वाराणसी, मथुरा, आगरा और दिल्ली समेत देश की अलग अलग जगहों पर धार्मिक स्थलों को लेकर चल रहे विवाद के बीच ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने देश के मुस्लिमों के लिए एक संबोधन जारी किया है. इसका शीर्षक है, 'भारत के मुसलमानों को मस्जिदों की रक्षा और सेवा के लिए हर समय तैयार रहना चाहिए'. इतना ही नहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सभी इमामों और प्रचारकों से इस विषय पर बोलने का अनुरोध किया है.
इससे पहले ज्ञानवापी मस्जिद और कुतुब मीनार को लेकर जारी विवाद के बीच ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने बुधवार को एक मीटिंग बुलाई थी. इस मीटिंग में एक प्रस्ताव पास किया गया. इसमें केंद्र सरकार से प्लेसेस ऑफ वर्सिप एक्ट 1991 की धारा 3 के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने की मांग की गई है. यह धारा पूजा स्थलों के बदलाव पर रोक लगाती है.
इतना ही नहीं मीटिंग में ये भी तय हुआ है कि बोर्ड के सदस्य राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करेंगे और उन्हें मस्जिदों और पुरातत्व स्मारकों के सर्वे को रोकने की मांग को लेकर ज्ञापन देंगे.
प्लेसेस ऑफ वर्सिप एक्ट के खिलाफ SC में याचिका
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ये बैठक उस वक्त हुई, जब सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को एक नई याचिका दायर कर प्लेसेस ऑफ वर्सिप एक्ट 1991 को चुनौती दी गई है. स्वामी जितेन्द्रनाथ सरस्वती की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि ये कानून धर्मनिरपेक्षता और कानून के शासन के सिद्धांतों का खुलकर उल्लंघन करता है. साथ ही यह नागरिक अधिकारों को लेकर भी अवैध है.
याचिका में कहा गया है कि 1192 से 1947 के बीच विदेशी हमलावरों ने हिंदू, सिख, जैन और बौद्धों के सैकड़ों धार्मिक स्थलों को ध्वस्त किया है. इतिहास में इसकी जानकारी और प्रमाण हैं. लेकिन ये कानून ऐसी जगहों पर देवी देवताओं की उपासना, सेवा और पूजा करने के अधिकार को हासिल करने के लिए कोर्ट जाने से रोकता है.
क्या है प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट?
1990 में अयोध्या में राम मंदिर को लेकर आंदोलन हुआ था. उस वक्त मौजूदा नरसिम्हा राव सरकार ने देशभर में अलग-अलग धार्मिक स्थलों को लेकर बढ़ते विवाद को देखते हुए 11 जुलाई 1991 को Places of Worship Act 1991 लेकर आई थी. इस एक्ट के अनुसार 15 अगस्त 1947 को जो धार्मिक स्थल जिस स्थिति में था और जिस समुदाय का था, भविष्य में भी उसी का रहेगा. लेकिन अयोध्या का मामला उस समय हाई कोर्ट में था इसलिए उसे इस कानून से अलग रखा गया था.
1991 में केंद्र सरकार जब ये कानून लाई तब भी संसद में इसका विरोध हुआ था और इस मामले को संसदीय समिति के पास भेजने की मांग उठाई गई थी. हालांकि ये एक्ट पास होकर लागू हो चुका था. इसके बाद नवंबर 2019 में राम मंदिर विवाद खत्म होने के बाद काशी और मथुरा सहित देशभर के लगभग 100 मंदिरों की जमीनों को लेकर दावेदारी की बात उठने लगी. लेकिन Places of Worship Act के कारण दावेदारी करने वाले लोग, अदालत का रास्ता नहीं चुन सकते, इससे ये विवाद और बढ़ता चला गया.