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जिस गोरखा रेजिमेंट की बहादुरी चीन को खटक रही, क्या है उसकी कहानी

गोरखा रेजिमेंट और नेपाल के जवानों का संबंध कई दशकों पुराना है. वीर गोरखा भारतीय सेना के शान हैं, और युद्ध में अद्मय साहस का गौरवपूर्ण इतिहास है. यही वजह है कि चीन परेशान है.

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गोरखा रेजिमेंट के जवान (फोटो-PTI)
गोरखा रेजिमेंट के जवान (फोटो-PTI)

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  • भारतीय सेना में गोरखा के शामिल होने से चीन परेशान
  • चीन जानने में जुटा-गोरखा भारतीय सेना में क्यों होते हैं भर्ती
  • भारतीय सेना में हैं करीब 60 से 80 हजार नेपाली गोरखा

चीन सिर्फ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC) पर साजिश नहीं रच रहा बल्कि उसकी साजिश का दायरा कहीं ज्यादा है. LAC पर वो शांति की बात करता है, और दूसरी तरफ भारत को कमजोर करने की उसकी चालबाजी कम नहीं होती. नेपाल में उसके नए गेम प्लान दंग करने वाले हैं. खुलासा हुआ है कि चीन, नेपाल से आने वाले गोरखा जो भारत की सेना में शामिल होते हैं, उसको लेकर परेशान है और साचिश रच रहा है.

गोरखा भारत की सेना का सम्मान हैं. इनके लहू में वीरता घुली हुई है. रेजिमेंट के जवानों में जो नेपाल के रहने वाले हैं उनकी जन्मभूमि भले नेपाल है, लेकिन कर्मभूमि हिंदुस्तान है. लेकिन अब चीन की आंखों में गोरखा रेजिमेंट के वीर नेपाली योद्धा बुरी तरह खटकने लगे हैं.

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सूत्रों के मुताबिक चीन का काठमांडू में दूतावास और नेपाल में उसकी राजदूत हाओ यांकी गोरखा रेजिमेंट में नेपाल के जवानों के शामिल होने का राज जानना चाहती हैं. हाओ यांकी ने एक चीनी एनजीओ चाइना स्ट्डी सेंटर को ये जिम्मा सौंपा है कि वो नेपाल में सर्वे करे और नेपाल के लोगों और भारतीय सेना के बीच इस अटूट रिश्ते की पड़ताल करे.

भारतीय सेना के शान गोरखा

असल में, गोरखा रेजिमेंट और नेपाल के जवानों का संबंध कई दशकों पुराना है. वीर गोऱखा भारतीय सेना के शान हैं, और युद्ध में अद्मय साहस का गौरवपूर्ण इतिहास है. यही वजह है कि चीन परेशान है.

चीन ये जानना चाहता है कि नेपाल के लोग अपनी सेना को छोड़कर भारत की सेना में क्यों शामिल होते हैं? इसकी वजह क्या है? क्या इसके पीछे आर्थिक कारण है या फिर गौरवपूर्ण लंबा इतिहास और परंपरा है जिससे दोनों देश के लोग जुड़े हुए हैं.

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चीन ये जानता है कि गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे बड़ी रेजिमेंटों में से एक क्यों है? करीब 60 से 80 हजार नेपाली गोरखा इस रेजिमेंट का हिस्सा हैं. हर साल नेपाल से करीब 1500 गोरखा सैनिक सेना में शामिल होते हैं. इनकी शौर्य और वीरता की गाथा से भारतीय सेना का इतिहास भरा पड़ा है.

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1962 की चीन से जंग हो या फिर 1965 और 1971 में पाकिस्तान से युद्ध. हर मोर्चे पर गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया है और यही वजह है कि चीन को ये गठजोड़ खटक रहा है.

चीन की चालबाजी

चीन नेपाल को किसी मोहरे की तरफ इस्तेमाल कर रहा है. नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन के इशारों में काम कर रहे हैं. काठमांडू में चीन की राजदूत हाओ यांकी नेपाल के प्रधानमंत्री की संकट मोचक बनी हुई हैं. चीन ने नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा की कुर्सी बचाई और अब वो लागत वसूल रहा है

1947 में समझौता

भारत, नेपाल और ब्रिटेन में गोरखा सैनिकों की सैन्य सेवा के संबंध में 1947 में समझौता हुआ था. इस समझौते के मुताबिक दोनों देश की सेना में नेपाली गोरखाओं की नियुक्ति होती थी, लेकिन हाल में ही नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली ने इस समझौते पर सवाल उठाया था. हालांकि भारत ने इसे ये कहते हुए नकार दिया कि नेपाल की तरफ से ऐसी कोई आधिकारिक बात नहीं की गई. लिहाजा इस पर बात करना अभी जल्दबाजी होगी.

दरअसल, चीन की सरकार और सेना गोरखा रेजिमेंट को लेकर पड़ताल कर रही है. अब आपको ये भी जानना चाहिए कि आखिर चीन की सेना को गोरखा रेजिमेंट में ही इतनी उत्सुकता क्यों है. असल में, गलवान घाटी में मौजूदा तनाव के बाद भारतीय सेना के शौर्य का सामना करने वाली चीन सेना को इसी जगह पर सालों पहले गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने धुल चटा दी थी.

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1962 में चीन के भारतीय इलाकों पर कब्जा के दावों के बाद दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आ गई थीं. भारतीय गोरखा रेजिमेंट ने 4 जुलाई 1962 में घाटी में पहुंचने के लिए एक पोस्ट बनाई थी. इस पोस्ट ने समांगलिंग के एक चीनी पोस्ट के कम्युनिकेशन नेटवर्क को काट दिया. इसे चीन ने अपने ऊपर हमला बताया था. इसके बाद चीन सैनिकों ने गोरखा पोस्ट को 100 गज की दूरी पर घेर लिया था. 4 महीने तक ये घेराबंदी जारी रही, लेकिन गोरखा रेजिमेंट के जवानों ने चीन के सामने झूकने की जगह उसको कड़ी टक्कर देते रहे.

कई देशों में हैं गोरखा

आजादी के बाद हर युद्ध में गोरखा रजिमेंट ने हिस्सा लिया है. गोरखा सिपाही निडरता की ट्रेनिंग के बाद अजेय योद्धा बनते हैं. गोरखा सिपाही दुनिया के सर्वश्रेष्ठ फौजी माने जाते हैं. यही वजह है कि दुनिया के कई देशों में नेपाल के गोरखा हैं. भारतीय सेना के अलावा ब्रिटिश रॉयल आर्मी में भी गोरखा के योद्धा मौजूद हैं. इसके अलावा ब्रूनए में गोऱखा के जवान और सिंगापुर में भी गुरखा कंटिन्जेंट हैं.

1815 में ब्रिटिश सेना ने भारतीय सेना के एक हिस्से के तौर पर इसका गठन किया था और प्रथम जॉर्ज पंचम ने गोरखा राइफल्स का नाम दिया था. आजादी के बाद जब ब्रिटिश वापस लौट रहे थे तो उन्होंने गोरखा रेजिमेंट का भी बंटवारा किया. 10 रेजिमेंट से 1, 3, 4, 5, 8 और नवी रेजिमेंट भारतीय सेना को मिली जबकि 2, 6, 7, 10 वी रेजिमेंट को ब्रटिश अपने साथ रखना चाहते थे और लंदन ले जाना चाहते थे. लेकिन नेपाल के कई सैनिकों ने लंदन जाने से इनकार कर दिया और तब भारत को तुरंत 11वीं गोरखा रेजिमेंट की स्थापना करनी पड़ी.

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