6 महीने के अंदर अपने पद से रिटायर होने वाले जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर सुप्रीम कोर्ट में दूसरे नंबर के प्रमुख जज हैं. इन्होंने ही आज चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ मीडिया के सामने आए 4 वकीलों के ग्रुप की अगुवाई की थी. इसके साथ ही उन्होंने अपनी वकालत के करियर में सबसे बड़ी मतभेद को अभूतपूर्व तरीके से सामने रखा.
जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ के साथ मिलकर उन्होंने मीडिया के सामने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सब ठीक नहीं है.
चेलमेश्वर ने कहा कि वह 20 साल बाद यह नहीं सुनना चाहते हैं कि इन चारों जजों ने अपनी आत्मा बेच दी थी. बहुत कुछ जो वांछित नहीं था, वह पिछले कुछ महीनों में घटित हुआ है. इसके साथ ही उन्होंने चीफ जस्टिस मिश्रा पर कई आरोप लगाए.
इसके साथ ही उन्होंने वह लेटर भी सार्वजनिक किया जिसमें उन्होंने कहा था कि केसों को उनकी योग्यता के अनुसार नहीं डील किया गया. जस्टिस चेलमेश्वर सहित 4 जजों ने लेटर में लिखा है कि यह जरूरी सिद्धांत है कि रोस्टर में केसों को उनकी मेरिट के हिसाब से उन्हें सही बेंच दिया जाए, जो जरूरी सदस्यों और उनकी संख्या के स्तर पर खरे उतरे.
जस्टिस चेलमेश्वर सहित 4 जजों ने आरोप लगाया कि हाल के दिनों में इन नियमों का पालन नहीं किया गया. कई महत्वपूर्ण केस, जिनका देश और सुप्रीम कोर्ट पर खुद दूरगामी प्रभाव हो सकता था, वैसे केसों को चीफ जस्टिस द्वारा अपने पसंदीदा बेचों को दिया गया. इसमें तर्कसंगत तरीका नहीं अपनाया गया.
हालांकि यह पहला मामला नहीं है जब जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर ने अपना मतभेद जाहिर किया हो. इससे पहले भी वह कई मामलों में अपनी अलग राय बेबाकी से रख चुके हैं.
बेबाकी से रखते हैं बात
सुप्रीम कोर्ट के वकील अतुल कुमार ने बताया कि जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर सुप्रीम कोर्ट में अपने विचारों और फैसलों को लेकर काफी मुखर हैं. जब प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के खिलाफ पीए संगमा ने पिटीशन दाखिल किया था और उसे तत्कालीन चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर की अध्यक्षता वाली बेंच ने खारिज कर दिया था, तब भी जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर उस फैसले के खिलाफ खड़े होने वाले जज थे.
उस फैसले में 2 मुकाबले 3 जजों के मत ने याचिका को खारिज करने में भूमिका निभाई थी और तत्कालीन चीफ जस्टिस अल्तमस कबीर आखिरी समय में फैसला अपने अनुसार देने में सफल रहे थे. इस मामले में जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर के साथ जस्टिस रंजन गोगोई भी फैसले के खिलाफ थे. फैसले का विरोध करते हुए उन्होंने माना था कि राष्ट्रपति पद के लिए नॉमिनेशन फाइल करते समय प्रणब मुखर्जी ने लाभ का पद बरकरार रखा था.
NJAC केस
शुक्रवार से पहले जिस बड़े केस में जस्टिस चेलमेश्वर ने अपना मतभेद दिखाया था, वह केस जुड़ा था नेशनल जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमिशन एक्ट से. संविधान के 99वें बदलाव के साथ लागू हुए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम से राजनेताओं और सिविल सोसाइटी को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति के मामले में पावर मिल गया था. इस NJAC एक्ट को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच ने 2015 में रद्द कर दिया.
आपको बता दें कि संवैधानिक बेंच के उस फैसले में भी सिर्फ जस्टिस चेलमेश्वर ने एक्ट को रद्द किए जाने का विरोध किया था. उलट फैसला लिखते हुए उन्होंने एक्ट को बरकरार रखा था और कहा था कि उनका मानना है कि कोलेजियम की प्रथा पूरी तरह से अपारदर्शी है और एक दो मामलों को छोड़कर यह आम जनता और इतिहास दोनों के लिए पहुंच से बाहर है.
सुप्रीम कोर्ट के वकील अतुल कुमार ने बताया कि जस्टिस चेलमेश्वर ने कोलेजियम की उन बैठकों में भाग नहीं लिया, जब टीएस ठाकुर चीफ जस्टिस हुआ करते थे. जस्टिस चेलमेश्वर ने उन फाइलों पर तभी दस्तखत किए जब वह कोलेजियम द्वारा उनके पास भेजे जाते थे.
MCI केस
MCI केस में जजों पर घूस लेने का आरोप लगा था. इस केस में भी जस्टिस चेलमेश्वर बाकी अन्य जजों से अलग राय दी थी. इस केस में सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक मामलों को लेकर उन्हें चीफ जस्टिस के साथ ठीक आमने सामने पाया गया.
पिछले साल नवंबर में इस पिटीशन पर सुनवाई करते हुए जस्टिस चेलमेश्वर ने आदेश दिया कि इस मामले में SIT गठित हो या नहीं, इस बात पर विचार करने के लिए पांच सदस्यीय संवैधानिक बेंच का निर्माण हो. हालांकि जब तक जस्टिस चेलमेश्वर इस मामले में अपना आदेश लिख पाते, उनके टेबल पर इस केस को दूसरे बेंच के पास ट्रांसफर करने का आदेश पहुंच गया.
यह आदेश सीधे चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के पास से आया था. जस्टिस चेलमेश्वर ने उस ड्राफ्ट ऑर्डर को अनुलग्नक करते हुए लिखा कि संवैधानिक बेंच बनाने का आदेश चीफ जस्टिस की अनुपस्थिति में भी दिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के वकील अतुल कुमार ने बताया कि यह सुप्रीम कोर्ट के स्थापित नियमों के खिलाफ था.
चीफ जस्टिस मिश्रा ने इस मामले में जस्टिस चेलमेश्वर के आदेश को रिव्यू करने के लिए एक अलग 7 सदस्यीय संवैधानिक बेंच बना दी. इस बेंच में 2 जजों को अयोग्य ठहरा दिया गया, वहीं चीफ जस्टिस मिश्रा समेत पांच जजों ने जस्टिस चेलमेश्वर के आदेश को रद्द कर दिया.
खुद कॉलेजियम के पीड़ित रहे हैं जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर?
जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर 20 अक्टूबर 2011 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया. उनका सर्वोच्च अदालत में पहुंचने का यह फैसला देरी से आना वाला माना जाता है, क्योंकि वह मई 2007 से मार्च 2010 तक गोहाटी हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस रह चुके थे. वहीं सुप्रीम कोर्ट में जज बनाने से पहले उन्हें केरल हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनाकर भेजा गया.
इसके साथ ही जिस सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया, उसने ही जस्टिस दीपक मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया. हालांकि मिश्रा को लिस्टिंग में वरिष्ठता दे दी गई, जिस वह से जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर ने चीफ जस्टिस बनने का चांस गंवा दिया. जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर जहां जून में रिटायर कर जाएंगे, वहीं चीफ जस्टिस मिश्रा अक्टूबर में रिटायर होंगे.
कानूनी सर्किल में इस बात की चर्चा रही है कि जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर कोलेजियम प्रथा के पीड़ित रहे हैं. इस कारण ही जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर इस प्रथा में पारदर्शिता की वकालत करने वाले सबसे बड़े योद्धा हैं. कई का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोलेजियम को लेकर ऑनलाइन जाने के फैसले की वजह भी जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर है, जिन्होंने 23 साल पुराने प्रथा की खुलकर आलोचना की है.
वहीं चीफ जस्टिस को लिखे अपने लेटर में भी चारों जजों ने कुछ नामों का विरोध किया है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के लिए क्लियर किया गया है. NJAC रद्द करने के बाद जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर बनाने की प्रक्रिया में है.
कौन हैं जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर
आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले में जन्मे जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर केरल और गुवाहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं. उन्हें वकालत विरासत में मिली. भौतिकी विज्ञान में स्नातक करने के बाद उन्होंने 1976 में आंध्र यूनिवर्सिटी से कानून की डिग्री हासिल की. 23 जून 1953 को आंध्र प्रदेश में जन्मे जस्टिस चेलमेश्वर 1997 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जज बने थे.
अक्टूबर, 2011 में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे. जस्टिस जस्ती चेलमेश्वर और रोहिंगटन फली नरीमन की 2 सदस्यीय बेंच ने उस विवादित कानून को खारिज किया, जिसमें पुलिस के पास किसी के खिलाफ आपत्तिजनक मेल करने या इलेक्ट्रॉनिक मैसेज करने के आरोप में गिरफ्तार करने का अधिकार था.
उन्होंने इस नियम पर लंबी बहस की बात कही थी. उनके इस फैसले की देशभर में जमकर तारीफ हुई और बोलने की आजादी को कायम रखा. साथ ही, चेलमेश्वर ने जजों की नियुक्ति को लेकर नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइन्ट्मेन्ट्स कमीशन (NJAC) का समर्थन किया, साथ ही वह पहले से चली आ रही कोलेजियम व्यवस्था की आलोचना कर चुके हैं.