बीजेपी के प्रधान मंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से सरदार पटेल की तुलना में पंडित नेहरू को छोटा साबित करने का प्रयास किया है वह निश्चित रूप से अनुचित है. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इन दो बड़े नेताओं की किसी तरह से तुलना नहीं हो सकती. देश के लिए दोनों ने योगदान किया. दोनों की पृष्ठभूमि अलग थी, सोच अलग थी यहां तक कि विचारधारा भी अलग थी लेकिन उनका लक्ष्य एक था.
इतना ही नहीं कई मुद्दों पर दोनों में मतभेद भी रहे लेकिन बहुत ज्यादा मुद्दों पर उनमें सहमति भी थी. सच तो यह है कि सरदार पटेल ने पंडित नेहरू के सम्मान में कभी कोई कमी नहीं होने दी.
इतिहासकार बताते हैं कि कट्टर हिन्दूवादी होने के बावजूद सरदार पटेल ने कभी हिन्दू राष्ट्र की कल्पना नहीं की और हमेशा धर्मनिरपेक्ष भारत की कल्पना की. उर्दू को ऑल इंडिया रेडियो के कार्यक्रमों में हिस्सा दिलाने के लिए उन्होंने पंडित नेहरू का साथ दिया. उन्होंने धर्म निरपेक्षता के कई उदाहरण पेश किए.
गांधी जी की हत्या के बाद उन्होंने आरएसएस की कटु आलोचना भी की और यह एक ऐसा मसला था जिस पर दोनों के विचार एक जैसे थे. हालांकि कश्मीर के मुद्दे पर पटेल और नेहरू के विचार जरा भी नहीं मिलते थे लेकिन उन्होंने उनका साथ दिया और उनके निर्णयों को माना भी.
दोनों में कई बातों में मतभेद था लेकिन एक दूसरे के प्रति एक आदर भाव था. एक प्रधान मंत्री के तौर पर नेहरू ने देश को आगे ले जाने का जो काम किया था, वह हर दृष्टि से प्रशंसनीय था. उन्होंने एक सोशलिस्ट राष्ट्र की परिकल्पना की और देश को उस रास्ते पर ले गए.
उस समय के लिहाज से यह बहुत बड़ी बात थी. देश जिन आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा था उसमें यह रास्ता सबसे अच्छा था. उतनी बड़ी जनसंख्या और सीमित स्रोतों के कारण तब उनका यह कदम बिल्कुल सही था. सरदार पटेल बिजनेस के प्रबल समर्थक थे लेकिन यह नहीं लगता कि वे भारत को एक पूंजीवादी देश बनाने की दिशा में कोई कदम उठाते.
सच तो यह है कि पंडित नेहरू को छोटा करके सरदार पटेल को बड़ा नहीं दिखाया जा सकता. नरेन्द्र मोदी और आरएसएस दोनों ही इस तरह से गुजरात की जनता की सहानुभूति बटोरना चाहते हैं. लेकिन यह बात उतनी ही सच है कि सरदार पटेल और पंडित नेहरू के सपनों के रास्ते पर चलकर ही भारत आज आर्थिक रूप से एक मजबूत राष्ट्र बना है.