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मेघालय: कोयला खदान में 70 फुट पानी भरा, 15 दिन से फंसे हैं 15 मजदूर

एनडीआरएफ के पूर्व डीआईजी नवीन कुमार का कहना है कि राज्य सरकार भले ही इसके लिए तैयार न हो लेकिन एनडीआरएफ पूरी तरीके से तैयार है. अगर पानी निकालने की साधन मुहैया कराए जाते तो मजदूरों को खदान से निकालना मुमकिन था.

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बचाव कार्य करती एनडीआरएफ की टीम (फोटो-एएनआई)
बचाव कार्य करती एनडीआरएफ की टीम (फोटो-एएनआई)

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मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले की एक खदान ढहने से उसमें 15 मजदूर फंस गए.  घटना 13 दिसंबर की सुबह की है जब अचानक पानी बढ़ जाने से एक संकरी सुरंग के जरिए खदान में घुसे मजदूर अंदर से बाहर नहीं आ पाए. अब हालात ऐसे हैं कि ये मजदूर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं, न वे खुद वाहर आ पा रहे हैं, न बचावकर्मी अंदर जा पा रहे हैं. खदान में 70 फीट पानी भर गया है जिसे निकालने के लिए 100 हॉर्सपॉवर के 10 पम्प की आवश्यकता है. इस बीच, सरकार ने संसाधन की कमी के चलते रेस्क्यू ऑपरेशन बंद कर दिया है.

मेघालय में हुई इस दुखद घटना में 15 मजदूरों की स्थिति आज वैसी ही है, जैसी हाल ही में थाईलैंड की गुफा में 17 दिनों तक फंसे 12 बच्चों और उनके कोच की थी. फर्क सिर्फ इतना है कि थाईलैंड की दुर्घटना में देश-विदेश की दर्जन भर टीमें बचाव कार्य में जुटी थीं. तमाम स्थानीय और विदेशी मीडिया ने इस मामले को इस कदर चर्चा में ला दिया था कि हर तरफ प्रार्थनाओं का दौर चल पड़ा था. लेकिन मेघालय के इन 15 मजदूरों का रेस्क्यू महज इस वजह से नहीं हो पा रहा है क्योंकि हाई पावर पम्प उप्लब्ध नहीं हैं. बहरहाल इस घटना ने मेघालय में चल रहे प्रतिबंधित 'रैट होल' खदानों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है.

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क्या है रैट होल खनन?

भारत में अधिकांश खनिज राष्ट्रीयकृत हैं और इनका खनन सरकारी अनुमति के बाद ही संभव है. लेकिन पूर्वोत्तर के अधिकांश जनजातीय क्षेत्रों में ऐसी स्थिति नहीं है. संविधान की 6वीं अनुसूची के मुताबिक भूमि और उसमें पाए जाने वाले खनिज का स्वामित्व व्यक्तिगत स्तर पर समुदायों को प्राप्त है. यही वजह है कि इस संवैधानिक अधिकार की आड़ में निजी हितधारक अवैध खदानों का संचालन करते हैं. वहीं देश में अन्य जगहों की तरह पूर्वोत्तर में खुले में कोयले का खनन संभव नहीं है क्योंकि इसकी परत 2 मीटर से भी बहुत पतली है. इसके साथ ही तकनीक का इस्तेमाल अपेक्षाकृत महंगा है. लिहाजा इस तरह की खदानों में खनन का कार्य एक लंबी संकीर्ण सुरंग के जरिए किया जाता है, जिसे रैट होल खनन कहते हैं.

रैट होल खनन में बहुत संकरी सुरंगों की खुदाई की जाती है, जो आमतौर पर केवल 3-4 फीट ऊंची होती हैं जिसमें प्रवेश कर मजदूर (अक्सर बच्चे भी) कोयले की निकासी करते हैं. इन सुरंगों में जाने वाले मजदूरों के पास खुदाई करने वाला औजार और टॉर्च होता है और इन्हें सीढ़ी के जरिए नीचे उतरना होता है. चूंकि मेघालय का यह क्षेत्र देश में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र है लिहाजा इन सुरंगों में फिलसन, अचानक पानी भरने से दुर्घटनाएं सामने आती रहती हैं.

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क्यों प्रतिबंधित है रैट होल खनन?

साल 2014 में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी ने इस तरह की खदानों को अवैज्ञानिक और असुरक्षित मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया था. एनजीटी के पास दायर की गई याचिका में असम दीमासा छात्र संघ और दीमा हसओ जिला समिति ने बताया था कि मेघालय में रैट-होल खनन ने कोपिली नदी (यह मेघालय और असम से होकर बहती है) को अम्लीय बना दिया.

एनजीटी ने अपने आदेश में एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि खनन क्षेत्रों के आसपास सड़कों का उपयोग कोयले के ढेर को जमा करने के लिए किया जाता है जो वायु, जल और मिट्टी में प्रदूषण का एक प्रमुख स्रोत है. इसके अलावा एनजीटी के अनुसार, बरसात के मौसम में रैट-होल खनन की वजह काफी दुर्घटनाएं सामने आईं है. जिसमें खनन क्षेत्रों में जल भराव की वजह से कर्मचारियों, मजदूरों सहित कई अन्य व्यक्तियों की मौत हो गई.

किस हद तक होता है रैट होल खनन?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एनजीटी द्वारा प्रतिबंध के आदेश से पहले मेघालय का सालाना कोयला उत्पादन करीब 6 मिलियन टन था. ऐसा माना जाता है कि इस उत्पादन का ज्यादातर हिस्सा रैट-होल खनन द्वारा प्राप्त होता था. एनजीटी ने केवल रैट-होल खनन पर ही नहीं बल्कि सभी ‘अवैज्ञानिक और अवैध खनन’ पर भी प्रतिबंध लगाया है.

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