केंद्र सरकार ने बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट से कहा कि लोकसभा या राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अनिवार्य संवैधानिक स्थिति नहीं है और इसके लिए दावा करने के लिए किसी भी पार्टी के पास अपेक्षित 55 सीटें नहीं है. चीफ जस्टिस जी. रोहिणी तथा जस्टिस आर.एस. एंडलॉ की खंडपीठ को बताया गया कि नेता प्रतिपक्ष अनिवार्य नहीं है और इसकी नियुक्ति चौथी लोकसभा से शुरू हुई. केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएसजी) संजय जैन ने कोर्ट से कहा कि अतीत में सात बार सदन में नेता प्रतिपक्ष नहीं रहा है.
नेता विपक्ष के लिए जरूरी नहीं न्यूनतम संख्या
उन्होंने कहा कि यह दृष्टिकोण कि नेता प्रतिपक्ष का दर्जा देने का दायित्व सदन के अध्यक्ष के अधीन है, एक मिथक है. वकील इमरान अली ने एक जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के लिए अध्यक्ष को निर्देश देने की मांग की थी, जिसपर कोर्ट सुनवाई कर रहा था.
याचिका में लोकसभा के पहले अध्यक्ष के उस नियम को अमान्य घोषित करने की भी मांग की गई थी, जिसके मुताबिक मुख्य विपक्षी पार्टी होने के लिए 10 फीसदी सदस्य होने की जरूरत बताई गई थी. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने दलील दी कि केंद्रीय सतर्कता आयोग अधिनियम, सूचना का अधिकार अधिनियम, लोकपाल अधिनियम तथा मानवाधिकार अधिनियम में नेता प्रतिपक्ष का होना जरूरी है. एएसजी ने हालांकि दलील दी कि किसी व्यक्ति को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा देना अध्यक्ष के अधिकार के अधीन है और इस मामले में न्यायालय अध्यक्ष को कोई निर्देश नहीं दे सकती. सुनवाई के बाद पीठ ने निर्णय सुरक्षित रख लिया.