कुत्ते और इंसान सिर्फ सह-अस्तित्व नहीं रखते हैं. वे निकटतम सहयोगी भी हैं, जो एक साथ विकसित हुए हैं. पुरातत्वविदों को कुत्तों और होमो सेपियन्स के एक साथ विकसित होने के प्रमाण मिले हैं. उन्होंने जंगल में भोजन किया, शिकार किया, घूमते रहे और यहां तक कि साथ मिलकर युद्ध भी लड़े.
इतिहासकार युवल नूह हरारी के मुताबिक पालतू कुत्तों के 15,000 साल पुराने होने के पुख्ता संकेत मिल सकते हैं, हालांकि, यह भी हो सकता है कि इसकी शुरुआत हजारों साल पहले ही हो गई हो. किसी दूसरी प्रजाति के विपरीत दोनों ने ही एक दूसरे की रक्षा की है.
कुत्ते किसी भी अन्य जानवर की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से मनुष्यों से संवाद कर सकते हैं और सभ्यता के विकास में उनका योगदान अद्वितीय है. वे अभी भी गार्ड, चरवाहा कुत्तों के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं. हालांकि, यह दोस्ती अब एक कठिन दौर से गुजर रही है, क्योंकि भारत के कई शहरों में आवारा कुत्तों के कारण लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
देश भर में आवारा कुत्तों के काटने और बच्चों की जान तक ले लेने की बढ़ती घटनाओं से विशेषज्ञ और कार्यकर्ता भी हैरान हैं. यहां तक कि कुछ पालतू कुत्ते भी इन घटनाओं में शामिल हैं. कई विशेषज्ञों से बात करने के बाद कुछ प्रमुख कारण सामने आए हैं, जो इस तरह की समस्याओं का कारण हो सकते हैं.
कुत्तों के झुंड में बढ़ोतरी होने पर प्रत्येक कुत्ते के लिए संसाधनों की कमी की समस्या खड़ी हो जाती है. यह कुत्तों में आक्रामक व्यवहार और मनुष्यों और अन्य जानवरों पर हमले की घटनाओं के प्रमुख कारणों में से एक है. यदि कोई परिवार कुत्तों के लिए प्रतिदिन पांच या छह रोटियां दान करता है, तो वह एक दिन के लिए केवल एक कुत्ते के लिए पर्याप्त होगा.
यदि ऐसे कई परिवार हैं, जो भोजन दान करते हैं तो हर घर एक कुत्ते की देखभाल कर सकता है. लेकिन जैसे-जैसे संख्या बढ़ती है, भोजन आवारा कुत्तों के बीच बंट जाता है और यह पर्याप्त नहीं होता. यदि भीड़भाड़ वाले इलाके में बड़ी संख्या में आवारा जानवर हैं, तो उनके लिए कचरे से भोजन हासिल करना भी मुश्किल होगा. आवारा कुत्तों में आक्रामकता के पीछे यह प्रमुख कारण है.
हर साल भारी तादाद में पिल्लों का जन्म होता है. एक मादा कुत्ता एक साल में 20 पिल्लों को जन्म दे सकती है. कुत्तों के झुंड पिल्लों का खयाल रखते हैं. इनमें माता-पिता की भूमिका अहम होती है. अगर कार या बाइक से दुर्घटना के कारण एक भी पिल्ला मर जाता है तो झुंड गाड़ियों को अपना दुश्मन मानने लगता है और उसका पीछा करना शुरू कर देता है. इससे कुत्तों में आक्रामकता भी आती है और इंसानों पर हमले का खतरा बढ़ जाता है.
हालांकि, सभी आवारा कुत्ते आक्रामक नहीं होते हैं. अधिकतर अपने आस-पास किसी इंसान को परेशान नहीं करते हैं. हालांकि, एक आक्रामक कुत्ता लोगों के लिए काफी परेशानियां खड़ी कर सकता है. ऐसा एक कुत्ता दो-तीन दूसरे कुत्तों का झुंड तैयार कर सकता है. वह उनका लीडर बन जाता है. उसके झुंड में कुत्ते आक्रामक हो जाते हैं. यह पालतू कुत्तों और आवारा पशुओं सहित मनुष्यों और अन्य जानवरों के लिए खतरनाक हो जाते हैं.
यदि कोई कुत्ता पालने वाला किसी आवारा कुत्ते में आक्रामकता का पहला लक्षण देखता है, तो इसकी जानकारी तुरंत एजेंसियों को दी जानी चाहिए. यदि कुत्ते का व्यवहार आक्रामक बना रहता है, तो उसे दूसरों की सुरक्षा के लिए डॉग शेल्टर में भेजा जाना चाहिए.
नियमों के मुताबिक ऐसे कुत्तों को उनके इलाके में तभी वापस भेजा जा सकता है, जब उनके व्यवहार में बदलाव दिखे. पशु अधिकार कार्यकर्ता और बचावकर्ता कावेरी राणा भारद्वाज का कहना है कि आक्रामकता के संकेतों को नजरअंदाज करना, आक्रामक कुत्तों का बचाव करना और उन्हें क्षेत्र से हटाने से रोकना विनाशकारी स्थिति पैदा कर सकता है.
कावेरी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के 2001 के आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह नागरिक एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि आवारा कुत्तों की बधिया करके उनकी आबादी नियंत्रित की जाए. कई एनजीओ और कुत्ता प्रेमी भी आवारा पशुओं की नसबंदी और टीकाकरण में मदद करते हैं.