समाचार जगत की सुर्खियों और दिल्ली की चहल-पहल से लंबे समय के आत्मनिर्वासन के बाद बुधवार को अन्ना हजारे की आवाज सुनाई दी. 77 साल के बूढ़े सिपाही ने महाराष्ट्र के अपने गांव रालेगण सिद्धी में कहा कि वे अपनी चेली और मैगसेसे लीग की एक और साथी किरण बेदी के राजनीति में जाने पर कुछ नहीं कहेंगे. साथ ही यह भी कह दिया कि वे लोकपाल का आंदोलन अपने दम पर चला लेंगे. लेकिन क्या वाकई ऐसा हो पाएगा?
PMO की भूल की वजह से हुई थी अन्ना व केजरीवाल की राहें जुदा!
जवाब खोजने से पहले जरा पीछे चलें. लोकपाल तब बड़ा मुद्दा नहीं था. मार्च 2011 में अन्ना ने दिल्ली आकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सूचित किया था कि लोकपाल जल्दी लाएं नहीं तो वे दिल्ली में धरना करेंगे. दिल्ली में उनकी बात को गंभीरता से लेने वाले तब बहुत कम थे. उसके बाद चीजें कैसे बदलीं यह सबको याद है. अप्रैल 2011 में व्यवस्था और हालात से तंग लाखों लोग अन्ना और उनकी कथित टीम में आशा की चिंगारियां देखने लगे. ‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना’ का नशा देश पर छा गया. सरकार उनके सामने झुक गई. जरा-जरा सी बात पर उखड़ जाने वाली संसद इस बूढ़े आदमी पर चर्चा करने के लिए घंटों बैठी रही और गंभीर चर्चा की. सब कुछ ऊपर जाता दिखता रहा.
लेकिन 2012 में अन्ना का अपने साथियों पर ही यकीन कम होता गया. राजनीतिक पर्याय का नारा देने के बाद अन्ना दो दिन बाद अपनी बात से पलट गए. केजरीवाल एंड कंपनी को राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए अकेला छोड़ दिया. केजरीवाल पार्टी बनाकर आगे निकल गए, अन्ना राजनीति करने का वादा करने के बाद ठिठक गए. केजरीवाल की राजनीति परवान चढ़ी तो सबसे पहले उन्होंने आजतक एजेंडा कार्यक्रम में केजरीवाल की जमकर निंदा की. उनके शब्द इतने कठोर हो गए कि खामोश और विनम्र केजरीवाल को उलटे जनता की सहानुभूति मिल गई. लेकिन लोगों ने यही माना कि अन्ना का गुस्सा भावुक है, वे केजरीवाल से ईर्ष्या नहीं कर रहे. लेकिन फिर वह दिन भी आया जब अन्ना ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के पैरोकार दिखाई दिए. और उनके भरोसे जब ममता ने दिल्ली में रैली की तो खाली कुर्सियों की सूचना मिलने पर अन्ना वहां नहीं पहुंचे. ममता खून का घूंट पी कर रह गईं. और लोग भी सोचते रह गए कि अन्ना इतने दुविधामयी क्यों हुए जा रहे हैं.
इसके बाद अन्ना कैमरों से ओझल से हो गए. वक्त बढ़ता रहा. उन्हीं के मंच से उतरे जनरल वी के सिंह भी बीजेपी में जाकर सांसद और फिर मंत्री हो गए. अब किरण बेदी मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हैं. अरविंद, वी के सिंह और बेदी की राह लोगों को समझ आ रही है. ये लोग अपने इरादों के लिए आगे बढ़े जा रहे हैं और जो संसद उनकी नहीं सुनती थी, वहां पहुंचकर वे अपनी कह रहे हैं. अन्ना अब भी राजनीति को अछूत बनाए हुए हैं. लोकपाल पर भी उनकी सक्रियता किसी को दिख नहीं रही. वैसे यह बात भी धीरे-धीरे जाहिर हो गई थी कि अन्ना की टीम की ताकत अन्ना में नहीं थी, बल्कि टीम से अन्ना की ताकत थी. अन्ना इस बात को कभी मन से कबूल नहीं कर सके. उनका बयान महात्मा गांधी के भारत विभाजन से ठीक पहले के बयान की याद दिलाता है जिसमें बापू ने कहा था- ‘मैं हिंदुस्तान की धूल से नया आंदोलन खड़ा कर दूंगा.’ यह बयान तब का था जब नेहरू, पटेल, जिन्ना कोई भी देश के सर्वोच्च नेता की बात मानने की स्थिति में नहीं था. हो सकता है बापू जैसा विराट व्यक्तित्व यह कर भी दिखाता, लेकिन उम्र के 78वें साल में गांधीजी ने अपनी टीम की बात ही मान ली थी. अन्ना अपने हठ पर अड़े हैं और समय का पहिया कहीं का कहीं पहुंच गया है. कभी हजारे के साथ हजारों की भीड़ थी, आज वे अकेले हैं. लेकिन इसकी जिम्मेदारी आखिर उन्हीं गलत कदमों की है जिन्हें उठाकर अन्ना ने बाद में पीछे खींच लिया. शायद संत तुकाराम की जमीन के सिपाही को बनारस के संत कबीर की यह बात बिसर गई - आधा चलकर पीछे मुड़है, हुइहै जग में हांसी.