सोचिए, कि हवा में सनसनाता हुआ जूता किसे अच्छा लग सकता है और किसके लिए शुभ संकेत हो सकता है. जूता फेंकना किसी के अपमान का संकेत है. असहमति का भी. लेकिन अपमान और असहमति मरे हुए से नहीं होती, ज़िंदा से होती है. ज़िंदा होने का संकेत एक शुभ समाचार है. उत्तर प्रदेश में राहुल को निशाना बनाकर फेंका गया जूता इस बात का प्रमाण है कि कांग्रेस पार्टी अभी ज़िंदा है.
इस बात का भी प्रमाण है कि राहुल की कोशिश सूबे में रंग ला रही है. कांग्रेस चर्चा में लौटी है. लोग राहुल को सुनने और देखने आ रहे हैं. एक लुप्तप्राय हो चली पार्टी के लिए इस तरह जीवन का लौट आना वाकई एक शुभ समाचार है. सीतापुर में जिस पल हवा में लहराता जूता राहुल की ओर आया, उसने सिद्ध कर दिया कि राहुल की उपस्थिति राज्य में महसूस की जा रही है और जूता फेंका जाना राहुल की सूबे में पहली राजनीतिक सफलता का प्रमाण है.
इस साल की शुरुआत में जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से एक साल पहले की ज़मीन को परखा जा रहा था तो उसमें कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए जूझती नज़र आ रही थी जिसपर कोई बात तक करना नहीं चाहता था. चाय की दुकानों से चौपालों तक लोग सपा और बसपा की टक्कर का आकलन कर रहे थे. यह बात चल रही थी कि मोदी 2014 वाली सफलता 2017 में दोहरा पाएंगे या नहीं. लेकिन कांग्रेस पर कोई अपना वक्त खराब करना नहीं चाहता था.
फिर जैसे जैसे गर्मी का सूरज चढ़ा, अपने प्रबंधन और अभियानों की बदौलत कांग्रे स ने सूबे में पैर जमाने शुरू किए. शीला दीक्षित जैसे ब्राह्मण चेहरे को कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस ने एक मज़बूत पैतरा खेला. यह अगड़ों को साधने और भाजपा को रोकने का तुरुप था. इस तुरुप के बाद पार्टी के प्रचार प्रबंधक प्रशांत किशोर ने ज़िलों में ब्लॉक स्तर तक कार्यकर्ताओं को खड़ा करने का काम किया.
वापस लौटते प्राण
कार्यकर्ताओं के सम्मेलन, बैठकें, राहुल से संवाद जैसी गतिविधियों से धीरे-धीरे एक बूढ़ी, थकी और सोई हुई पार्टी अंगड़ाई लेने लगी है. इतना ही नहीं, अंगड़ाई लेती पार्टी अब लोगों को दिखने भी लगी है. किसान यात्रा पर निकले राहुल गांधी और प्रदेशभर में इस यात्रा का रूट कांग्रेस को वापस चर्चा में ले आया है. कांग्रेस खोई और सोई हुई स्थिति से अब बातचीत का विषय बनने लगी है. यह पार्टी की बड़ी उपलब्धि है.
भले ही खाट और जूता खबरों का शीर्षक तय कर रहे हों, लेकिन इस बहाने कांग्रेस अपने लिए खबरों में जगह बना रही है और इस पर लोग बात कर रहे हैं. एक तरह से देखें तो प्रचार में अभी तक कांग्रेस बाकी पार्टियों से आगे ही चल रही है. सपा अपने युद्ध में व्यस्त है. बसपा अपने लोगों को रोकने की कोशिशों में और भाजपा सही समय के इंतज़ार में. इस सब के दौरान राहुल राज्य के रास्तों पर लोगों से मिलते, बात करते आगे बढ़ रहे हैं.
राहुल इससे पहले भी सूबे में रोड-शो करते रहे हैं. उन्होंने 2009 में सूबे से 20 से ज़्यादा सांसद जिताकर दिल्ली भेजे थे. लेकिन सूबे की ज़मीन कांग्रेस के लिए बंजर ही बनी रही. लेकिन कांग्रेस के लिए यह करो या मरो की लड़ाई बन चुका है. पूरा गांधी परिवार इस विधानसभा चुनाव में सड़कों पर होगा. कांग्रेस का नेतृत्व सूबे में वो सब कर रहा है जो इंदिरा गांधी के बाद से किसी ने नहीं किया था.
और शायद ये कोशिशें असर कर रही हैं. कांग्रेस इस प्रचार को कितने दिन साधे रह पाएगी और कितनी सीटों पर अपनी बढ़त बना पाएगी, इसमें तो अभी बहुत समय बाकी है. लेकिन कांग्रेस चर्चा में लौट आई है और राहुल लोगों को दिखाई दे रहे हैं, जूता इसका प्रमाण है.