दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) का पद सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आता है और न्यायिक स्वतंत्रता किसी न्यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि उसे सौंपी गई जिम्मेदारी है.
मुख्य न्यायाधीश ए. पी. शाह और न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन एवं न्यायमूर्ति एस. मुरलीधर की तीन सदस्यीय पीठ का 88 पन्नों का यह फैसला प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन के लिए एक निजी धक्के के रूप में देखा जा रहा है जिन्होंने आरटीआई ऐक्ट के तहत न्यायाधीशों से संबंधित सूचना के प्रकटीकरण का विरोध किया था.
दिल्ली उच्च न्यायालय की इस तीन सदस्यीय पीठ ने उच्चतम न्यायालय की यह दलील खारिज कर दी कि प्रधान न्यायाधीश के पद को आरटीआई ऐक्ट के दायरे में लाने से न्यायिक स्वतंत्रता बाधित होगी. उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता किसी न्यायाधीश का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि उसे सौंपी गई जिम्मेदारी है.