देश की राजधानी में इतिहास दोबारा लिखने की तैयारी शुरू हो गई है. दिल्ली यूनिवर्सिटी का संस्कृत विभाग इतिहास की किताबों का विस्तृत अध्ययन करने वाला है. इस अध्ययन के जरिये पाठ्यपुस्तकों में 'वैदिक युग और आर्य संस्कृति' के निरूपण पर एक विस्तृत रिपोर्ट बनाई जाएगी और केंद्र सरकार से कथित 'गलत व्याख्याओं' को बदलने की सिफारिश की जाएगी.
गौरतलब है कि संस्कृत विभाग ने हाल ही में कहा था कि आर्य भारत के मूल निवासी थे . मार्क्सवादी और पश्चिमी इतिहासकार आर्यों को बाहर से आया बताते रहे हैं. संस्कृत विभाग ने कहा था कि आर्यों को मूलनिवासी साबित करने के लिए वह जल्द ही एक प्रोजेक्ट शुरू करेगा. इसके तहत अब विभाग अपनी पाठ्य पुस्तकों का अध्ययन करने की तैयारी कर रहा है. इसकी रिपोर्ट बनाकर स्मृति ईरानी के मानव संसाधन मंत्रालय को सौंपी जाएगी और उसमें बदलाव की सिफारिश की जाएगी.
संस्कृत विभाग का मानना है कि आर्य संस्कृति और वैदिक युग को पाठ्य पुस्तकों में ठीक तरह से नहीं दिखाया गया है, जाहे वो सीबीएसई की किताबें हों या राज्यों के शिक्षाा बोर्डों की. उनमें पश्चिमी और मार्क्सवादी विचार ही हावी हैं. संस्कृत विभाग के अध्यक्ष रमेश भारद्वाज ने कहा, 'तो क्यों न छात्रों को इसका भारतीय संस्करण भी मुहैया कराया जाए. हम शाब्दिक प्रमाणों और बीते 100 साल में किए गए शोध के निष्कर्षों पर ही निर्भर करेंगे. हम रिवीजन चाहते हैं.'
हालांकि भारद्वाज मानते हैं कि उनका फैसला राजनीतिक रंग ले सकता है लेकिन इसे अकादमिक नजरिये से ही देखा जाना चाहिए. गौरतलब है कि बीजेपी का मातृ-संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन भी आर्यों को मूलनिवासी मानता रहा है और वैदिक युग के इतिहास के पुनर्अध्ययन की मांग करता रहा है.
हालांकि इतिहासकार और डीयू के पूर्व प्रोफेसर डीएन झा संस्कृत विभाग के कदम को 'हास्यास्पद' बताते हैं. उनके मुताबिक, संस्कृत फैकल्टी 'बत्रा सिंड्रोम' (दीनानाथ बत्रा के संदर्भ में) की शिकार है. उन्होंने कहा, 'मेरी सहानुभूति उनके साथ है. उन्हें इतिहास का कुछ पता नहीं है. उन्हें मार्क्सवाद का नहीं पता है. उन्हें नहीं पता कि पश्चिमीकरण क्या होता है. जो वो प्रदर्शित करने जा रहे हैं, वह बहुत बड़ा चुटकुला होगा. उस पर सिर्फ हंसा ही जा सकता है.'