे हैं. घुसपैठिए यहां क्यों बसना चाहेंगे? जवाब में तीन कारण गिनाए गए.

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धुलियान घाट से ऐसी नाव पर बैठकर मालदा पहुंचा जाता है.

पहला- राज्य का बॉर्डर बांग्लादेश के पास है. ये सीधे तो नहीं सटता, लेकिन बीच में पश्चिम बंगाल है, जो ब्रिज का काम करता है. कई चरमपंथी थ्रेट यहां एक्टिव हैं, जैसे अंसार-उल-बांग्ला और इस्लामिक स्टेट. ये लोकल चरमपंथियों से मिलकर काम करते हैं.

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PFI घुसपैठियों के आईडी कार्ड बनवाने से लेकर आदिवासी लड़कियों से साठगांठ तक में मॉनिटरी मदद करता था.

लेकिन PFI पर तो झारखंड में बैन लग चुका!

बैन तो साल 2018 में लगा. उसके पहले से काफी कुछ होता रहा. अब भी चोरी-छिपे सब चल रहा है.

यहां बता दें कि 6 साल पहले तत्कालीन रघुबर दास सरकार ने PFI पर देशविरोधी काम करने का आरोप लगाते हुए उसे राज्य में बैन कर दिया था. तब झारखंड हाई कोर्ट ने 'सबूतों की कमी' के हवाले से बैन हटाने की बात की. जस्टिस रंजन मुखोपाध्याय ने नोटिफिकेशन पर सवाल उठाया था, जिसके बाद स्टेट ने दूसरा नोटिफिकेशन जारी करते हुए न केवल झारखंड में संदिग्ध गतिविधियों के सबूत दिए, बल्कि देश में भी एंटी-नेशनल कामों के लिंक्स बताए.

साल 2022 में भारत सरकार ने भी PFI पर UAPA के तहत पांच साल के लिए बैन लगा दिया. फिलहाल ये गुट कहीं भी खुलकर काम नहीं कर रहा. उसके ऑफिस बंद हो चुके हैं.

झारखंड में शरण लेने का दूसरा कारण और खतरनाक है. ये चिकन्स नेक के करीब है. मतलब सिलीगुड़ी के पास लगभग 22 किलोमीटर का दायरा, जो पूर्वोत्तर को बाकी देश से जोड़ता है. अगर ऐसे सेंसिटिव इलाके में अपनी पैठ बना ली जाए तो कई देशविरोधी काम अंजाम दिए जा सकेंगे. ये घुसपैठियों का लॉन्ग-टर्म गोल हो सकता है.

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बसाहट का बदलता चेहरा हर कोने में दिखता है.

तीसरा कारण- झारखंड ऊपरी तौर पर भले गरीब लगे, लेकिन उसके पास मिनरल्स की खान है. यहां वो सारी कहानियां सुनाई गईं, जिसमें लोकल युवती से शादी के बाद उसकी जमीन पर अवैध खनन चल रहा है.

दिक्कत ये है कि बीच-बीच में अवैध खनन का मसला तो उठता है. उसके दूर-दराज के लिंक्स पर भी बात होती रही, लेकिन इसे रोका नहीं जा सका.

ऐसा क्यों?

कहीं न कहीं ऊपर से नीचे तक सबके फायदे जुड़े हैं. आप कागज मांगकर देखिए, कहीं नहीं मिल सकेगा.

पूरे सफर में ये बात बार-बार साबित हुई.

घुसपैठ, साजिशन संबंध बनाने और लोकल राजनीति में घुसने को लगभग सबने एक पैटर्न की तरह लगता माना. लेकिन इस तरह का पक्का डेटा किसी के पास नहीं था, या हमें देने से इनकार कर दिया गया.

केंद्रीय स्तर के एक लीडर, जो इस मामले पर सक्रिय हैं, उन्होंने कहा कि वे इसपर एक श्वेत पत्र जारी करने वाले हैं, जिसमें सब साफ हो जाएगा. लेकिन वे तब तक डेटा नहीं दे सकते.

बहुतों से बातचीत तो की, लेकिन सहमते हुए, और नाम न जाहिर करने की शर्त पर. एक ने यहां तक कह दिया कि ये मामला काजल की कोठरी है. घुसने पर साफ निकलना मुश्किल होगा.

जब हम इस मुद्दे पर काम कर रहे थे, तभी एक साथी को संदिग्ध कॉल आया. कॉलर ने लालच देते हुए उन्हें एक खास इलाके में बुलाया था. 

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अंकिता मामले में दूसरे अभियुक्त नईम अंसारी के पिता.

कथित लव-जिहाद को समझने के लिए हमने दिल्ली से 16 सौ किलोमीटर से भी ज्यादा दूर-दराज की यात्रा की.

इस सिलसिले में हम अंकिता के घर भी पहुंचे. मृतका के पिता और बहन से मुलाकात नहीं हो सकी, लेकिन लौटते हुए एक आरोपी नईम अंसारी उर्फ छोटू के पिता मिले.

वे कहते हैं- मेरा बेटा तो गलत संगत में फंस गया. शाहरूख ने उससे पेट्रोल मांगा था, उसने दे दिया, और जेल पहुंच गया. हम बहुतेरा समझाते थे कि उससे दूर रहे. हमारा मजदूरी-पेंटिंग करने वाला परिवार है. औलाद से दूर रहती मां की आंखें झुलस गईं. मैं खुद झुक गया हूं, वरना ये बाल देख रही हैं, तीन साल पहले काले थे.

नईम ने भले सीधे कुछ न किया हो, लेकिन एक बच्ची तो इतनी बुरी मौत मारी गई!

हां, वो तो है. लेकिन उस बात को लंबा टाइम हो गया. अब सबको आगे बढ़ जाना चाहिए.

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इसी खिड़की से अंकिता पर पेट्रोल फेंका गया था.

मेहंदी की हुई लंबी दाढ़ी वाला ये शख्स बेहद सादगी से बात कर रहा है, बगैर इसकी परवाह कि खुद पुलिस के टॉप अधिकारियों ने उसके बेटे को हत्या का मास्टरमाइंड माना था. नईम पहले भी कई मामलों में फंस चुका है.

जाते हुए कम पढ़ा-लिखा दिखता ये शख्स अनोखी-सी बात कह जाता है- अगर आपकी कोई परछाई न बने, तो मान लीजिए कि आपके आसपास कोई रोशनी नहीं. मेरे बच्चे के बारे में यही सोच लीजिए.

कथित लव-जिहाद में एक नई चीज दिख रही है.

शादीशुदा आदिवासी युवतियां भी घर-परिवार छोड़कर दूसरे रिश्ते में जा रही, या जबरन फंस रही हैं. ऐसा ही एक मामला काठीकुंड थाना के ऐरो गांव में हाल में आया.

फरवरी में यहां की एक आदिवासी लड़की गायब हो गई, जो अस्पताल में रिसेप्शनिस्ट थी. उसके पति बीनू किस्कू इसके बाद से थाने के चक्कर काट रहे हैं. उनका आरोप है कि अस्पताल के डॉक्टर डॉ माजिद अंसारी ने उनकी पत्नी को नौकरी की धमकी देकर संबंध बनाया, और बाद में अपने साथ ले गया.

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बीनू किस्कू की पत्नी फरवरी में अचानक गायब हो गईं.

जब हम बीनू के गांव पहुंचे तो वे कागज-पत्तरों से घिरे बैठे थे. ये वो अर्जियां थीं, जो अधिकारियों को भेजी जाएंगी. बीनू कहते हैं- 6 साल से ऐनी साथ रह रही थी. पिछले 11 महीनों में कुछ बदला. वो मुझसे दूर रहने लगी. एक दिन बहुत पूछने पर उसने माना कि डॉ ने उसके साथ संबंध बनाए हैं.

हो सकता है कि ये आपकी पत्नी की भी मर्जी रही हो?

इस बात के जवाब में बीनू एक वीडियो दिखाते हैं. पति-पत्नी की बातचीत. इसमें युवती मान रही है कि 11 महीनों में उसके साथ 3 बार रेप हुआ. वो यही शब्द दोहराती हैं.

वीडियो दिखाते हुए वे कहते हैं- इतने साल हुए, मैं ऐनी को जानता हूं. वो ऐसे ही मुझे छोड़कर नहीं चली जाएगी. वैसे ही हम ट्राइबल्स में उतनी लुका-छिपी नहीं. अगर कोई किसी के साथ नहीं रह सके, तो बोलकर भी जा सकता है. लेकिन ऐनी तो गायब हो गई हैं. उनका मोबाइल बंद है. आखिरी लोकेशन देवघर का बता रहा था. डॉक्टर भी गायब है. उसका लास्ट लोकेशन भी यही था. उसने जरूर कुछ न कुछ किया होगा. डराया-धमकाया या प्रलोभन दिया होगा.

वीडियो मांगने पर देने से मना कर दिया गया. 

बाहर से आकर बसे लोग आदिवासी लड़कियों को टारगेट कर रहे हैं. डॉ अंसारी खुद शादीशुदा थे. बच्चे वाले थे. मेरा घर उजाड़ दिया. ऐनी से भी शादी नहीं करेंगे,  कर भी लें तो यूज करेंगे.

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करीब 25 साल के युवक का चेहरा तमाम बातचीत में अब रोया- तब रोया जैसा हो रहा था.

रुकते हुए वे कहते हैं- ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि आदिवासियों को यहां कई सुविधाएं मिलती हैं. अगर समाज ये फैसला कर ले कि ऐसी लड़कियों का सामाजिक बहिष्कार हो जाएगा, उन्हें एससी-एसटी संरक्षण नहीं मिलेगा, तो ये सब बंद हो जाएगा.

19 फरवरी को हुई रिपोर्ट के बाद केस का स्टेटस कहां तक पहुंचा, ये जानने के लिए हम संबंधित पुलिस अधिकारी को कॉल करते हैं. वे छूटते ही बोलते हैं- उनकी शादी नहीं हुई थी. लिव-इन में रह रहे थे.

अधिकारी ये बात बीनू और ऐनी के लिए कहते हैं, जबकि ट्राइबल्स में ये कॉमन बात है. वे बिना हो-हल्ला मचाए साथ रहने लगते हैं. इस दौरान वे एक-दूसरे को पति-पत्नी के सारे हक देते हैं. बच्चे होने के बाद शादी हो भी सकती है, या इसकी कोई जरूरत भी नहीं.

संथाल-परगना का तौर-तरीका जानने के बाद भी पुलिस अधिकारी ये तर्क देते हैं. स्पीकर पर हो रही बात के दौरान बीनू और उनका परिवार सामने ही थे.

उनके पिता धीमी आवाज में बोल उठते हैं- 6 साल हुए. ऐनी से हमारा इतना प्रेम और अपनापन हो गया था. अब क्या शादी और क्या बिना शादी. हम तो रो भी नहीं पा रहे कि समाज के लोग ठठ्ठा करेंगे. क्या पता, ठठ्ठा कर भी रहे हों.

गांव से निकलते हुए कई घर दिखते हैं. चूने से पुती सफेद दीवारों पर नीले रंग का क्रॉस. गांव में प्राइमरी हेल्थकेयर सेंटर भले न हो, लेकिन छोटा-मोटा चर्च जरूर मिलेगा.

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आदिवासी इलाकों में धर्म की दोहरी मार पड़ी दिखती है.

जब हम पहुंचे तो दुमका में 'हिजला' मेला चल रहा था.

ब्रिटिश जमाने में शुरू ये मेला आदिवासी खूबियों को डिस्प्ले करता था. अब यहां भी दूसरे मजहबों के प्रतीक और कपड़े बिक रहे हैं. मेले में फूल लगाए एक लड़की दिखती है, आदिवासी धज वाली ये लड़की बांस का अचार बेचती हुई. ये वो झलक है, जो कुछ सालों में शायद तस्वीरों में ही बाकी रह जाए.

जाते हुए उस केस के बारे में जानते चलें, जिसे मीडिया ने लव-जिहाद कहा, और अदालत ने साजिश को सही पाते हुए सजा भी सुनाई. नेशनल शूटिंग स्टार तारा शाहदेव और रकीबुल हसन का मामला. तारा से फोन पर बात हुई.

वे याद करती हैं- मां को खोने के तुरंत बाद रकीबुल से मेरी मुलाकात हुई. मिलाने वाले ने उसका नाम रंजीत बताया. हिंदू रीति-रिवाजों से शादी हुई. लेकिन ससुराल आते ही पता लगा कि वो मुस्लिम है. निकाह के लिए काजी बुलवाया गया, जिसने मेरा नाम तारा से सारा करना चाहा. यहां मैं अड़ गई. बस, इसके बाद टॉर्चर का जो दौर शुरू हुआ, वो 40 दिन चला, जब तक कि मैं घर से निकल नहीं भागी.

आप तो खुद नेशनल स्तर की शूटर थीं, आम लड़की नहीं. विरोध क्यों नहीं किया?

वो धमकी देते कि मुंह खोलोगी तो भाई को रेप केस में फंसा देंगे. या झूठे आर्म्स केस में फंसा देंगे. रास्ता चलते तुम्हारे पिता का एक्सीडेंट हो जाएगा. स्पीकर पर बातचीत होती. दिनभर घर में बॉडीगार्ड्स रहते. मेरे सारे कागजात उसके पास थे. चूक की कहीं कोई गुंजाइश नहीं.

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शूटर तारा शाहदेव.

लेकिन आपसे शादी करने का कोई तो मकसद रहा होगा!

हां. वो कहते थे कि शूटर हो, सही समय पर इस्तेमाल करेंगे. धर्म बदलकर साथ रहो, चैन से रह सकोगी. लेकिन विरोध किया तो बेच दी जाओगी. तुम्हारा पासपोर्ट भी हमारे पास है. पुलिस से लेकर जज भी हमारे साथ हैं. तुम कुछ नहीं कर सकती.

उनकी ये धमकियां सच ही थीं. बहुत ताकतवर लोग थे. रकीबुल के पास अक्सर भारी पैसे आते, जिसके बाद वो देश के कई हिस्सों में जाया करता था. क्या करता था, मुझे नहीं पता. घर पर बड़े-बड़े लोग आते. सब उसकी मुट्ठी में थे. मेरे जैसे लोगों को पता था कि वो एनजीओ चलाता था, लेकिन उसके पीछे कुछ और चल रहा था.

निकलकर भागी तो कोई उम्मीद नहीं थी. पुलिस अस्पताल ले गई, लेकिन उसपर भी दबाव था. वो मुझे वापस लौटाते, तभी मीडिया में खबर आ गई. लोग सपोर्ट में आने लगे. इसके बाद भी जजमेंट आने में 9 साल लग गए. इन सालों में लगातार धमकियां मिलती रहीं, लेकिन हमने हार नहीं मानी.

केस के दौरान ही पहली बार सुना- मैं लव-जिहाद का शिकार थी.

(अगली और आखिरी किस्त: कैसे सख्त चौकसी के बाद भी बांग्लादेश से लोग सीमा पार करते हुए पश्चिम बंगाल होते हुए संथाल-परगना में ठौर ले सकते हैं. कितनी आसान या मुश्किल है ये प्रोसेस. किस तरह धड़ाधड़ पहचान पत्र बनाए जा रहे हैं.)

(साथ में- दुमका से मृत्युंजय कुमार पांडे)

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