एक सवाल पिछले कई दिन से दिमाग में घुमड़ रहा है, कि क्या भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ या किसी अन्य तरह के कट्टर दक्षिणपंथ से जुड़ा व्यक्ति कवि या लेखक हो सकता है. सवाल तब और साफ हो गया जब वित्त मंत्री ने कह दिया कि साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले लोग दूसरी विचारधारा के हैं और पुरानी सरकारों के राज में माल काटते रहे हैं.
संस्कृति मंत्री पहले ही लेखकों को न लिखने की सलाह दे चुके हैं. और अब तो पूरी सरकार ही नित नए कुतर्कों से लेखकों के विरोध को नाजायज बता रही है. लेकिन इसके बावजूद कोई ऐसा लेखक या कवि अब तक सामने नहीं आया जिसने सरकार का पक्ष लिया हो. तो क्या बीजपी और संघ की विचारधारा या मानसिकता वाले कवियों का देश में अकाल है. बात आगे बढ़े इससे पहले यह साफ कर लिया जाए कि कवि या साहित्यकार में सृजनात्मकता या रचनात्मकता होनी एक बुनियादी शर्त है, इसलिए मोटे-मोटे लेख लिखने वाले लेखक, शोधार्थी, इतिहास के अध्येता, पत्रकार, प्रचारक या अन्य किसी तरह के विद्वान पूरे सम्मान के साथ कवि और साहित्यकार की इस बहस से खुद को बाहर मानें. या और सरल करें तो लेखन की दो मोटी शैलियां फिक्शन और नॉन फिक्शन में से फिक्शन में कभी न कभी कवि या साहित्यकार का कलम चलाना जरूरी है. तो अब मूल सवाल पर लौटते हैं कि क्या भारत में संघी साहित्यकार हो सकता है?
प्रथमदृष्टया तो यही लगता है कि हो सकता है, जब दलित, महिलावादी, साम्यवादी, समाजवादी, स्वच्छंदतावादी, कांग्रेसी और कई बार तो माओवादी भी साहित्यकार हो सकता है तो संघ में ही ऐसी क्या समस्या है? लेकिन समस्या है. जब कोई दलित परिप्रेक्ष्य से लिखने बैठता है तो वह समाज के वंचित दलित तबके पर हुए अत्याचार की बात रखता है. जब लेखक बहुत उग्र और पूर्वाग्रह ग्रस्त हो जाता है तो वाह बामन-ठाकुर या कथित शोषक को गाली-गलौच तक करने लगता है, लेकिन इसके बावजूद वह साहित्य की परिधि में आ जाता है. क्योंकि अंतत: उसकी बात कुचली गई मानवता को उसका उचित स्थान दिलाने के सिद्धांत के आस-पास रहती है. जब कोई कम्युनिस्ट, समाजवादी या माओवादी लेखक होता है तब भी वह सिद्धांतरूप में सर्वहारा वर्ग को सत्ता में पहुंचाने की वकालत करता है. जो एक बार फिर से मानवता के व्यापक मूल्यों के दायरे में आता है. कांग्रेसी लिखेगा तो वह सिद्धांतरूप में गांधीवाद या भारतीयता के भाव के आसपास लिखेगा, क्योंकि तमाम झंझावतों के बावजूद कांग्रेस का लंगर तो सबको साथ लेकर चलने वाले सर्वधर्म समभाव और सामाजिक भाईचारे के आसपास ही पड़ा है.
लेकिन भारत में जब कोई कट्टर दक्षिण पंथ के विचार से कविता या कहानी लिखेगा तो वह कैसी बनेगी? क्या कवि ऐसे लिखेगा, ‘आओ सारे हिंदू भाई, मिलकर देश पर कर लो कब्जा. बाकी फूल रंग बदल लें, चमन में अब तो कमल रहेगा.’ यह बात मजाक लग सकती है, लेकिन दक्षिणपंथ तो हिंदुत्व के विचार पर खड़ा है और फिलहाल देश में हिंदू बाकी किसी भी सामाजिक वर्ग से पीछे नहीं है. दक्षिणपंथ के विचार में बार-बार मुसलमान और ईसाई समुदाय का विरोध आ ही जाता है या यों कहें कि आजादी के आंदोलन में जब बापू ने देश को सफेद टोपी पहनाई थी तो काली टोपी आखिर किस भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए आई थी. ऐतिहासिक संदर्भों से साफ है कि वह जिन्ना के मुस्लिम राष्ट्र के बरअक्स एक हिंदू राष्ट्र के लिए थी. जहां हिंदूओं के अलावा बाकी धर्म के लोग असल में दोयम दर्जे के नागरिक होंगे. ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान में इस्लाम के सामने बाकी धर्म मामने वालों की औकात है.
तो ऐसे में संविधान, भारतीयता और हिंदू धर्म में आस्था रखने वाला कोई व्यक्ति दक्षिणपंथ का कवि कैसे बनेगा, क्योंकि यहां उसके पास मानवता की बात करते समय ईसाई या मुसलमान की बात करने की छूट नहीं होगी. बल्कि हो सकता है ज्यादातर मौकों पर उसे कमजोर पर हुए जुल्म के साथ खड़ा होना होगा. कभी उसे किसी मस्जिद को गिराने को उचित बताना होगा, तो कभी गणेश जी को दूध पिलाना होगा. उसे इस काल्पनिक भय को प्रचारित करना होगा कि मुसलमान इस देश पर कब्जा कर लेंगे और अगर कहीं ऐसा नहीं हुआ तो मिशनरी तो देश को लूट ही लेंगे. उसके लेखक बनने के लिए दो विकल्प बचेंगे एक जब पाकिस्तान से युद्ध हो रहा हो. लेकिन इस समय वह भी वही लिख रहा होगा जो बाकी विचारधाराएं लिख रही होंगी. यानी उसका विचारधारा का कुंवारापन यहां काम नहीं आएगा. दूसरी स्थिति यह होगी कि ऐसा दुर्लभ क्षण आए जब अल्पसंख्यक तबका बहुसंख्यक तबके पर अत्याचार करे. लेकिन इसकी कोई सूरत दूर-दूर तक नजर नहीं आती.
हां, दक्षिणपंथी हिंदुत्व वाले कवि और लेखक बांग्लादेश, पाकिस्तान या दुनिया के किसी अन्य देश में हो सकते हैं. वहां जब वे अपनी बात कहेंगे तो अंतत: वह एक वंचित तबके की बात होगी, एक अल्पसंक्चयक तबके की बात होगी, जिसे हमेशा समाज में अपना वजूद बचाने के लिए संघर्ष करना है. जाहिर हैं ये परिस्थितियां अभी मुल्क में नहीं हैं, इसलिए सरकार को अपने मन का कवि नहीं मिल पा रहा है. और उसे पूरी भारतीय मेधा को दूसरी विचारधाराओं का क्रीतदास बताने को मजबूर होना पड़ रहा है. इस तरह से सरकार और दक्षिणपंथ सिर्फ अपनी भद्द पिटवा रहा है और कुछ नहीं.
एक बात और. कुछ लोग सोच रहे होंगे कि वेद जैसी प्राचीन रचना, कालिदास जैसे महाकवि, वाल्मीकि और तुलसी जैसे रामभक्त कवियों के होते हुए, जबरन ही दक्षिणपंथ को कविशून्य बताया जा रहा है. तो इस सवाल करने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि ये सब मुक्ति के कवि हैं, मानवता के कवि हैं. उनमें से किसी की कलम इस बात के लिए नहीं चली कि कमजोर को मार दो. अगर इस संस्कृति को भारतीय दक्षिणपंथ ने अपने उदय के समय ही समझ लिया होता तो वह महात्मा गांधी के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आंदोलन के साथ होता न कि काली टोपी लगाए दंड-बैठक करता. बेहतर होगा कि साहित्यकारों को गाली देने के बजाय दक्षिणपंथ भारतीय संस्कृति को गलत तरीके से समझने की अपनी ऐतिहासिक और घातक भूल सुधार ले. फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता.