मंहगाई के दौर में भी लुटियंस की दिल्ली में कॉफी 5 रुपए, चिकन करी 50 रुपए, फिश करी 40 रुपए और शाकाहारी थाली 35 रुपए में मिल जाए तो खाने वाले का जायका जरूर दुगना हो जाएगा. लेकिन खुश होने से पहले ठहरिए...ये सस्ता खाना आम आदमी के लिए नहीं है. इस तक सिर्फ चुनिंदा लोगों की ही पहुंच है. यहां बात हो रही है संसद की कैंटीन की. यहां मिलने वाला खाना बाजार की तुलना में कहीं सस्ता है. आइए पहले संसद की कैंटीन में मिलने वाले खाने की कीमतों पर नजर डाल ली जाए.
ब्रेड एंड बटर- 6 रु
चपाती- 2 रु
चिकन करी- 50 रु
चिकन कटलेट प्लेट- 41 रु
चिकन तंदूरी- 60 रु
कॉफी- 5 रु
डोसा प्लेन- 12 रु
फिश करी- 40 रु
हैदराबादी चिकन बिरयानी- 65 रु
मटन करी- 45 रु
उबले चावल- 7 रु
सूप- 14 रु
संसद की कैंटीन के सस्ते खाने का लुत्फ सांसद और उनके मेहमान, पूर्व सांसद, संसदीय परिसर के अधिकारी- अन्य स्टाफ और वैध पास वाले आगंतुक ही उठा सकते हैं. आम आदमी को इस सस्ते खाने की सुविधा हासिल नहीं है लेकिन वो शिकायत नहीं कर सकता. क्योंकि दावा किया जाता है कि संसद की कैंटीन को करदाताओं के पैसे से सब्सिडी नहीं दी जाती और इन्हें ‘ना फायदा, ना नुकसान’ के आधार पर चलाया जाता है.
बता दें कि वर्ष 2015 में संसद की कैंटीन में सस्ते खाने का मामला खूब सुर्खियों में रहा था. ऐसा इस तथ्य के सामने आने के बाद हुआ था कि संसद की कैंटीन को खाने की लागत पर 80 फीसदी तक की सब्सिडी दी जाती है. उस वक्त लोकसभा में बीजू जनता दल के सदस्य वैजयंत जय पांडा ने इसी मुद्दे पर लोकसभा स्पीकर को चिट्ठी लिखी थी. चिट्ठी में उन्होंने कहा था, ‘जब सरकार आर्थिक रूप से मजबूत लोगों से एलपीजी सब्सिडी वापस करने के लिए कह रही है तो ऐसे में सांसदों से भी कैंटीन में सब्सिडी की वजह से मिल रही सस्ते खाने की सुविधा वापस ले लेनी चाहिए. इस कदम से लोगों में अच्छा संदेश जाएगा और सांसदों पर उनका भरोसा भी बढ़ेगा.’
सांसद की चिट्ठी मिलने के बाद लोकसभा ने इस पर सकारात्मक रुख दिखाया. लोकसभा सचिवालय ने 31 दिसंबर 2015 को इस संबंध में एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया, ‘कमेटी की रिपोर्ट मिलने के बाद स्पीकर ने कई फैसले किए हैं, उनमें सबसे अहम है कि संसद की कैंटीन अब ‘नो प्रॉफिट, नो लॉस’ के आधार पर काम करेगी. बयान में ये भी कहा गया- ‘संसद कैंटीन में मिलने वाली विभिन्न खाद्य सामग्री के दाम बढ़ा दिए गए है. अब इनकी लागत पर जो असल खर्च आएगा, उसी दाम पर इन्हें बेचा जाएगा.’ बयान में इस फैसले को 1 जनवरी 2016 से लागू होना बताया गया.
संसद सचिवालय के बयान के मुताबिक ही संसद की कैंटीन के खाने पर 1 जनवरी 2016 से सब्सिडी खत्म कर दी गई. साथ ही खाने के सामान के दाम बढ़ा दिए गए. इस फैसले के अमल और असर को जानने के लिए इंडिया टुडे ने आरटीआई के जरिए लोकसभा से जानकारी मांगी. लोकसभा सचिवालय से जो जवाब मिला है, उससे हैरान करने वाला संकेत मिलता है कि संसद की कैंटीन के खाने पर सब्सिडी कभी खत्म नहीं की गई. आइए 2013-14 से नजर डालते हैं कि बीते 5 वित्त वर्ष में संसद की कैंटीन को कितनी-कितनी सब्सिडी दी गई.
2012-13– 12.52 करोड़ रु
2013-14- 14.09 करोड़ रु
2014-15- 15.85 करोड़ रु
2015-16- 15.97 करोड़ रु
2016-17 15.40 करोड़ रु
यहां गौर करने वाली बात है कि वित्त वर्ष 2015-16 में सब्सिडी खत्म करने के फैसले वाले साल में 9 महीने तक सब्सिडी रही और 3 महीने बिना सब्सिडी के रहे. इस वित्त वर्ष में कुल 15.97 करोड़ रुपए सब्सिडी दी गई. अगले वित्त वर्ष 2016-17 में जब संसद की कैंटीन को सब्सिडी नहीं दी जानी थी, तब भी 15.40 करोड़ रुपए सब्सिडी दी गई. ये सब्सिडी इससे पहले के वित्त वर्ष 2015-16 की तुलना में महज 57 लाख रुपए ही कम रही. साफ है कि लोकसभा सचिवालय ने 1 जनवरी 2016 से सब्सिडी खत्म करने का जो बयान जारी किया था, उसके मद्देनजर 2016-17 में सब्सिडी शून्य होनी चाहिए थी.
जाहिर है कि सब्सिडी को लेकर आरटीआई से 'इंडिया टुडे' को जो जवाब मिला उसके मुताबिक टैक्सपेयर्स का पैसा अब भी संसद की कैंटीन के खाने को सस्ता रखने पर खर्च हो रहा है जिसका लाभ सांसदों समेत चुनींदा लोगों को ही मिलता है.