लगभग महीनेभर पहले उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने डीप स्टेट का जिक्र करते हुए कहा कि ये बेहद गंभीर मुद्दा है, जिससे देश के लोकतंत्र को खतरा है. कुछ समय पहले अमेरिका में भी नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डीप स्टेट को यूएस समेत दुनियाभर की डेमोक्रेसी के लिए बड़ा खतरा बताया. यहां तक कि ट्रंप पर हुए हमले में भी डीप स्टेट की भूमिका कही जा रही थी. क्या वाकई डीप स्टेट नाम की कोई चीज है, या यह सिर्फ एक कंस्पिरेसी थ्योरी है, जिसके नीचे सरकारें अपनी नाकामी छिपाती हैं?
डीप स्टेट को समझने के लिए हम साठ के दशक में जा सकते हैं. दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद अमेरिका और रूस (तब सोवियत संघ) सबसे बड़ी ताकत बन चुके थे, साथ ही एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन भी. शीत युद्ध जारी था. दोनों देश न्यूक्लियर वेपन बना रहे थे. सबको डर था कि बस एक चाल और दुनिया तबाह हो जाएगी.
क्यूबा नाम का छोटा सा देश रूस और अमेरिका के बीच फंसा हुआ था. अमेरिकी सीमा के करीब ये द्वीप देश वैसे रूस के साथ था. रूस उसे हथियार सप्लाई करने लगा, यहां तक कि न्यूक्लियर हथियार भी. यूएस को इसका कोई अंदाजा नहीं था, जब तक कि एक रोज उसके जासूसी जहाज ने इन तैयारियों की तस्वीर नहीं खींच ली. दुनिया के सबसे खतरनाक हथियार कभी भी यूएस को खत्म कर सकते थे.
ये बात है अक्टूबर 1962 की, जिसे क्यूबन मिसाइल क्राइसिस कहा गया. तब जॉन एफ कैनेडी अमेरिकी राष्ट्रपति थे. सबको उम्मीद थी कि वे तुरंत ही क्यूबा पर हमले का आदेश देंगे लेकिन हुआ कुछ और ही. सूचना मिलने के साथ ही वे एक कॉकटेल पार्टी में चले गए.
जॉर्जटाउन में हुई इस पार्टी में तमाम ऐसे लोग थे, जो सीधे सरकार में न होकर भी सरकार चलाने या गिराने की पावर रखते थे. वॉशिंगटन की सारी ताकत इसी कॉकटेल पार्टी में जमा थी. यही था डीप स्टेट. यहां सलाह-मश्वरा हुआ और सीक्रेट पावर ने सारा खेल बदल दिया. सीआईए ने कैनेडी को सोवियत योजनाओं और सैन्य तैयारियों के बारे में लगातार अपडेट किया.
योजना बनी और अमेरिका ने क्यूबा पर पूरे हमले की बजाए उसकी नाकाबंदी कर दी. यूएस की नौसेना रूसी जहाजों को क्यूबा तक पहुंचने से रोकने के लिए समुद्र पर कंट्रोल कर चुकी थी. साथ ही साथ बैकचैनल्स का भी जमकर इस्तेमाल हुआ. खुफिया बातचीत हुई और दोनों देश यानी अमेरिका और रूस एक-एक कदम पीछे हट गए. इस दौरान डीप स्टेट से जुड़े मीडिया नेटवर्क ने जनता को लगातार भरोसे में लिए रखा कि सब काबू में है.
तो क्या डीप स्टेट कोई असल चीज है
अमेरिका और रूस के उदाहरण से ये समझ आ गया कि कुछ है जो देशों की अस्थिरता या मजबूती में काम करता है. लेकिन वो सरकार नहीं, बल्कि कोई खुफिया तंत्र है, जो सरकार से भी कहीं ज्यादा ताकतवर है और उसे बना-बिगाड़ सकता है.
इस टर्म का सबसे पहला इस्तेमाल तुर्किए में हुआ था. यह शब्द तुर्की भाषा के शब्द डरिन देवेलेट से आया, जिसका मतलब है गहरा राज्य. नब्बे के दशक में तुर्किए में एक रोड एक्सडेंट हुआ, जिसमें एक राजनेता, एक पुलिस अफसर, और एक माफिया डॉन मारा गया. इस हादसे के बाद साफ दिखने लगा कि देश की सरकार, रक्षा तंत्र और माफिया के बीच गहरे रिश्ते हो सकते हैं. इसे वहां की मीडिया में डरिन देवेलेट यानी डीप स्टेट कहा गया.
यह एक ऐसा पावर डायनेमिक्स है, जो लोकतांत्रिक सरकार के समानांतर काम करता है और सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखता है. बाद में अमेरिका में डीप स्टेट का खूब जिक्र होने लगा, खासकर ट्रंप राजनीति में आने से पहले ही इस तरह के बयान देने लगे थे कि उनके देश को इसी खुफिया ताकत से खतरा है.
भारत की बात करें तो यहां भी कथित तौर पर डीप स्टेट अपनी साजिशों में लगा हुआ है. भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने मुद्दा उठाते हुए कहा कि जब से देश कूटनीतिक ताकत के तौर पर उभरा है, देश के भीतर विदेशी शक्तियों का दखल चुपके से बढ़ा. इस आरोप के दौरान विवादित अमेरिकी कारोबारी जार्ज सोरोस का भी नाम आया था, जो कथित तौर पर गुप्त तरीके से कई देशों समेत भारत में भी अस्थिरता लाने के लिए फंडिंग कर रहे हैं.
पुराने दौर में भी कई बार इस ताकत की बात हो चुकी. जैसे इमरजेंसी के दौरान कई गैर-निर्वाचित लोगों ने राजनीतिक फैसलों में कथित तौर पर सीधा दखल दिया था. इसी तरह से 2020 में हुए किसान प्रोटेस्ट के दौरान भी माना गया कि आंदोलन को विदेशी एजेंसियों से भारी फंडिंग मिली ताकि वे मौजूदा सरकार को हिला सकें. एनजीओ इसके लिए ब्रिज का काम कर रहे थे, जो पैसे लेकर आंदोलन को हवा दे रहे थे. हालांकि इस तरह की थ्योरी के पीछे कभी कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला लेकिन माना जाने लगा कि देश डीप स्टेट के निशाने पर है ताकि उसे कूटनीतिक और आर्थिक तौर पर कमजोर किया जा सके.
डीप स्टेट का एक उदाहरण देशों में होने वाले घरेलू चुनावों में विदेशी दखल भी है. लगभग हर देश आरोप लगाता रहा कि उसके इलेक्शनों पर फॉरेन पावर हस्तक्षेप कर रहा है. अमेरिका रूस पर तो रूस अमेरिका पर हमलावर रहा. बांग्लादेश ने तो भारत पर ही आरोप लगा दिया था कि उसने शेख हसीना का सपोर्ट करते हुए चुनाव जितवाया था.
भारत में भी लोकसभा चुनावों में डीप स्टेट का जिक्र आता रहा. इलेक्शन इंटरफरेंस के आरोप एक हद तक सच भी हैं. दरअसल सारे देश चाहते हैं कि दूसरे देशों, खासकर पड़ोसी मुल्कों में उसके फायदे की सरकार रहे. इसके लिए वे कई तरह से इलेक्शन पर असर डालने की कोशिश करते हैं. ये काम आसान नहीं तो जाहिर तौर पर इसमें भारी फंडिंग भी होती है, जो बाहर से आती है. इस फंडिंग का उपयोग वे ताकतें करती हैं जो देश में अस्थिरता चाहती हैं. यानी डीप स्टेट महज कंस्पिरेसी थ्योरी नहीं, भले ये बात साबित न हो सके.