पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष सोमेन मित्रा का बुधवार देर रात निधन हो गया. कोलकाता के एक निजी अस्पताल में उन्होंने 78 साल की उम्र में अंतिम सांस ली. सोमेन मित्रा बंगाल में कांग्रेस के प्रभावशाली नेता के साथ-साथ मंझे हुए राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर जाने जाते थे. अधीर रंजन चौधरी की जगह उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई थी, लेकिन दुनिया को ऐसे समय अलविदा कह गए जब बंगाल में कांग्रेस पार्टी को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी.
सोमेन मित्रा छात्र राजनीति से सियासत में आए और 1970 के दशक में अपनी जबरदस्त पहचान बनाई. 1972 में सियालदह विधानसभा सीट से विधायक बने थे और सात बार इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था. उन्होंने 2008 में कांग्रेस पार्टी छोड़कर अपनी नई पार्टी बनाई, लेकिन एक साल के बाद 2009 में टीएमसी का दामन थाम लिया. मित्रा ने 2009 में टीएमसी से सांसद चुने गए, लेकिन 2014 में ममता बनर्जी का साथ छोड़ दिया और कांग्रेस में वापसी कर गए. कांग्रेस ने 2018 में बंगाल में पार्टी की कमान मित्रा को सौंपी.
ये भी पढ़ें: कांग्रेस से दूर जाकर भी सचिन पायलट ने खुले रखे हैं वापसी के रास्ते?
सोमेन मित्रा का जन्म 31 दिसंबर 1941 को पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) के जेसोर जिले में हुआ था. वो अपने पांच भाई-बहनों में सबसे बड़े थे. सोमेन मित्रा छात्र जीवन में सियासत में कदम रखा और पांच दशक तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में मजबूती के साथ बने रहे. 26 साल की उम्र में 1972 के चुनाव में वो विधायक चुने गए और 1977 को छोड़कर लगातार इस सीट से जीतते रहे.
सोमने मित्रा को कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व का करीबी माना जाता था. वो तीन बार कांग्रेस के पश्चिम बंगाल के अध्यक्ष रहे. 1996 में लेफ्ट के खिलाफ 82 सीटों को जिताने में सोमने मित्रा की अहम भूमिका रही. ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाई और 1998 में चुनावी जीतने में सफल रही तो मित्रा ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. हालांकि, 2008 में मित्रा ने कांग्रेस छोड़कर प्रगतिशील इंदिरा कांग्रेस के नाम से अपने पार्टी बनाई थी.
ये भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष सोमेन मित्रा का निधन, लंबे समय से थे बीमार
मित्रा ने 2009 के लोकसभा चुनावों से पहले बनर्जी की टीएमसी के साथ अपने संगठन का विलय कर दिया और लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. हालांकि, ममता के साथ मतभेद होने के बाद उन्होंने कांग्रेस में वापसी की. 2018 में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की कमान उन्हें सौंपी गई. 2019 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट के साथ गठबंधन का विरोध किया. इसके बाद कांग्रेस अकेले चुनावी मैदान में उतरी थी.