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उत्तर प्रदेश

अलीगढ़ में सियासत को याद आ रहे राजा महेंद्र सिंह, हाथरस में खंडहर बन चुकी है विरासत

Raja Mahendra Pratap Singh
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने अलीगढ़ (Aligarh) दौरे पर जिस राजा महेंद्र प्रताप सिंह यूनिवर्सिटी (Raja Mahendra Pratap Singh University) का शिलान्यास किया, उन राजा की विरासत यानी कि उनका किला खंडहर बन चुका है. आजतक ने ग्राउंड पर जाकर उनके किले की पड़ताल की. आइए जानते हैं किस हाल में है राजा महेंद्र प्रताप की 'निशानी'..  

Raja Mahendra Pratap Singh
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आपको बता दें कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िले की मुरसान रियासत के राजा थे. जाट परिवार से आने वाले राजा महेंद्र के व्यक्त‍ित्व की खासी पहचान रही है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाने-माने जाट शासक के तौर पर उनको जाना जाता है. 
 

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राजा महेंद्र का किला हाथरस के मुरसान में है. हालांकि, ये किला अब खंडहर में तब्दील हो चुका है. जहां कभी किला हुआ करता था, वहां अब खंडहर बचा है. 

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राजा महेंद्र प्रताप सिंह के वंशज इस ध्वस्त हुए किले से कुछ ही दूरी पर रहते हैं. लेकिन ना ही सरकारी विभागों ने और ना ही वंशजों ने किले की देखरेख पर ध्यान दिया. 

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किले के चारों ओर जंगल जैसा नजारा है. जर्जर हाल में इमारत दिन पर दिन नीचे गिर रही है. सीढ़ियों के रास्ते किले की प्राचीर पर जाना भी मुश्किल है. एक-एक ईंट किले की बदहाली की गवाही दे रही है. 

Raja Mahendra Pratap Singh
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ईंटें गिरने से सीढ़ियों पर चढ़ना खतरनाक हो गया है. इमारत के अंदर बाहर पेड़-पौधे उग आए हैं. दीवारें अपनी जर्जर हालत को बयां करती हुई नजर आ रही हैं.  

Raja Mahendra Pratap Singh
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जहां कभी राजा महेंद्र प्रताप सिंह का दरबार लगता था, वहां पर अब कबूतर रहते हैं. लोगों ने दीवारें भी खराब कर दी हैं. स्थानीय लोगों की मांग है कि राजा की विरासत पर सरकार ध्यान दे. लोगों का कहना है कि इस किले का फिर से रखरखाव हो. हाथरस जिले का नाम भी राजा जी के नाम पर रखने की मांग हो रही है.

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राजा के किले को देखकर यही लग रहा है कि आज भले ही उनको याद किया जा रहा हो, लेकिन नेताओं को उनकी विरासत की कितनी परवाह रही है, इसपर सवाल खड़ा किया जा सकता है. अब देखना होगा कि राजा की विरासत की कब सुध ली जाएगी. 

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राजा की शख्सियत के बारे में आपको बताएं तो उस जमाने में महेंद्र प्रताप सिंह एक पढ़े-लिखे राजा होने के साथ साथ एक अच्छे लेखक और पत्रकार के तौर पर भी जाने गए. उन्हें भारत की पहली निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति के तौर पर भी पहचाना जाता है. बताया जाता है कि जब पहला विश्वयुद्ध हो रहा था, उस दौरान एक दिसंबर, 1915 को उन्होंने अफगानिस्तान जाकर भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई, जिसमें वो स्वयं राष्ट्रपति थे. उनके बारे में इतिहास में और भी कई बातें दर्ज हैं. 

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