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आपबीती ‘बाघ विधवाओं’ की: 'पति को टाइगर खा गया, अब नसीब में भूख है और गैर मर्दों की भूखी नजरें'

सर्दियों का वक्त. नाव लेकर मैं पति के साथ मछलियां पकड़ने निकली हुई थी, तभी पानी में सरसराहट हुई. इससे पहले कि हम संभलते, पति की गर्दन बाघ के पंजों में थी. गड़ाप की आवाज के साथ दोनों गायब हो गए. अब मेरे चारों तरफ खून के छींटे थे. ताजा पकड़ी मछलियां थीं. और साथ में था एक पुछल्ला- बाघ विधवा का! वो औरत, जिसकी परछाई से भी लोग बचते.

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सुंदरबन में हजारों टाइगर विडोज रह रही हैं.
सुंदरबन में हजारों टाइगर विडोज रह रही हैं.

सुंदरबन! इंटरनेट पर ये नाम लिखें तो सपनों की एक दुनिया खुल जाएगी. यहां जंगल हैं, पानी हैं और बेहद खूबसूरत द्वीप हैं. खाने के शौकीनों के लिए किस्म-किस्म की मछलियां और भाप में पकी देसी मिठाइयां भी यहां मिलेंगी लेकिन दुनिया के सबसे बड़े डेल्टा का एक चेहरा और भी है. 

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यहां पेड़ों की सरसराहट में उनके आंसू दफन हैं, जिनकी आंखों के सामने कोई अपना मारा गया. डेल्टा के नमकीन पानी में तबाही की ढेरों-ढेर कहानियां घुली हैं. जहरीले सांपों की. ताक में बैठे मगरमच्छों की..और आदमखोर बाघों की.

जंगल में शहद जमा करने जाएं, या पानी में मछलियां पकड़ने, बाघ कहीं भी टकरा सकता है. दबे पांव आएगा. गर्दन दबोचेगा. और भरे झुंड के बीच से घसीटकर ले जाएगा. 

कितनी औरतें हैं, जो अपने पतियों का साबुत शरीर नहीं देख सकीं. कितनों को अपनों की लाशें तक नसीब नहीं हुईं.

sundarban tiger widows

ये टाइगर विडो हैं. हरे-भरे सुंदरबन का वो खौफनाक चेहरा, जिसके जिक्र से हर कोई बचता है.

खुद गांववाले भी ऐसी औरतों को मनहूस मानते हैं. उनका यकीन है कि आदमखोर जानवर ऐसी औरत के पीछे-पीछे रहता है. वो जहां जाएगी, भूखा बाघ वहां पहुंच जाएगा. और कोई न कोई हादसा होकर रहेगा.

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24 दक्षिण परगना में एक पूरा का पूरा गांव बसा हुआ है, जहां ये विधवाएं रहती हैं. कागजों पर गांव का नाम आरामपुर है, लेकिन सैकड़ों बाघ विधवाओं के चलते उसे विधवा पारा भी कहा जाने लगा.

ये अकेली जगह नहीं. भारत के हिस्से आए सुंदरबन में जिन भी द्वीपों पर इंसान बसते हैं, वहां बाघ भी रहते हैं, और बाघ विधवाएं भी.

प्रोतिमा ऐसा ही एक चेहरा हैं.

वे याद करती हैं- पति को आंखों के सामने बाघ ले गया. इसके बाद भी मुझे रोने की सुबिधा (सुविधा) नहीं थी. चप्पू चलाकर गांव पहुंची. मछलियों से भरा घड़ा उतारा. और फिर उसी चिंगरी माछ से सबका भोज किया, जिसे हम गोसाबा में बेचने की सोच रहे थे. लोग भरपेट खाते, और मुझे स्वामी खेजो (पति को खा जाने वाली) कहकर चले जाते.

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तब आपकी उम्र क्या रही होगी?

तीसेक साल की रही होऊंगी! दो छोटे-छोटे बच्चे थे. भूख से रोते तो साथ-साथ मैं भी रो पड़ती थी. काम पर जाना मना था.

क्यों?

जिस औरत के पति को बाघ ले जाता है, उसे अशुभ मानते हैं. कहते हैं कि बाघ उस औरत को सूंघ लेता है और उसके पीछे लगा रहता है.

पानी में अकेली जा नहीं सकती, काजेर नौका (मछलियां-केकड़ पकड़ने वाली नाव) पर चढ़ने की मनाही रहती है. खेती करूंगी तो बाघ की छाया पड़ जाएगी. घर के सामने जो पोखरी थी, उससे मछलियां पकड़ती. कुछ बच्चों को खिलाती, कुछ हाथ-गोड़ जोड़कर शहर जा रहे लोगों को बेचने के लिए दे देती. भरपेट खाए हफ्तों बीत जाता था.

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कमउम्र थीं. पति के जाने के बाद दूसरी शादी नहीं की!

हिंदी समझकर बंगाली में जवाब देती प्रतिमा इस बार लंबी चुप्पी के बाद कहती हैं- मैं स्वामी खेजो थी. मुझसे दूसरी शादी कौन करता!

आदमी सबके सामने तो मेरी छाया से बचते थे, लेकिन अकेला पाकर परेशान करते थे. भात का लालच देते. मछलियों की पूरी कीमत का वादा करते. जैसे-तैसे बची रह सकी.

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इस इलाके में ये बातें कॉमन है. मेरे साथ आए मृणाल नायक बताते हैं. टाइगर विडोज को अक्सर उनके सास-ससुर या परिवारवाले घर से निकाल देते हैं. चाहे मछलियां पकड़ने में वे कितनी ही माहिर हों, या खेतीबाड़ी आती हो, अपशकुनी कहकर हर काम उनके हाथ से छिन जाता है.

मजबूरन वे गोसाबा या गंगासागर होते हुए कोलकाता जैसे बड़े शहर की तरफ निकल जाती हैं. किसी-किसी को कंस्ट्रक्शन वर्क या घर में काम मिल जाता है, लेकिन बहुत सी औरतें रेड लाइड एरिया पहुंच जाती हैं.

कहीं भी इसका कोई रिकॉर्ड नहीं कि सुंदरबन से कुल कितनी महिलाएं इसमें पहुंच रही हैं. छोटे-बड़े कई NGO इसपर काम कर रहे हैं.

एक संस्था दुर्बर महिला समन्वय समिति का डेटा दावा करता है कि सुंदरबन से सालाना करीब 7 सौ महिलाएं सेक्स वर्क में आ रही हैं. इनमें से ज्यादातर टाइगर विडो हैं, या फिर साइक्लोन की मारी. ये कोलकाता तक ही सीमित नहीं रहतीं, बल्कि तस्करी का शिकार होकर अमीर राज्यों की तरफ भेज दी जाती हैं.

पति की फोटो या कोई निशानी है आपके पास? मैं प्रतिमा की तरफ मुड़ती हूं.

‘हमारे पास खाने को भात नहीं जुटता, और तुम फोटो की पूछ रही हो.’ पहली बार वे हंस रही हैं, खारे पानी में घुली हुई हंसी.

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फिर धीरे से कहती हैं- खून के धब्बों वाली नाव थी, जिसे खेकर मैं अकेली वापस लौटी. काठ की मजबूत नाव. घर के कमाऊ आदमी से कम नहीं थी. फिर भी किसी ने खरीदा नहीं. पड़े-पड़े वो भी समंदर की मिट्टी हो गई.

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अच्छी कद-काठी वाली ये औरत अब लगभग 60 की होगी. बच्चे द्वीप और अपनी 'शापित' मां को छोड़कर पास के ब्लॉक गोसाबा में बस चुके.

दिनभर क्या करती हैं?

बोनबीबी की पूजा करती हूं. केला, नारियल, बाड़ी में जो मिल जाए, उसका भोग चढ़ाती हूं. प्रार्थना करती हूं कि अगले जन्म में ‘स्वामी खेजोर’ न कहलाऊं. गहरी भूरी-कत्थई आंखों वाली औरत अपने हिस्से का भरपूर रो चुकी. अब उसके सूने चेहरे पर चंदन की छोटी बिंदी से भी पहले जो दिखता है, वो है सूनापन. वो उजाड़पन जो किसी खंडहर में बसता है.

सुंदरबन की वनदेवी यानी बोनबीबी.

दुनिया के सबसे बड़े सदाबहार जंगल में ये नाम बार-बार सुनाई पड़ता है. दुर्गा प्रतिमा की तरह लगती लेकिन मुस्लिम खुशबू लिए नाम वाली देवी की पूजा यहां हर कोई करता है. हिंदू-मुस्लिम नहीं, जंगल खुद एक मजहब है, जिसकी देवी हैं बोनबीबी.

कहते हैं कि बोनबीबी ने बाघ का भेष लेकर आए राक्षस को हराकर एक करार लिया था कि वो बस्तियों में आकर किसी को चोट न पहुंचाए. बदले में लोग घने जंगल या गहरे पानी तक जाने से परहेज करेंगे. साफ बंटवारा. इतना हिस्सा इंसान का. उतना बाघों का. जो भी इस वादे को तोड़ता है, बाघ चटपट उसे अपना शिकार बना लेता है. जंगल के हर रक्बे में ऐसी कोई न कोई रहस्ममयी कहानी सांस लेती हुई.

हमारी अगली मुलाकात हुई चाइना से. बोलने-चालने में लगभग शहरी लगती चाइना पति के जिंदा रहते कई साल चेन्नई में बिता चुकी थीं.

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नाम तो बड़ा अलग है आपका, घर का कोई चीन में रहता था क्या? हंसी-हंसी में किए सवाल पर बाद में पछतावा हुआ.

नहीं. मां-बाबू की पांच लड़कियों के बाद मैं हुई. गुस्से में उन्होंने नाम रख दिया- चाइना (चाही ना, मतलब नहीं चाहिए).

पश्चिम बंगाल का खास टोटका. लड़के की इच्छा रखते पेरेंट्स को अगर लड़की हो जाए तो वे उसका नाम चाइना रख देते हैं, इस यकीन के साथ कि ऊपरवाला घबराकर लड़कियां देने से तौबा कर लेगा.

चाइना भी टाइगर विडो हैं. बताती हैं- शादी के कुछ साल तक पति चेन्नई में सोने की दुकान में काम करता रहा. आंखें कमजोर हुईं तो नौकरी चली गई. हम लौट आए. अब मैं घर के पोखर में मछलियां पालती, और पति शहद इकट्ठा करने के लिए जंगल जाया करते.

अप्रैल का महीना था. वो सुबह निकले तो देर शाम को लोग उनका आधा-अधूरा शरीर लिए लौटे. गर्दन लगभग कटकर सिर ढुलका हुआ. कपड़ों से जमे हुए खून की बू आती थी.

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अंधेरा हो चुका था. दाह-संस्कार अगले दिन होना था. मैं न रोई, न चीखी. रातभर अधकटी देह के पास ढिबरी जलाकर बैठी रही. गर्मी की रात. आंसू की जगह पसीने ने ले ली थी. चिपिर-चिपिर कपड़ों में बैठी ‘उन्हें’ पंखा झलती रही.

अगले दिन लोग आए. झुंझलाए हुए. जल्दी में. शहद के मौसम में सबको जंगल जाने की हड़बड़ी रहती है. जैसे-तैसे काम निपटा, और लोग चले गए. चाइना की आवाज गुस्से और दुख के बीच झूल-सी रही है.

एक दिन पहले ही तो लाश लेकर आए थे, जंगल जाते डर नहीं लगा होगा!

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'या तो डर जाएंगे, या पेट भर लेंगे.' इस बार जवाब किसी और चेहरे से मिलता है. ये बिजय हैं. वही शख्स, जो चाइना के पति को लेकर लौटे थे.

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पान रंगे दांत लगातार हंस रहे हैं. हंसते हुए ही वे अपनी पत्नी की मौत के बारे में बता जाते हैं. बिजय खुद टाइगर विडोवर हैं, लेकिन अपशकुनी नहीं. पत्नी के जाने के बाद उन्होंने दूसरी शादी कर ली. नाव भी चलाते हैं, और जंगल भी जाते हैं.

वे कहते हैं- ‘आदमखोर बाघ को सिर्फ औरतों की गंध लगती है’. आवाज में मासूमियत है, या व्यंग्य, ये समझ नहीं आता.

सुंदरबन का शहद देश में सबसे अच्छी क्वालिटी का कहलाता है. जंगल में जितने अंदर जाएंगे, क्वालिटी उतनी ही बढ़िया होती चली जाती है. हनी कलेक्टर इसी मोह में भीतर-भीतर पहुंचते और बाघ का शिकार बन जाते हैं.

दिसंबर 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर के तहत सुंदरबन को टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया गया.

इसके बाद से जंगल दो हिस्सों में बंट गया. जहां तक इंसान जा सकते हैं, वो बफर एरिया था. दूसरे हिस्से में घने जंगल थे, जिसे कोर एरिया कहते. यही वो इलाका है, जहां बेहतरीन शहद मिलता.

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सरकार यहां तक जाने के लिए लाइसेंस जारी करने लगी. मकसद साफ था. कम से कम लोग भीतर जाएं ताकि बाघ और इंसान दोनों सुरक्षित रहें.

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फिलहाल हनी सीजन में हर साल करीब पौने 2 हजार लाइसेंस अलॉट होते हैं, जो कुछ ही दिनों के लिए वैध होते हैं. यही वजह है कि जितने लोग लाइसेंस लेकर भीतर जाते हैं, उससे कहीं ज्यादा अवैध तरीके से जंगल में घुसने लगे.

यही वो लोग हैं, जिनका सरकार के पास कोई डेटा नहीं. वे मारे भी जाएं तो परिवार न तो शिकायत कर सकता है, न मुआवजा मांग सकता है. 

टाइगर अटैक से बचने के लिए लोगों ने अनोखा तरीका निकाला. मृणाल नायक बताते हैं. बाघ अक्सर पीछे से हमला करता और गर्दन की हड्डी तोड़ देता है. तो हनी कलेक्टर एक मास्क पहनने लगे. सिर के पीछे की तरह पहना हुआ ये मास्क इंसानी चेहरे जैसा ही लगता है. इससे शायद बाघ को भ्रम हो जाए कि इंसान भी उसे देख रहा है, और वो हमला न करे. 

तो क्या बाघ भुलावे में आ जाता है?

वो भुलावे में आता है, या हम खुद को भुलावा दिए रहते हैं, क्या पता! बिजय की पान-रंगी आवाज आती है.

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