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SC पहुंचा श्रीकृष्ण जन्मभूमि केस, ईदगाह को संपत्ति सौंपने के 53 साल पुराने फैसले की SIT जांच की मांग

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. ये मामला पहले से ही मथुरा की जिला अदालत में लंबित है. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में मांग की गई है कि 1968 में जन्मभूमि को लेकर जो समझौता हुआ था, उसकी जांच एसआईटी से कराई जाए.

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मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर. (फाइल फोटो-PTI)
मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर. (फाइल फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मथुरा की जिला अदालत में पेंडिंग है मामला
  • याचिकाकर्ताओं ने SC में भी दाखिल की याचिका
  • वकील हरिशंकर जैन ने इसका विरोध किया

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में 53 साल पुराने समझौते की एसआईटी जांच कराने की मांग की है. इसी समझौते के खिलाफ पहले से ही मथुरा की जिला अदालत में सुनवाई चल रही है. इसलिए याचिकाकर्ताओं के वकील हरिशंकर जैन ने इस फैसले का विरोध किया है और वो सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के खिलाफ इंप्लिडमेंट याचिका दाखिल करने वाले हैं.

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हरिशंकर जैन का कहना है कि जब पहले ही मथुरा की जिला अदालत में सिविल सूट पर सुनवाई चल रही है, तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की जरूरत ही नहीं है. पहले जिला अदालत और फिर हाईकोर्ट का इस पर फैसला आ जाए, तो ये सही होगा.

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में क्या है मांग?
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में कृष्ण जन्मभूमि को समझौते के जरिए दूसरे पक्ष को देने को चुनौती दी गई है. याचिका में कहा गया है कि हिंदुओं के साथ धोखा करके कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की संपत्ति बिना किसी कानूनी अधिकार के अनाधिकृत रूप से समझौता करके शाही ईदगाह को दे दी गई जो गलत है. याचिका में मांग की गई है कि कोर्ट घोषित करे कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान की ओर से 12 अगस्त, 1968 को शाही ईदगाह के साथ किया गया समझौता क्षेत्राधिकार के बिना किया गया था. इसलिए वो किसी पर भी बाध्यकारी नहीं है.

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याचिका में कहा गया है कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ने बिना किसी अधिकार के कृष्ण जन्मभूमि और ट्रस्ट की संपत्ति समझौते के जरिए दूसरे पक्ष को दे दी. ये हिंदुओं के साथ धोखा है. याचिका में मांग की गई है कि इस समझौते की एसआईटी जांच की जाए. इसके साथ ही श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा चलाया जाए.

क्या है 1968 का समझौता?
मथुरा में शाही ईदगाह मस्जिद कृष्ण जन्मभूमि से सटी हुई है. 1935 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी के हिंदू राजा को उस ज़मीन के कानूनी अधिकार सौंप दिए थे जिस पर मस्जिद खड़ी थी. 7 फरवरी 1944 को जुगल किशोर बिरला ने मदन मोहन मालवीय के कहने पर कटरा केशव देव की ज़मीन राजा पटनीमल के वंशजों से खरीद ली.

1951 में यह तय हुआ कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा और ट्रस्ट उसका प्रबंधन करेगा. लेकिन ट्रस्ट की स्थापना से पहले ही मथुरा के मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने 1945 में एक रिट दायर कर दी थी जिसका फैसला साल 1953 में आया और उसके बाद ही मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो सका जो फरवरी 1982 में जाकर पूरा हुआ.

इसी दौरान साल 1964 में इस संस्था ने पूरी जमीन पर नियंत्रण के लिए एक सिविल केस दायर किया, लेकिन 1968 में खुद ही मुस्लिम पक्ष के साथ समझौता कर लिया. इस समझौते के बाद मुस्लिम पक्ष ने मंदिर के लिए अपने कब्ज़े की कुछ जगह छोड़ी और इसके बदले में मुस्लिम पक्ष को पास की जगह दे दी गई. यही वो समझौता है जिसके खिलाफ ये याचिका दायर की गई.

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