पोरिवर्तन (बदलाव) ने आठ साल बाद बंगाल में फिर दस्तक दी है. आठ साल पहले बंगाल में तीन दशक पुराने लाल की जगह हरे ने रंग जमाया था. अब क्या बंगाल फिर अंगड़ाई लेकर भगवा की ओर रुख कर रहा है? ध्रुवीकरण की धारा के साथ क्या बंगाल इस दिशा में बढ़ रहा है?
पश्चिम बंगाल को अगर पूरे राज्य के तौर पर देखें तो ये बंटा दिखाई दे रहा है. इस विभाजन के कई आयाम हैं और कई दिशाएं. उत्तर बंगाल जहां भगवे में रंगा दिखता है तो दक्षिण बंगाल अब भी खुद को हरा ही देखना चाहता है. जहां तक लेफ्ट के लाल रंग का सवाल है तो ये अब भी राज्य के कुछ पॉकेट्स में छिटका दिखाई देता है. ये वो पॉकेट्स हैं जो अब भी लेफ्ट के साथ वफ़ादारी दिखाना चाहते हैं. वोटिंग पैटर्न को देखा जाए तो हिन्दू और मुस्लिम वोटरों के कमोवेश विपरीत दिशाओं में जाना साफ दिखता है. इसके अलावा भी बंगाल में कुछ विभाजन दिखाई दिए.
बंगाली और गैर बंगाली
स्थानीय और बाहरी
टीएमसी समर्थक और टीएमसी विरोधी
लेकिन इन सबसे अलग बंगाल से जो गूंज सबसे ज्यादा नारों के तौर पर सुनाई दे रही है वो ‘जय श्रीराम’ और इसके जवाब में ‘जय हिन्द’ या ‘जय बांग्ला’!
चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल ने हिंसा की अनेक घटनाओं को देखा. तो क्या धार्मिक ध्रुवीकरण ही राज्य में निकट भविष्य में चुनावी सफलता की कुंजी बनेगा.
2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने राज्य से 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटों पर जीत हासिल कर सफलता की नई इबारत लिखी. मुस्लिम वोटरों में 63% ने टीएमसी और हिन्दू वोटरों में से 51% ने बीजेपी को वोट दिया. हक़ीक़त तो ये है कि आज़ाद भारत में बंगाल में पहले कभी इस तरह का ध्रुवीकरण नहीं दिखा.
बीजेपी राज्य के करीब 25 लोकसभा क्षेत्रों के हिन्दू बहुल इलाकों में में हिन्दू वोट बैंक को मजबूत करने के लिए जोरशोर से ‘जय श्री राम’ के नारे का सहारा ले रही है.
बंगाल में इस तरह के परिदृश्य पर सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम कहते हैं- “पहले हम कहा करते थे कि बंगाल जो आज सोचता है वो बाक़ी भारत कल सोचता है. लेकिन अब ममता बनर्जी के शासनकाल में ये उलटा हो गया. अब भारत जो पहले देखता है बंगाल अब देख रहा है. ‘जय श्री राम’ के नारे हम अस्सी दशक के आखिर और नब्बे दशक के शुरू में सुना करते थे लेकिन तब यहां असर नहीं देखा गया. लेकिन अब रामनवमी और हनुमान जयंती पर इसे विवादित बना दिया गया जैसे कि वर्ल्ड कप मैच इंग्लैंड में ना होकर यहां हो रहा हो. ‘बीजेपी बनाम तृणमूल’ का ये मैच बंगाल के मूल्यों और संस्कृति को नष्ट कर रहा है. ये बीजेपी बनाम टीएमसी नहीं बल्कि बीजेपी और टीएमसी साथ मिलकर बंगाल की शांति और सौहार्द को पलीता लगा रहे हैं. कभी धर्म के नाम पर तो कभी भाषा के नाम पर वो हमें बांटना चाह रहे हैं. ‘जय श्री राम’ नारे पर किसी का पैतृक अधिकार नहीं है और ना ही ‘जय बांग्ला’ और ‘जय हिन्द’ पर.”
जहां तक ममता बनर्जी का सवाल है तो उन्होंने इसी हफ्ते इफ्तार पार्टियों में हिस्सा लिया. उनके विरोधियों की ओर से ऐसे आरोप लगाए जाते रहे हैं कि मुस्लिम वोटरों को लुभाने के लिए ममता बनर्जी ऐसा करती हैं.
ममता बनर्जी पहले भी इफ्तार पार्टियों में हिस्सा लेती रही हैं लेकिन इस चुनावी सीजन में उन्होंने बीजेपी पर हमला करने के लिए शायरी का सहारा भी लिया. ईद के मौके पर उपस्थित लोगों से ममता ने कहा, “बंगाल की जमीन सबके लिए है, बंगाल की मिट्टी, बंगाल का जल, बंगाल की हवा और बंगाल के फल. बंगाल की ज़मीन नेताजी सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद, रबीन्द्र नाथ टैगोर, काज़ी नज़रूल इस्लाम ने हमें सिखाया कि हम सब एक हैं और हमें डरने की जरूरत नहीं है. हमारे बीच भाईचारा होना चाहिए. हिन्दू का मतलब त्याग, इस्लाम का मतलब ईमानदारी, ईसाई का मतलब प्यार और सिख का मतलब कुर्बानी. यही है हमारा भारत. हम इसकी रक्षा करेंगे. जो भी इसमें दखल देने की कोशिश करेगा वो तबाह हो जाएगा. इसलिए किसी चीज से डरने की जरूरत नहीं. जिस तरह उन्होंने ईवीएम पर कब्जा किया, उसी रफ्तार से वो वापस जाएंगे, जय हिंद, जय बांग्ला, जय भारत, शुक्रिया.”
लोकसभा चुनाव के सात चरण पूरे होने तक ममता बनर्जी ने खुद को इफ्तार पार्टियों से दूर रखा. लेकिन नतीजों के एलान के तत्काल बाद सार्वजनिक तौर पर अपनी पहली उपस्थिति में ही ममता ने साफ किया कि वे इफ्तार पार्टियों में हिस्सा लेना जारी रखेंगी. रमजान के आखिरी हफ्ते में ममता ने जहां कई इफ्तार में हिस्सा लिया वहीं ईद पर साफ और सख्त शब्दों में अपना संदेश दिया. ममता ने हिन्दी के मुहावरे को उद्त करते हुए कहा- “जो हमसे टकराएगा, चूर चूर हो जाएगा.”
इस मौके पर ममता बनर्जी के साथ उनके भतीजे और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी, मंत्री जावेद खान, विधायक इदरीस अली भी मौजूद थे. इस अवसर पर कोलकाता पुलिस कमिश्नर अनुज शर्मा समेत कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को भी देखा गया.
बंगाल में बीजेपी के उभार के लिए राजनीतिक पर्यवेक्षक धार्मिक ध्रुवीकरण को जिम्मेदार ठहराते हैं. इतिहासविद मैदुल इस्लाम कहते हैं, ये चिंता की बात है क्योंकि आज़ादी के बाद पश्चिम बंगाल में अपेक्षाकृत हमेशा शांत माहौल रहा है. लेकिन अब पहली बार दो समुदायों में इतना तनाव देखने को मिला. एक बात साफ है कि दोनों पार्टियां समुदायों के असली मुद्दों के बारे में ज्यादा नहीं जानती. वो आसान किस्म की राजनीति का सहारा ले रहे हैं जिनमें धार्मिक प्रतीकवाद का सहारा लिया जाता है. लेकिन आज जो जरूरत है वो है दोनों समुदायों के बीच वास्तविक संवाद, पड़ोसियों को जानने के लिए सामाजिक पहल और दोनों समुदायों के लोगों की ओर से आगे आकर शांतिपूर्वक एक दूसरे के उत्सवों में शिरकत की. जिस तरह का ध्रुवीकरण बंगाल में दिख रहा है वो वाकई हैरान करने वाला है.”
तृणमूल कांग्रेस की तरफ से कई फैसलों को उनके विरोधी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का नतीजा बताते हैं. जैसे कि इमामों को स्टाइपेंड, मुहर्रम के मद्देनजर दुर्गा विसर्जन के समय को बदलना आदि. बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय से जब पूछा गया कि आप ऐसे आरोपों पर क्या कहेंगे कि आप हिन्दू भावनाओं की राजनीति कर ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं तो उन्होंने कहा, “नहीं हम वैसे नहीं है जो मुहर्रम पर दुर्गा मां के विसर्जन को रोक दें. इसके बाद लोगों को कोर्ट से अपील करनी पड़े और कोर्ट विसर्जन की अनुमति दे. वो (ममता) चुनाव से पहले मस्जिदों में जाती हैं और नमाज पढ़ती हैं. हालांकि मैं कहूंगा कि ये अच्छा है कि वे मिसाल कायम कर रही हैं. लेकिन उन्हें साथ ही मंदिरों में जाना चाहिए. वो धर्मों को बांट रही हैं, हम नहीं. हम हमेशा कहते हैं सबका साथ, सबका विकास.”
राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी का इस विषय में कहना है, “इसे और बड़े आयाम से देखना चाहिए. ये एक तरह का मोबिलाइजेशन है. ऐसे शाब्दिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाए जो बहुत कॉमन हैं और जिन्हें हर कोई जानता है. अगर आप ‘जय श्री राम’ को लें तो ये मूल तौर पर गैर बांग्ला भाषियों के लिए सिग्नल है जिनकी बंगाल में अच्छी संख्या है. अकेले कोलकाता में ही इनकी 60% से ज्यादा आबादी है. ये उनके लिए बहुत अहम है जो बीजेपी के विचार से बहुत प्रभावित हैं, हिन्दू राष्ट्र के विचार से प्रभावित हैं. कुछ बंगाली भी इनमें शामिल हैं. मेरे विचार से ये आह्वान उनके लिए हैं जो बीजेपी से सहानुभूति रखते हैं. वहीं ममता का जहां तक सवाल है, उन्हें साफ़ नहीं है कि कौन सा नारा उनके लिए कारगर रहेगा. जय हिन्द या जय बांग्ला....वो आश्वस्त नहीं हैं कि उनकी राजनीतिक स्थिति क्या है और क्या उनका राजनीतिक नारा है.”
ये सब कुछ वैसा ही है जैसे कि मुर्गी और अंडे में से कौन पहले आया पर होने वाली बहस. ये ढूंढना मुश्किल है कि बीजेपी ने ज्यादा तेजी से ‘जय श्री राम’ के नारे को अपनाया या ममता बनर्जी ने इससे किनारा किया. ये सारा घटनाक्रम ममता बनर्जी को ऐसे दोराहे पर ले आया है जहां मुड़ने के सिर्फ दो ही विकल्प हैं- लेफ्ट या राइट.