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उत्तर प्रदेश में धान की सरकारी खरीद शुरू होने के बीच धान का कटोरा कहे जाने वाले चंदौली जिले के किसान परेशान हैं. इनकी परेशानी धान को बेचने की नहीं, बल्कि उसे खेत से घर ला पाने से जुड़ी है. नुनारी गांव के रहने वाले इंद्रजीत यादव के खेत में लगे धान की बालियां काली पड़ चुकी हैं. वह इस असमंजस में हैं कि अब फसल को काटे या उसे खेत में ही जला दें, क्योंकि बालियां बिन दानों के रह गई हैं.
धान उगाने में देश के दूसरे सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से में इस बार इसकी फसल को हर्दिया रोग ने चौपट कर डाला है. इसकी वजह से धान की पूरी फसल का नुकसान उठा चुके किसान इंद्रजीत कहते हैं कि उन्होंने फसल बचाने के लिए तमाम दवाओं का छिड़काव किया, लेकिन उपज को बचा नहीं पाए.
खेती के साथ-साथ सरकारी नौकरियों के लिए तैयारी करने वाले इंद्रजीत बताते हैं कि उम्मीद थी कि इस बार धान की फसल अच्छी होगी. लेकिन जरूरत से ज्यादा बारिश धान की बर्बादी की वजह बन गई. वह कहते हैं कि दरअसल लगातार बारिश हुई और धूप नहीं निकली, इस बीच तापमान लगातार 20-22 सेंटीग्रेड से ऊपर बना रहा, उमस के चलते धान में फ्लावरिंग, फूल से बालियां बनने के समय पीलापन आने लगा, जो धान को चौपट करने वाली फाल्स स्टम रोग लगने का सीधा संकेत था. इंद्रजीत का कहना है कि धान की फसल लगाने समय बीज को शोधित करने से लेकर सही मात्रा में जिंक, सल्फर, डीएपी सब कुछ डाला था, लेकिन ये रोग कैसे लगा, कुछ समझ में नहीं आ रहा.
करीब 200 किलो मीटर की दूरी पर बसे देवरिया जिले के एक किसान शिवलाल गोंड स्थानीय बोली में बताते हैं, ’इ साल सब अच्छा रहल ह, बारिश लगातार भइल. लेकिन हथिया क पानी सब खराब क दिहलस ह.’ (इस साल सब अच्छा था. बारिश अच्छी हुई. लेकिन हथिया नक्षत्र में कई दिनों तक तेज हवा के साथ बारिश हुई और सब चौपट हो गया.) गाजीपुर जिले में विश्वंभरपुर गांव के राधेश राय भी कुछ ऐसी ही वजह से धान की फसल चौपट होने की बात कहते हैं. उन्होंने कहा कि अंतिम दिनों में तेज हवा के साथ बारिश हुई, जिसके चलते पूरी फसल गिर गई, जो कुछ बची है, उसमें लेढ़ा रोग लग गया.
धान की बालियों में लगने वाले इस रोग को पूर्वी उत्तर प्रदेश में कहीं लेढ़ा तो कहीं हर्दिया रोग कहा जाता है. कृषि वैज्ञानिक इसे कंडुआ रोग (False smut) बताते हैं. एक अनुमान है कि इस साल गोरखपुर, देवरिया, मऊ, बलिया, गाजीपुर, चंदौली, जौनपुर सहित पूर्वी यूपी के कई और जिलों में धान की फसल इसकी चपेट में आई है.
क्या है कंडुआ रोग
असल में, धान की अधिक उपज देने वाली संकर प्रजातियों में अक्टूबर से नवंबर महीने के बीच कंडुआ रोग लगने का खतरा रहता है. मौसम में बदलाव और बारिश के साथ तापमान में उतार-चढ़ाव से इस रोग के पनपने की आशंका बढ़ जाती है. दरअसल, यह रोग फंगस है, जिसे वातावरण में ज्यादा नमी (आद्रता) से फलने-फूलने का मौका मिलता है. इससे प्रभावित बालियों के दानों के अंदर रोगजनक फंगस अंडाशय को कुरूप बना देते हैं. धान की बालियों में यह बबूल की फूल की तरह उभर कर दूर से दिखाई देने लगता है. इसके पीले रंग की वजह से ही किसान इसे हर्दिया रोग कहते हैं, जो आगे चलकर काला पड़ जाता है और बालियां बिना दाने के रह जाती हैं.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, डिपार्टमेंट ऑफ एग्रोनॉमी के प्रोफेसर राम कुमार सिंह इस कंडुआ रोग को ‘धान का कोरोना’ करार देते हैं. वह बताते हैं कि यह फसल में तेजी से फैलने वाला संक्रामक रोग है, यह ठीक नहीं हो सकता है. इतने बड़े पैमाने पर इस रोग के फैलने की वजह पूछे जाने पर प्रोफेसर राम कुमार सिंह ने कहा, ‘यह सीड बॉर्न डिजीज है, फंगस है, इसे कंट्रोल नहीं किया जा सकता, यह हवा, पानी या किसी दूसरे माध्यम से हेल्दी फसलों में भी लग जाता है. लेकिन यह बीमारी स्वस्थ फसलों को चपेट में न ले, इसके कुछ उपाय जरूर किए जा सकते हैं. जैसे किसान भाइयों को चाहिए कि वह इस बीमारी से ग्रसित खेतों की तरफ सुबह न जाएं, वरना यह फंगस उनके कपड़ों में चिपककर धान की दूसरी स्वस्थ फसलों तक जा सकता है.’
प्रोफेसर राम कुमार सिंह कंडुआ रोग से निपटने के लिए इससे ग्रसित फसलों को पूरी तरह नष्ट करने की सलाह देते हैं. उन्होंने बताया कि इससे प्रभावित फसलों को जड़ समेत निकाल लें, अगर कुछ दाने निकालने लायक हों तो उसे निकाल लें और फिर इसके पुआल को जलाकर नष्ट कर दें. इसके साथ-साथ खरपतवार नाशक का छिड़काव करके खेत की नालियों और मेढ़ पर लगी घासों को भी नष्ट कर दें.
हालांकि, इस रोग के जोखिम से बचने के लिए प्रोफेसर राम कुमार सिंह ने कुछ और उपाय भी बताए. उन्होंने कहा कि बेहतर रहे अगर किसान धान की बुवाई 15 जून तक कर लें, देरी से बुवाई करने पर इस बीमारी के उभरने की आशंका बढ़ जाती है. वे आगे कहते हैं कि देर से बुवाई होने पर धान में फूल देरी से मतलब अक्टूबर की शुरुआत में आते हैं, जब मौसम में उमस और नमी दोनों ज्यादा होती है, यह रोग के पनपने के लिए सबसे अनुकूल होता है.
वे बुवाई के समय कुछ एहतियात बरतने की भी सलाह देते हैं. उन्होंने कहा कि दो से ढाई ग्राम कॉपर ऑक्सीकोलोराइड को एक लीटर पानी में मिलाकर उसका छिड़काव करना चाहिए. अमूमन एक हेक्टेयर फसल में 500-600 लीटर ऐसे घोल की जरूरत पड़ती है. प्रोफेसर राम कुमार सिंह धान की बाली आने के दौरान उसे इंफेक्शन से बचाने के लिए प्रोपोकोनिजोल का स्प्रे करने की भी सलाह देते हैं.
बड़े पैमाने पर धान की फसल में कंडुआ रोग लगने की मूल कहानी बीज से जुड़ रही है. देवरिया के किसान विजय शंकर यादव बताते हैं, ‘यह रोग धान की उन फसलों में लगा है जो संकर प्रजाति के हैं. सरजू बावन, मोती सहित अन्य जवारी (देसी) धान की फसलों में यह बीमारी नहीं के बराबर लगी है. धान की बाल में लावा जैसा बन रहा है. इस एरिया में करीब 80 फीसदी किसानों की धान की फसल चौपट हो चुकी है.’
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हालांकि, बीज के सवाल पर प्रोफेसर राम कुमार सिंह कहते हैं कि कोई भी बीज खास पर्यावरण और इलाके के लिहाज से कई सालों के रिसर्च के बाद आता है. मसलन सूखा, बाढ़, जल भराव या तराई वाले इलाकों के लिहाज से अलग-अलग बीज तैयार किए जाते हैं. लेकिन होता ये है कि किसान इन बीजों के इन खास गुणों को समझे बगैर किसी दूसरे इलाके के लिए मुफीद बीज को अपने यहां इस्तेमाल कर लेते हैं, और शुरुआत के चार पांच साल में कोई खास समस्या नहीं आती है, लेकिन इसके बाद बीज और इससे होने वाली फसल में कई दिक्कतें आती हैं.
खत्म होती देसी बीज की संस्कृति
हाइब्रिड बीजों के बढ़ते इस्तेमाल के बारे में जब स्वदेशी विज्ञान संस्थान, गोरक्ष प्रांत के संयोजक डॉ. अचल से पूछा गया तो उन्होंने देसी बीजों को संजोने की संस्कृति कमजोर पड़ने को मुख्य वजह बताया. उन्होंने कहा कि भारतीय किसानों पर मल्टीनेशनल कंपनियों का असर बढ़ रहा है, इससे वे खेती के अपना पारंपरिक ज्ञान का इस्तेमाल करने से पीछे हट रहे हैं. हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर संकर बीज नहीं आए होते तो इतनी बड़ी आबादी का पेट भरने का अनाज कहां से आता? डॉ. अचल संकर बीज को अपनाने के साथ देसी बीजों को भी संजोने की जरूरत बताते हैं.
प्रोफेसर राम कुमार सिंह भी डॉ. अचल की बातों से सहमत नजर आते हैं. हालांकि, वे देसी बीजों की संस्कृति खत्म होने के पीछे आधुनिक खेती के समर्थकों से हुई चूक की तरफ भी इशारा करते हैं. वह कहते हैं कि कृषि क्षेत्र में जो नई चीजें आ रही हैं, उसके बारे में तो हम किसानों को बताते हैं, लेकिन समयाभाव और अन्य वजहों से यह बताने से चूक जाते हैं कि खेती के पारंपरिक ज्ञान को भी बचाए रखना जरूरी है, हमें पुरखों के अनुभव से हासिल ज्ञान, तकनीक, खेती के तौर-तरीकों और बीजों को भी बचाकर रखना है.
(गाजीपुर से विनय कुमार के इनपुट के साथ)