कर्नाटक की राजनीति फिर सुर्खियों में है. वहां सरकार तो कांग्रेस-जनता दल (सेकुलर) की है, लेकिन बीजेपी बहुत जल्द 'खुशखबरी' देने की तैयारी में है जैसा कि खुद पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदुयुरप्पा ने कहा है. बीजेपी इसे 'ऑपरेशन लोटस 2.0' का नाम दे रही है, लेकिन एक और नाम मीडिया में काफी चर्चा में है. यह नाम है '19 को 19'. यहां 19 का अभिप्राय 19 जनवरी तक कांग्रेस-जेडीएस के 19 विधायकों को तोड़ लेने की रणनीति से है. इसे ऑपरेशन संक्रांति भी कहा जा रहा है.
खौफ के साए में बीजेपी भी
क्या कांग्रेस-जेडीएस के विधायक टूटेंगे? क्या कर्नाटक में फिर कमल खिलेगा? क्या येदियुरप्पा फिर मास्टर सीट पर काबिज होंगे? ये सारे सवाल सियासी गलियारों में तैर रहे हैं जिसका फलसफा आने में कुछ वक्त लगेगा. मगर कर्नाटक की राजनीति ने लोगों को उस दौर की याद दिला दी है जब पार्टियां डर के साए में अपने विधायकों को होटलों में छुपाती हैं ताकि विरोधी खेमे को उनकी भनक न लगे या विरोधी पार्टियां लालच दिखाकर विधायकों की खरीद-फरोख्त न कर सकें. आज ऐसी ही दशा कर्नाटक में फिर पैदा हो गई है जिसमें कांग्रेस ने अपने विधायकों को मुंबई के एक रिजॉर्ट में 'सुरक्षित' कर रखा है. इसे रिजॉर्ट पॉलिटिक्स कह सकते हैं क्योंकि ऐसा नहीं है कि विधायकों की टूट-फूट का डर सिर्फ कांग्रेस को ही है. बीजेपी भी डर के साए में है, तभी उसने अपने 104 विधायकों को गुरुग्राम के एक होटल में 'सुरक्षित' किया है.
रिजॉर्ट पॉलिटिक्स का नया दौर
कर्नाटक की इस घटना को नया नहीं कह सकते क्योंकि ऐसा पहले भी कई बार हो चुका है. सिर्फ कर्नाटक ही नहीं, इस फेहरिश्त में कई प्रदेश शामिल हैं. तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र भी इस राजनीति के गवाह रहे हैं. हालांकि, इसे शुरू करने का पूरा श्रेय 1984 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनटी रामाराव को जाता है जिन्होंने अपने विधायकों को होटल में छिपा कर बचाया था.
कर्नाटक को इस खेल का माहिर खिलाड़ी माना जाता है. पिछले साल भी ऐसा हाई प्रोफाइल ड्रामा देखने को मिला जब वहां त्रिशंकु जनादेश आया. बीजेपी सरकार बनाने में कुछ सीटों से दूर रह गई और कांग्रेस को लगा कि उसके विधायक टूट सकते हैं, लिहाजा उन्हें बेंगलुरु के एक होटल में छिपाया गया. काफी कोशिशों के बाद कांग्रेस और जेडीएस सरकार बना पाए.
ये वाकया काफी दिलचस्प रहा क्योंकि येदियुरप्पा बहुमत न होने के बावजूद मुख्यमंत्री बनाए गए और उन्हें विश्वास मत साबित करने के लिए 15 दिन का वक्त दिया गया. कांग्रेस को लगा कि उसके विधायक खरीद-फरोख्त के शिकार हो सकते हैं, इसलिए उन्हें रिजॉर्ट में भेज दिया गया. रिजॉर्ट पॉलिटिक्स की इसे इंतहां ही कहेंगे कि केरल सरकार कांग्रेस के समर्थन में खुलकर उतरी और ट्वीट कर विधायकों को केरल के 'खूबसूरत और सुविधा संपन्न' रिजॉर्ट में आने का न्योता दिया. उस वक्त केरल को अपना बिजनेस दिख रहा था जबकि कांग्रेस को किसी सूरत में अपने विधायक बचाने थे.
साल 2011 की एक और घटना सामने है. येदियुरप्पा अपने विश्वस्त विधायकों के साथ रिजॉर्ट में जा बैठे और मांग उठाई कि उनके विधायक तभी समर्थन देंगे जब जगदीश शेट्टार की जगह सदानंद गौड़ा को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. 2012 में भी उन्होंने ऐसा ही किया, लेकिन मामला इस बार उलटा था क्योंकि उन्होंने इस बार गौड़ा को हटाने की मांग की थी. पिछले साल राज्यसभा चुनाव के वक्त जेडीएस ने भी वैसा ही किया जैसा इस बार कांग्रेस कर रही है.
किन-किन प्रदेशों में रिजॉर्ट पॉलिटिक्स
पिछले साल महाराष्ट्र में बीजेपी ने लातूर नगर निगम के 39 पार्षदों को गोवा के एक रिजॉर्ट में रखा. इनमें 34 पार्षद बीजेपी के थे. बीजेपी को डर था कि 21 मई को होने वाले विधान परिषद चुनाव में वे पाला बदल सकते हैं और कांग्रेस को समर्थन दे सकते हैं.
बीते साल तमिलनाडु में भी ऐसा देखने को मिला जब टीटीवी दिनाकरन ने अपने भरोसेमंद विधायकों को होटल में छिपाया ताकि वे पलनीस्वामी या पन्नीरसेल्वम खेमे में न जा सकें. 2017 में भी दिनाकरन ने अपने 18 विश्वस्त विधायकों को रिजॉर्ट में भेजकर सुरक्षित किया.