पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बीते रविवार मालदा में हुई हिंसा पर पहली बार चुप्पी तोड़ी. ममता ने कहा कि मालदा में हुई घटना सांप्रदायिक हिंसा नहीं थी. ममता के मुताबिक इस मामले को गलत तरीके से पेश किया गया है.
स्थानीय लोगों और बीएसएफ के बीच का मामला
ममता ने अपने बयान में कहा कि असल में यह स्थानीय लोगों और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के बीच का मामला था. हालांकि मामले को संभाल लिया गया है और अब स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है.
क्या था पूरा मामला
बीती 3 तारीख को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में ढाई लाख अल्पसंख्यकों की भीड़ में हिंसा फैल गई. असल में यह भीड़ कथित हिंदू महासभा के नेता कमलेश तिवारी के मोहम्मद पैगंबर पर की गई कथित टिप्पणी के खिलाफ विरोध मार्च निकाल रही थी. लेकिन अचानक हिंसा भड़क गई. इस दौरान करीब दो दर्जन पुलिस की गाड़ियों में आग लगा दी गई. भीड़ ने कथित तौर पर बीएसएफ की एक बस को भी आग लगा दी थी. मामले में पुलिस ने 10 लोगों को गिरफ्तार किया था. सभी को 6 दिन की पुलिस हिरासत में भेजा गया था.
आरएएफ ने संभाला था मोर्चा
हिंसक भीड़ ने कालियाचक के बीडीओ दफ्तर पर भी हमला कर दिया. इसके बाद खालतीपुर रेलवे स्टेशन पर विरोध प्रदर्शन किया गया. जब पुलिस मौके पर पहुंची तो हिंसक झड़प में कई पुलिसवाले भी घायल हो गए. हंगामें की वजह से इलाके में दुकाने भी बंद रही. हिंसक भीड़ ने कथित तौर पर आस-पास के कई घरों में लूटपाट भी की. इसके बाद स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) को बुलाना पड़ा.
मालदा के बाद पूर्णिया में भी भड़की थी हिंसा
रविवार के बाद गुरुवार को पूर्णिया में भी हिंसा भड़क गई थी. जहां ऑल इंडिया इस्लामिक काउंसिल की अगुवाई में मुस्लिम समुदाय के करीब 30 हजार लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया.
प्रदर्शन में शामिल लोग कथित तौर पर विवादित बयान देने वाले कमलेश तिवारी को फांसी दिए जाने की मांग कर रहे थे. इस दौरान कमलेश तिवारी का एक पुतला फूंका गया और फिर हजारों लोगों की भीड़ ने एक पुलिस थाने पर हमला कर दिया. पुलिस ने इस मामले में 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी.