आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को जबरदस्त विजय दिलवाने के बाद राजशेखर रेड्डी एक कुशल नेता के रूप में उभर चुके हैं. रेड्डी ने मुख्यमंत्री पद के लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए पद और गोपनीयता की शपथ ली.
विपक्ष की एकजुटता और शासन के खिलाफ कारक से उबरते हुए वाईएसआर के नाम से मशहूर रेड्डी ने प्रदेश के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पार्टी को जबरदस्त जीत दिलवाई. कांग्रेस ने प्रदेश में शानदार प्रदर्शन करते हुए लोकसभा की 42 सीटों में से 33 और विधानसभा की 294 सीटों में से 156 सीटों पर जीत हासिल की.
वाईएसआर प्रदेश में कांग्रेस के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होनें आंध्र प्रदेश में पांच साल के पूर्ण कार्यकाल के बाद सत्ता बरकरार रखने का कारनामा कर दिखाया. 59 वर्षीय रेड्डी ने प्रदेश में मुख्यमंत्री का पद वर्ष 2004 में संभाला. वह दौर पार्टी का सबसे खराब समय था, क्योंकि पार्टी दस साल के बाद सत्ता में लौटी थी. प्रदेश के कडप्पा जिले के एक राजमिस्त्री के बेटे रेड्डी के लिए यह कड़ी चुनौती थी लेकिन कठिन समयों में वह हमेशा चमकते रहे.
मेडिसीन में स्नातक करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक प्रैक्टिस किया. 1970 के मध्य में उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत कांगेस के साथ की. वाईएसआर के नेतृत्व की क्षमता को पहचानते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की तत्कालीन अध्यक्ष इंदिरा गांधी ने उन्हें आंध्र प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बहुत पहले 1982 में बना दिया.
{mospagebreak}कांग्रेस में एक टूट के बाद रेड्डी ने पार्टी छोड़ दिया और रेड्डी कांग्रेस में शामिल हो गए. इंदिरा गांधी के खिलाफ विद्रोह कर रेड्डी कांग्रेस का गठन किया गया था. रेड्डी कांग्रेस के छिन्न भिन्न हो जाने के बाद वह पुन: कांग्रेस में लौट आये और एक बार फिर से 1997 में प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नियुक्त कर दिये गए. वह ऐसे समय में कांग्रेस अध्यक्ष बने जब प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी का जनाधार मजबूत हो रहा था और उनके पूर्व पार्टी सहयोगी एन चंद्र बाबू नायडू का जनाधार बढ़ रहा था.
हालांकि उनके लिए सबसे बेहतरीन क्षण उस वक्त आया जब 2004 में कांग्रेस को विजय मिली. दस साल के अंतराल के बाद प्रदेश में एक कांग्रेस सरकार का गठन किया गया.
कांग्रेस पार्टी ने यह स्वीकार किया कि 2003 में रेड्डी ने 1450 किलोमीटर की पदयात्रा की थी. वर्ष 2004 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को वापस सत्ता में लौटने में इस पदयात्रा की बड़ी भूमिका थी.