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बीफ बैन: जानिए क्या कहते हैं मुस्लिम विद्वान...

आज़ादी मिलने के बाद भारत में रहने वाले मुस्लिम विद्वानों ने गाय का मांस खाने और बेचने पर रोक लगा दी थी. उन्होंने सभी धर्मों के लोगों की भावनाओं का ख्याल रखे जाने की बात को प्राथमिकता दी थी. अब महाराष्ट्र सरकार ने गाय का मांस खरीदने और बेचने पर प्रतिबंध लगाया है. महाराष्ट्र सरकार के फैसले पर भी मुस्लिम विद्वानों का मत साफ है. वे इसका समर्थन करते नजर आते हैं. हालांकि इस तरह का प्रतिबंध पहले से ही कई राज्यों में जारी है.

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गौवंश की रक्षा पर सभी धार्मिक विद्वान एकमत नजर आते हैं
गौवंश की रक्षा पर सभी धार्मिक विद्वान एकमत नजर आते हैं

आज़ादी मिलने के बाद भारत में रहने वाले मुस्लिम विद्वानों ने गाय का मांस खाने और बेचने पर रोक लगा दी थी. उन्होंने सभी धर्मों के लोगों की भावनाओं का ख्याल रखे जाने की बात को प्राथमिकता दी थी. अब महाराष्ट्र सरकार ने गाय का मांस खरीदने और बेचने पर प्रतिबंध लगाया है. महाराष्ट्र सरकार के फैसले पर भी मुस्लिम विद्वानों का मत साफ है. वे इसका समर्थन करते नजर आते हैं. हालांकि इस तरह का प्रतिबंध पहले से ही कई राज्यों में जारी है.

महाराष्ट्र में 'बीफ बैन' का मामला चर्चा में हैं. सोशल मीडिया में इस पर गहन चिंतन-मनन चल रहा है. कई जाने-माने लोग और अभिनेता भी इस मामले पर खुलकर अपनी राय रख रहे हैं. लेकिन देश के मुस्लिम विद्वान इस मामले को बहस का मुद्दा नहीं मानते. वे कहते हैं इस तरह की रोक देश के अधिकतर राज्यों में है. इस्लामी विद्वान काजी नदीम अख्तर बताते हैं कि 1947 में देश आजाद होने के साथ ही उस वक्त के जाने-माने मुस्लिम विद्वान शेख-उल-हदीस मौलाना ज़करिया कांधली, मौलाना हुसैन अहमद मदनी और मौलाना इब्राहिम समेत कई इस्लामिक जानकारों की एक कमेटी ने यह तय कर दिया था कि हमारे मुल्क में मुसलमान न तो गाय का मांस खाएंगे और न ही बेचेंगे. देश के कानून का सम्मान करते हुए इस पर सहमती के साथ रोक लगा दी गई थी. काजी नदीम कहते हैं कि पहले से कानून है तो हाल-फिलहाल इस तरह का प्रतिबंध सियासी दावपेंच के अलावा कुछ नहीं.

प्रसिद्ध इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी कहते हैं कि इस मामले पर सीधेतौर पर राय देने का कोई मतलब नहीं है. क्योंकि इस बात का इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है. पहले भी इस तरह का फैसला लिया गया, तब भी हमने कोई रायशुमारी नहीं की. अपनी बात खत्म करते हुए वो कहते हैं कि कोई भी कानूनी फैसला अवाम के जज़्बात को ख्याल में रख कर ही किया जाना चाहिए. ताकि किसी की भावनाएं आहत न हो.

आगरा की एतिहासिक जामा मस्जिद के मुतवल्ली असलम कुरैशी का कहना है कि ऐसा प्रतिबंध पहले से वहां लागू था. यह कोई नई बात नहीं है. हम भी यही मानते हैं कि मजहबी तौर पर किसी के जज़्बातों से खिलावाड़ नहीं होना चाहिए. लेकिन गौवंश के बचाव और उनकी देखभाल के लिए भी कड़े कदम उठाए जाने की ज़रूरत है.

समाजवादी पार्टी से यूपी विधान परिषद के सदस्य उमर अली खान का कहना है कि कानून के तहत वहां की सरकार ने फैसला लिया है. यह जरूरी भी है कि धार्मिक भावनाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए. एमएलसी उमर अली खान दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम मौलाना बुखारी के दामाद भी हैं.

गौरतलब है कि 19 साल पहले बीजेपी-शिवसेना सरकार ने महाराष्ट्र में गौ हत्या पर प्रतिबंध का विधेयक पारित किया था. सोमवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मंजूरी के बाद वो कानून बन गया. नए कानून के मुताबिक गौ हत्या अपराध है. गौ मांस बेचने वाले और रखने वाले को पांच साल तक की जेल और दस हजार तक का जुर्माना हो सकता है. वैसे तो 1976 से महाराष्ट्र में गौ हत्या पर प्रतिबंध है. लेकिन फिर भी स्थानीय प्रशासन से 'फिट टू स्लॉटर' सर्टिफिकेट हासिल कर बछड़ों और गायों की हत्या की जा सकती थी.

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