एक महिला ने शादी के बाद पति को पाने के लिए 17 साल की अदालती जंग आखिरकार जीत ली. कोलकाता की अदालत से शुरू हुई ये जंग कानपुर, इलाहाबाद फिर सुप्रीम कोर्ट होते हुए जब कानपुर निकली तो कई साल की पैरवी के बाद आखिर पत्नी को अदालत से न्याय मिल गया. अदालत ने पति वापस किया. यह जानकर हैरानी जरूर होगी लेकिन हकीकत में मंजरी नाम की महिला को अपने पति को पाने के लिए 17 साल की जंग लड़ने पर मजबूर होना पड़ा.
दरअसल, मंजरी का पति कोलकता के अरबपति और चर्चित घराने का पोता है, जिनका नाम गौरव सेक्सेरिया है. शुरुआत में मंजरी 16 साल तक पति के साथ रही, फिर उन्हीं से 17 साल तक तलाक के मुकदमे पर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ती रही सिर्फ इसलिए क्योंकि उसे पति के साथ रहना था और वह तलाक नहीं चाहती थी. आखिर अदालत ने उसको न्याय दे दिया.
इस कानूनी जंग के दौरान मंजरी अपने पिता के घर रह रही थी और साथ ही अपनी विकलांग बेटी की परवरिश करती रही. मंजरी के पिता सत्य प्रकाश कनोडिया कानपुर के सर्किट हाउस के पास के रहने वाले हैं. उन्होंने अपनी बेटी मंजरी की शादी कोलकाता के नामी गिरामी परिवार सीताराम सेक्सेरिया के पोते गौरव सेक्सेरिया के साथ की थी. 26 जनवरी 1987 को जब दोनों की शादी हुई तब मंजरी अपने दिल में कई सपनों को संजोकर ससुराल कोलकता पहुंची. लेकिन समय का चक्र ऐसा चला कि मंजरी ने एक बेटी के बाद दूसरी दिव्यांग बच्ची को जन्म दे दिया. नतीजा यह निकला कि ससुराल पक्ष के लोगों ने उसको घर से निकाल दिया.
घर से निकाले जाने के बाद मंजरी अपने मायके कानपुर लौट आई. मंजरी ने बताया कि ससुराल वाले लड़का चाहते थे, लेकिन लड़की पैदा हो गई. उसके बाद एक और लड़की पैदा हुई, लेकिन वो दिव्यांग थी. इसे देखते हुए ससुरालवालों ने क्रूरता दिखाना शुरू कर दिया लेकिन मेरे पति का व्यवहार मेरे साथ नहीं बदला और हम लोग संयुक्त परिवार में रहते रहे. 1998 में मंजरी की देवरानी को जब लड़का हुआ तो उसके बाद प्रॉपर्टी को लेकर विवाद शुरू हो गया.
मंजरी ने पति से तलाक की लम्बी लड़ाई जरूर लड़ी लेकिन उसने पति को कभी बुरा नहीं समझा. उसका मानना था पति सीधे थे इसलिए देवर-देवरानी उन पर दबाव बनाकर तलाक दिलाना चाहते थे. मंजरी के पिता सत्य प्रकाश कनोडिया का कहना है कि मंजरी के ससुरालवालों ने कोलकाता पारिवारिक न्यायालय में 2003 में तलाक का मुकदमा दायर किया. केस करने के बाद ससुराल वाले हमें प्रताड़ित करने लगे. मेरे ऊपर कई फर्जी मुकदमे लगवा दिए गए. उसके बाद मंजरी ने 29 अप्रैल 2013 को मुकदमा कानपुर कोर्ट में स्थानांतरित करवा लिया.
सत्य प्रकाश कनोडिया ने आगे कहा कि 17 साल बाद न्यायालय का फैसला मंजरी के पक्ष में दिया और पति-पत्नी दोनों को एक साथ रहने की इजाजत दे दी. मंजरी ने कहा कि जो लोग भगवान पर विश्वास करते हैं उनको जीत हमेशा मिलेगी. अदालत ने 17 साल बाद न्याय दिया है. सच्चाई की जीत हुई है.
मंजरी के वकील नरेस चंद्र त्रिपाठी का कहना है कि साल 2011 के बाद कानपुर कोर्ट में मंजरी के केस की सुनवाई शुरू हुई जिसके बाद गौरव केवल एक बार न्यायालय में हाजिर हुए. गौरव ने वहां स्वीकार किया कि मंजरी मेरी पत्नी है और हम दोनों एक साथ रहना चाहते हैं, लेकिन गौरव का भाई सौरव सेक्सेरिया और उसकी पत्नी और ससुराल के सभी लोग अरबों की संपत्ति को हजम करने की फिराक में थे.
वकील नरेस चंद्र त्रिपाठी ने आगे बताया कि इस पूरे मुकदमे में कानपुर पारिवारिक न्यायालय के जज रवींद्र अग्रवाल ने जब पूरे मुकदमे को समझा तब उन्होंने अपने आदेश में कहा कि मामला संपत्ति से संबधित है. न्यायालय की तरफ से सेक्शन 13 को खारिज कर दिया गया और सेक्शन 9 अपने आप प्रभावहीन हो गया. मंजरी के अधिवक्ता का कहना है कि न्यायपालिका की कलम में दम और क्षमता है जिसकी वजह से मंजरी को इंसाफ मिल सका.
वकील का कहना है कि 17 साल तक लड़ी कानूनी लड़ाई में आखिरकार मंजरी को वो मुकाम तो हासिल हो गया जिसकी वो हकदार थी. लेकिन समाज में तमाम ऐसी कई महिलाए हैं, जिनको अभी न्याय मिलने की आस बाकी है फिर भी मंजरी के मामले को देखकर ऐसे लोगों को कानून पर भरोसा बनाए रखना चाहिए.