खजाने की खोज में उन्नाव के डौंडिया खेड़ा गांव में खुदाई शुरू हो गई है. सोना चाहे निकले ना निकले, लेकिन इस खबर से अब अन्य कई जगहों पर भी खजाना होने की बातें सामने आने लगी है. हजार टन सोना दबा होने का दावा करने वाले बाबा शोभन सरकार की माने तो फतेहपुर तहसील के आजमपुर गांव में इससे भी दोगुना सोना यानी ढाई हजार टन सोना जमीन में गड़ा हुआ है.
साधु बाबा के दावे के बाद अब मिर्जापुर के लोग भी यहां स्थित चुनार किले में खुदाई की मांग कर रहे हैं. लोगों का दावा है कि यहां भी खजाना गड़ा हुआ है. लोगों का मानना है कि अगर पुरातत्व विभाग इस किले की आधुनिक ढंग से खुदाई कराये तो यहां एक विशाल खजाना मिल सकता है.
इसी किले पर लिखा गया था चंद्रकांता
ये वही चुनारगढ़ का किला है जिसपर देवकीनंदन खत्री नें मशहूर उपन्यास चंद्रकांता लिखा था. ये किला हमेंशा से ही अपने रहस्य और तिलिस्म के लिये मशहूर रहा है. अगर इस किले के इतिहास पर नजर डालें तो मिर्जापुर से लगभग 35 किलोमीटर दूर स्थित इस किलें का निर्माण 56 ईसा पूर्व में उजैन के तत्कालीन महाराज विक्रमादित्य नें करवाया था.
कई राजाओ और सम्राटों के शौर्य का गवाह बना यह किला कालांतर में मुग़ल शासक बाबर के अधीन आ गया. 1531 ई. में यह किला हुमायूं के हाथ से निकल कर शेरशाह सूरी के हाथों में आ गया. लेकिन शेरशाह सूरी के मरने के बाद एक बार फिर से 1574 ई. में यह किला मुग़ल शासक अकबर के कब्जें में आ गया. इस किलें को बिहार और बंगाल का गेट माना जाता था. तब से ले कर 1772 ई. तक चुनार किला मुग़ल सल्तनत के अधीन रहा. जिसके बाद मुगलों से ईस्ट इण्डिया कंपनी ने यह किला जीता लिया, उसके बाद से इस किले पर अग्रेंजो का कब्ज़ा हो गया.
गंगा के किनारे बने इस किले को हमेशा से ही रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण माना गया. देश में शासन करनेवाले हर राजा के लिए चुनार का किला जीतना शान का प्रतीक बन गया था. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस किले के निर्माण से लेकर अंग्रेजों के किलें पर कब्जे तक करीब 17 या 18 राजाओं नें इस किले पर राज किया. इन राजाओं का संचित धन अवश्य ही खजाने के रूप में किले के अंदर कहीं न कहीं गड़ा हुआ हैं. उत्तर प्रदेश सरकार ने कई साल पहले किले की सुरक्षा के लिए यहां पर पुलिस कैम्प लगा दिया है. डौंडियाखेड़ा में खजाने को लेकर हो रही खुदाई की खबर सुनने के बाद अब यहां के स्थानीय निवासी भी इस किले में छिपे हुये खजाने की खोज करने की मांग करने लगे हैं.
एक स्थानीय निवासी लाल बहादुर ने बताया, पूरे विश्व में ऐसा किला नहीं है. यहां पर मान्यता है कि दिल्ली तक रास्ता यहीं से जाता है. यहां पर राजा भतृहरि की समाधि है. भारत को खड़ा किया जा सकता है अगर खजाना मिले तो मगर कोई खोजने का प्रयास ही नहीं कर रहा है. ये अगर विदेश में होता तो अब तक खोजा जा चुका होता. अब तो नई तकनीक आ गयी है. अग्रेंजों ने खजाना खोजने का प्रयास किया मगर जो भी उस गुफा में गया वह बाहर नहीं आया. सरकार खोजने का प्रयास ही नहीं कर रही है.
एक और स्थानीय निवासी व गाइड अशोक ने बताया, 'इसका नाम चारण गढ़ पड़ा. इस किले का उल्लेख द्वापर युग से हुआ है. राजा भृतिहरि के केए इस किले का निर्माण विक्रमानाथ ने कराया था. काशी नरेश ने आजादी के बाद इस किले को मांगा, साथ ही इसके बदले भारत का सभी कर्ज चुकाने की बात की, मगर तत्कालीन प्रधानमंत्री ने किला देने से मना कर दिया.