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वाराणसीः ज्ञानवापी मस्जिद मामले में निचली कोर्ट के अंतरिम फैसले पर HC ने लगाई रोक

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्वयंभू ज्‍योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर बनाम ज्ञानवापी मस्जिद मामले में निचली अदालत के आदेश पर रोक लगा दी. इस बाबत मस्जिद इंतजामिया कमेटी वाराणसी की ओर से याचिका दाखिल की गई.

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फोटो- सोशल मीडिया (ट्विटर)
फोटो- सोशल मीडिया (ट्विटर)

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  • स्वयंभू ज्‍योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर Vs ज्ञानवापी मस्जिद
  • जस्टिस अजय भनोट की एकल पीठ ने सुनाया आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट में बुधवार को स्वयंभू ज्‍योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर बनाम ज्ञानवापी मस्जिद मामले की सुनवाई हुई. इस मामले में हाई कोर्ट ने वाराणसी की जिला कोर्ट के अंतरिम फैसले पर रोक लगा दी. फिलहाल जिला अदालत में ये मामला नहीं चलेगा. यह आदेश जस्टिस अजय भनोट की एकल पीठ ने दिया.

हाई कोर्ट ने 4 फरवरी के एडीजे कोर्ट में मुकदमा चलाने के आदेश पर रोक लगाई है. इस बाबत मस्जिद इंतजामिया कमेटी वाराणसी की ओर से याचिका दाखिल की गई थी.

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आपको बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर बनाम अंजुमन इंतजामियां मस्जिद के दो पक्षकार आमने-सामने हैं. प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वरनाथ ने सिविल जज कोर्ट में ज्ञानवापी मस्जिद सहित विश्वनाथ मंदिर परिसर के आसपास पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की अपील की थी.

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इन तथ्यों का दिया गया था हवाला...

दरअसल, हिंदुओं के एक धड़े का मानना है कि औरंगजेब ने 16वीं शताब्दी में विश्वनाथ मंदिर के साथ करीब 60 मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाई थी. इस पक्ष में यह धड़ा कोलकाता के एशियाटिक लाइब्रेरी में रखे औरंगजेब के उस पत्र को पेश करते हैं, जिसे अप्रैल 1667 में लिखा गया था. दरअसल इस पत्र के मुताबिक औरंगजेब ने अपने सेनापति को आदेश दिया था कि वह विश्वनाथ का मंदिर तोड़वा दे.

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इतिहास में दर्ज इस बात के आधार पर दावा किया जा रहा है कि 1669 में यह मस्जिद बनाई गई थी. हालांकि बाद में एक हिंदू शासक ने इसे फिर मंदिर में तब्दील कर दिया था. साल 1809 में काशी में हिंदुओं ने ज्ञानवापी मस्जिद पर कब्जा भी कर लिया था. ऐतिहासिक दस्तावेज इस ओर इशारा करते हैं कि 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने 'वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल' को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने को कहा था, लेकिन यह कभी संभव नहीं हो पाया.

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