काला धन एक बार फिर सुर्खियों में है. सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद सरकार ने एक सीलबंद लिफाफा उसके पास भेजा है जिसे अदालत ने विशेष जांच समिति को सौंप दिया है. इस सूची के बारे में समिति के प्रमुख जस्टिस एमबी शाह का कहना है कि इसमें कुछ भी नया नहीं है. ये वही नाम हैं जो पहले भी समिति के पास आए थे. यानी कि इतने शोर-शराबे के बाद कुछ भी खास हाथ नहीं आया.
इसके पहले भी सरकार ने कुछ नाम बताए थे जिन्हें देखकर कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि वे सभी कारोबारी हैं और ऐसे कारोबारी जिनका काम विदेशों में भी है. उस सूची से सरकार की साख को धक्का पहुंचा क्योंकि लोगों को उम्मीद थी कि ऐसे नाम सामने आएंगे जिन्हें देखकर लोग हैरान हो जाएंगे. ज्यादा उम्मीद तो यह थी कि कई राजनेताओं के नाम भी आएंगे क्योंकि अरुण जेटली ने उस ओर इशारा भी किया था. लेकिन ऐसा कुछ होता नज़र नहीं आ रहा है.
यह बहुत हैरानी और निराशा की बात है क्योंकि बीजेपी ने हमेशा विदेशों में छुपे काले धन का मुद्दा उठाया और उसे राष्ट्रीय पटल पर रखा. अब जबकि वह सत्ता में है तो उसका फर्ज है कि वह विदेशों में छुपे अरबों डॉलर का काला धन भारत में लाने का प्रयास करे. पार्टी को न केवल यह करना होगा बल्कि एक इसके जरिये एक कड़ा संदेश देना होगा कि यहां का पैसा विदेशों में ले जाने वालों की कोई खैर नहीं है. अगर पार्टी देशभक्ति का दंभ भरती है तो उसे कुछ व्यावहारिक कदम उठाने ही होंगे. सिर्फ लकीर का फकीर बने रहने से कुछ नहीं होगा.
लेकिन पार्टी को पहले इस बात का इंतज़ाम करना होगा कि काला धन बने ही नहीं. यानी उसे उन कारणों को खत्म करना होगा जिनसे कारण काला धन पैदा होता है. इसके लिए टैक्स प्रणाली में भी कई सुधार करने होंगे. काला धन का एक कारण है मकानों की खरीदारी में टैक्स चोरी.
इसका कारण है कि राज्य सरकारों ने स्टांप ड्यूटी इतनी ज्यादा रखी हुई है कि लोग मकान के पूरे मूल्य का एक हिस्सा ही बताते हैं. इस कारण बड़े पैमाने पर सफेद पैसा काला हो जाता है. भ्रष्ट राजनेता काम करवाने के एवज में बड़ा कमीशन लेते हैं और वह सारा धन यहां से विदेश चला जाता है. कई उद्योगपति और कारोबारी अपनी आय सही नहीं बताते हैं और उनका भी पैसा काले धन के रूप में विदेशों में जमा हो जाता है. दरअसल भारत से विदेशों में पैसा भेजना या वहां से मंगाना आज भी बहुत आसान है और इसके लिए हवाला कारोबारी बैठे हुए हैं.
अब देखना है कि बीजेपी चुनावी घोषणा पत्र के इस हिस्से को कब और कितनी शिद्दत से लागू कर पाती है. इस पर उसकी प्रतिष्ठा निर्भर करती है और देश की अर्थव्यवस्था का विकास भी. फिलहाल सरकार के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं दिख रही है जिसके इस्तेमाल से काला धन का पता लग जाए और वह बाहर आ जाए. बीजेपी को यह समझना होगा कि जनता के सब्र की भी सीमा होती है और उसका इम्तिहान लेना कोई सही विचार नहीं होगा.