महानगर में रहने वाले ज्यादातर लोगों को ऑफिस से घर जाने में करीब घंटा भर या उससे ज्यादा समय लग जाता है. जरा सोच कर देखिए जितनी देर में आप ऑफिस से घर पहुंते हैं, उतनी ही देर में 17 लोग देश की खूनी सड़कों की भेंट चढ़ जाते हैं.
जी हां, ये सुनने में डरावना लगता है, मगर बिल्कुल सच है. सड़क पहिवहन मंत्रालय ने बुधवार को सड़क दुर्घटनाओं की जो रिपोर्ट जारी की है उसके आंकड़ें इस बात की तस्दीक करते हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, साल 2016 में 1,50,785 लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हुई. जबकि घायल होने वालों की संख्या करीब पांच लाख थी.
हर दिन 413 मौत
रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर दिन 1317 सड़क दुर्घटनाएं होती हैं. इन हादसों में हर दिन 413 लोगों की मौत होती हैं. जबकि हर घंटे की बात की जाए तो मरने वालों की संख्या 17 है.
46 फीसदी युवा
सड़क हादसों में मरने वाले ज्यादातर युवा हैं. आंकड़ों के मुताबिक, हादसों में जिन लोगों की मौत हुई, उनमें 46 फीसदी युवा थे. इन सभी की उम्र 18 से 35 के बीच थी.
एक्सीडेंट कम, मौत ज्यादा
हालांकि, 2015 के 2016 की तुलना की जाए तो घटनाओं में थोड़ी कमी आई है. 2016 में 4.1 फीसदी कम रोड एक्सीडेंट हुए हैं. लेकिन मरने वालों का आंकड़ा बढ़ गया है. 2015 की तुलना में 2016 में सड़क हादसों में जान गंवाने वालों की संख्या 3.1 फीसदी बढ़ी है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, दोपहिया वाहनों पर चलने वाले लोगों पर खतरा सबसे ज्यादा है. रोड एक्सीडेंट में मरने वाले 35 फीसदी लोग दोपहिया वाहन पर ही थे.
दोपहिया वाहन पर हेलमेट पहनने की हिदायत पर ध्यान नहीं देने का नतीजा भी रिपोर्ट में साफ दिखा. मरने वाले लोगों में 10,135 लोग ऐसे थे जिन्होंने हेलमेट नहीं पहन रखा था.
वहीं तेज रफ्तार भी हादसे का कारण बनी. करीब 56 फीसदी दुर्घटना तेज गाड़ी चलाने के कारण ही हुईं. सबसे ज्यादा दुर्घटना तो तमिलनाडु में हुईं, लेकिन सबसे ज्यादा लोगों ने उत्तर प्रदेश में जान गंवाई.
सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि उन्हें अफसोस है कि तमाम कोशिशों के बावजूद सड़क हादसों में कोई खास कमी नहीं आ पायी है. उन्होंने कहा कि सडकों की गलत डिजायन रोड एक्सीडेंट का बहुत बड़ा कारण है. गडकरी ने कहा कि देश भर में 789 ब्लैक स्पॉट्स की पहचान की गई है जहां सबसे ज्यादा रोड एक्सीडेंट होते हैं. इनमें से 140 को ठीक किया जा चुका है और 283 को ठीक करने का काम चल रहा है.