ऐसा अक्सर होता है कि अगर किसी चीज को हर रोज किया जाए तो लोग धीरे-धीरे उस पर गौर करना बंद कर देते हैं. पेट्रोल की कीमते बढ़ाने के मामले में केंद्र सरकार ने यही रणनीति अपनाई और लगता है कि उसकी यह तरकीब सचमुच कामयाब रही है.
एक समय था कि पेट्रोल की कीमतों में 50 पैसे या ₹1 की बढ़ोतरी पर भी हंगामा खड़ा हो जाता था और पूरा विपक्ष आसमान सिर पर उठा लेता था, लेकिन आप भी यह सोच कर हैरान हो जाएंगे कि पिछले 2 महीनों में पेट्रोल की कीमतें 5 रुपए 42 पैसे प्रति लीटर बढ़ चुकी है और किसी ने गौर तक नहीं किया. इसकी वजह यह रही कि 16 जून से सरकार ने पूरे देश में तेल की कीमतों के मामले में "डायनामिक फ्यूल प्राइसिंग" लागू किया था. सीधे शब्दों में इसका मतलब यह है कि तेल की कीमतें 16 जून के बाद से हर रोज कच्चे तेल के दाम के हिसाब से बढ़ती या घटती हैं. पहले हर 15 दिन के बाद तेल की कीमतों में कच्चे तेल की कीमत के आधार पर बदलाव किया जाता था.
तेल की कीमतें तय करने के बारे में 16 जून के बदलाव के बाद पहले कुछ दिनों तक तो ग्राहक फायदे में रहे. पहले 13 दिनों तक पेट्रोल की कीमत में धीरे- धीरे 3.45 रुपये पैसे की कमी हुई. वहीं उसके बाद से पेट्रोल की कीमत ऐसे बढ़नी शुरू हुई कि 28 जून से 24 अगस्त के बीच में पेट्रोल की कीमत दिल्ली में ₹5. 42 पैसे बढ़ चुकी है. 28 जून के बाद से पेट्रोल की कीमत एक आध बार बीच-बीच में दो चार पैसे कम जरूर हुई लेकिन अब यह दिल्ली में 68.88 रूपए प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है.
इसी तरह डीजल की कीमत की बात करें तो 1 जुलाई से लेकर 24 अगस्त के बीच में डीजल की कीमत 3 रूपये 72 पैसे प्रति लीटर बढ़ चुकी है. 24 अगस्त को दिल्ली में डीजल की कीमत प्रति लीटर 57. 06 पैसे प्रति लीटर पहुंच चुकी है.
आखिर कीमती में लगातार बढ़ोतरी की वजह क्या है इसे लेकर सभी असमंजस में हैं. जाहिर है इसकी सबसे बड़ी वजह तो अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें हैं. 27 जून को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 45.42 डॉलर प्रति बैरल थी. जो कि 23 अगस्त को बढ़कर 50.51 डॉलर प्रति बैरल पहुंच चुकी है.
हालांकि पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी का एकमात्र कारण कच्चे तेल की कीमतें नहीं है. ग्राहक तक पहुंचने से पहले तेल के ऊपर केंद्र और राज्य सरकारें तरह तरह का टैक्स लगाती हैं. वह कीमतों में बढ़ोत्तरी की वजह बनती है. जैसा कि आपको मालूम होगा कि जीएसटी लागू होने के बावजूद तेल को इसके दायरे से बाहर रखा गया है. ऐसा इसलिए है क्योंकि केंद्र और राज्य सरकार दोनों की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा तेल पर लगाए गए टैक्स से आता है.