
शराब कहने को बुरी चीज है, लेकिन जब बात राजस्व की आती है तो सरकारी खजाने को भरने में इसका बड़ा योगदान रहता है. बाकी राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश की स्थिति भी ऐसी ही है. इंडिया टुडे द्वारा दायर एक RTI में बड़ी जानकारी सामने आई है. इसमें पता चला है कि पिछले 15 साल में उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा शराब की दुकानें (Liquor Shops in UP) किसके शासन काल में खुलीं. किसके शासन काल में शराब से सरकारी खजाना कितना बढ़ा.
सबसे पहले जानिए कि उत्तर प्रदेश की जनसंख्या करीब 20 करोड़ (uttar pradesh population) है, इनकी जनसंख्या पर वहां 27,352 शराब की दुकानें हैं. दिल्ली से इसका तुलना करें तो यहां 1.5 करोड़ की जनसंख्या पर 850 शराब के ठेके हैं.
उत्तर प्रदेश में शराब से होने वाली कमाई की बात करें तो राज्य के राजस्व की कुल कमाई का 10 फीसदी हिस्सा शराब के उत्पाद शुल्क (excise duty) से आता है. वित्त वर्ष 2020-21 की बात करें तो उत्पाद शुल्क और शराब की दुकानों के लिए ली जाने वाली लाइसेंस फीस से यूपी को करीब 30,061 करोड़ की कमाई हुई है.
RTI से मिले जवाब के मुताबिक, योगी सरकार के चार साल से ज्यादा के कार्यकाल में 2076 नई शराब की दुकानों को लाइसेंस मिला. शराब से मिलने वाले राजस्व में इस दौरान 74 फीसदी का उछाल देखा गया. इसमें राजस्व 17,320 करोड़ से 30,061 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. मतलब 12,741 ज्यादा.
इससे पहले अखिलेश यादव यानी समाजवादी पार्टी की सरकार के वक्त 5 सालों में 2566 शराब की दुकानें खुली थीं. इससे राजस्व में 11.5 फीसदी का उछाल आया. इसमें राजस्व 4490 करोड़ रुपये बढ़कर 22,377 करोड़ रुपये से 24,943 करोड़ रुपये पहुंचा था.
वहीं उससे पहले बहुजन समाज पार्टी यानी मायावती (मई 2007 से मार्च 2012) की सरकार में 3621 शराब की दुकानें खुलीं. इससे राजस्व 106 फीसदी तक बढ़ा. इसमें शराब की दुकानें वित्त वर्ष 2007-08 में 17,287 थीं, जिनकी संख्या बढ़कर 2011-12 में 20,908 हुई. इसमें राजस्व 3948 करोड़ से 8139 करोड़ पर पहुंचा था.
अगर तीनों सरकारों का सालाना औसत लगाए जाए तो योगी सरकार में हर साल अबतक 500 शराब की दुकानें खुलीं. वहीं अखिलेश के शासन काल में भी सालाना करीब 500 दुकानें खुलीं. वहीं मायावती की सरकार में सालाना औसतन 724 नई शराब की दुकानें खुलीं.