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अंग्रेजों के बोए बीजों से आग के सामने कमजोर हो गए हमारे जंगल

जंगलों में आग लगने की घटनाएं नई नहीं हैं. कई बार तो जंगलों में घास की अच्छी पैदावार के लिए खुद नियंत्रित तरीके से आग लगाई जाती रही है. लेकिन इन दिनों जंगलों की आग विकराल रूप धारण करती जा रही है, जो कई बार हफ्तों तक जारी रहती है. कई बार यह आग बारिश होने के बाद ही बुझती है.

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फाइल फोटो (PTI)
फाइल फोटो (PTI)

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देश के हिमालयी राज्य उत्तराखंड के जंगल इन दिनों आग की चपेट में हैं. उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों के सैकड़ों छोटे-बड़े जंगलों में आग लगी हुई है. वन विभाग के मुताबिक इन जंगलों में गर्मी शुरू होने के बाद से अब तक आग लगने की करीब एक हजार घटनाएं दर्ज की गई हैं, जिससे करीब 2400 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है.

जंगलों में आग लगने की घटनाएं नई नहीं हैं. कई बार तो जंगलों में घास की अच्छी पैदावार के लिए खुद नियंत्रित तरीके से आग लगाई जाती रही है. लेकिन इन दिनों जंगलों की आग विकराल रूप धारण करती जा रही है, जो कई बार हफ्तों तक जारी रहती है. कई बार यह आग बारिश होने के बाद ही बुझती है.

जंगल मतलब सिर्फ पेड़ नहीं

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चिपको आंदोलन के एक्टिविस्ट और फॉरेस्ट कॉर्पोरेशन में अधिकारी रहे विनोद पांडे कहते हैं पहले तो जंगलों का मतलब सिर्फ पेड़ मानने वाली सोच को बदलना होगा. वह कहते हैं कि जंगलों में पेड़ों के अलावा पौधे, बेल, लताएं, मशरूम, जड़ें और सैकड़ों किस्म के जीव जंतु होते हैं. जंगल इन सबसे मिलकर बनता है और आग लगने पर इन छोटे जीवों और वनस्पतियों को भी नुकसान पहुंचता है.

अंग्रेजों ने बदली जंगलों की सूरत

असल में जंगलों के खात्मे की शुरुआत ब्रिटिश काल से ही हो गई थी. अंग्रेजों ने देश में रेल लाइनें बिछाने और लीसा (Resin) हासिल करने के लिए जंगलों में चीड़ के पेड़ों को रोपना शुरू किया. इससे उत्तराखंड में मिश्रित वन खत्म होकर चारों ओर चीड़ के जंगल फैल गए. चीड़ के न गलने वाले पत्ते जंगल की मिट्टी में नमी को रोकने में नाकाम रहे और जंगलों की बायोडायवर्सिटी खत्म करने की बड़ी वजह बने. विनोद पांडे कहते हैं कि 60-70 साल तो ये जंगल चीड़ के पेड़ों को झेल गए, लेकिन आज हालात चीड़ के पेड़ों के लिए भी खत्म होते जा रहे हैं और अब यहां मेक्सिकन डेविल (काला बांसा) होने लगा है.

जंगलों के लिए फायदेमंद होती है आग

यह सुनने में अजीब लगेगा, लेकिन आग कई मायनों में जंगलों के लिए फायदेमंद साबित होती आई है. आग फॉरेस्ट इकोलॉजी का हिस्सा मानी जाती रही है. जंगलों में कई किस्मों की घास के बीज के खोल काफी सख्त होते हैं. हल्की रोस्टिंग से टूटने के बाद ही इन बीजों में जर्मिनेशन की प्रकिया शुरू होती है. इनमें उत्तराखंड में पाए जाने वाले काफल (Myrica Esculenta) का बीज भी शामिल है. आग हमेशा से सिल्वीकल्चर का हिस्सा रही है. इसलिए यह कहना सरलीकरण करना होगा कि जंगलों में आग लकड़ी के तस्कर लगाते हैं.

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पढ़ें: जंगल-जंगल आग लगी है...साल में लाखों बार लगी है...

खुद अपनी आग बुझा लेते थे जंगल

कुछ समय पहले तक जंगल अपनी आग खुद नियंत्रित कर लिया करते थे. अब ऐसा न हो पाने की वजह जंगलों में खत्म होती नमी है. हजारों-लाखों सालों से अपनी प्रतिरोधक क्षमता की मदद से खुद को बचाने वाले जंगल आज कमजोर पड़ते जा रहे हैं. जंगल बारिश के पानी को सहेजकर अपनी जमीन में नमी बनाए रखते थे. पेड़ों से गिरने वाली पत्तियां इस काम में अहम रोल निभाती थीं. चीड़ के पेड़ आ जाने से इसके पत्ते जंगलों को सुखाने का काम कर रहे हैं.

जंगलों की आग बेकाबू होने के तीन बड़े कारण

वरिष्ठ पत्रकार और नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह कहते हैं कि पुराने समय में जंगलों, वन विभाग और स्थानीय निवासियों के बीच एक आपसी संबंध बना रहता था और लोग आग बुझाने के काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे. बाद में जंगलों में जाने पर प्रतिबंध लगने और वनवासियों के अधिकार कम होने से यह संबंध टूटता चला गया. आग बेकाबू होने का दूसरा कारण उत्तराखंड के गांवों का पलायन भी है. अब आग बुझाने में हाथ बंटाने के लिए गांव में लोग ही नहीं बचे हैं. तीसरा कारण विनोद पांडे बताते हैं कि वन विभाग में अधिकारी तो जरूरत से पांच गुना मौजूद हैं लेकिन आग बुझाने वाले फॉरेस्ट गार्ड के एक तिहाई से ज्यादा पद खाली पड़े हैं.

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कहां पीछे रह गए हम

विनोद पांडे बताते हैं कि आज आग बुझाने के नाम पर मैकेनिकल प्रयास हो रहे हैं, इन्हें बायोलॉजिकल प्रयासों में बदलना होगा. जंगलों की बायोडायवर्सिटी बदलने से ही ये आग को रोकने में सक्षम हो सकेंगे. जंगलों की बायोडायवर्सिटी नापने की तकनीक आज तक हमारे पास नहीं है. आग लगने के बाद कभी जंगलों की बायोडायवर्सिटी को होने वाले नुकसान का अंदाज नहीं लगाया जाता है. वह कहते हैं कि जंगल की आग को पानी छिड़ककर नहीं बुझाया जा सकता है, इनके लिए हमें फिर से जंगलों को सक्षम बनाना होगा. चीड़ के पेड़ों के बजाए हमें जंगलों में फिर से मिश्रित वनों को जगह देनी होगी.

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