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PM मोदी ने कैबिनेट विस्तार से कैसे UP में गढ़ा 'अभेद्य चक्रव्यूह', 2022 जीतने की है तैयारी

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव को देखते हुए सूबे से सबसे ज्यादा सात मंत्री बनाए गए हैं. कैबिनेट विस्तार में यूपी से तीन दलित, तीन ओबीसी और एक ब्राह्मण समुदाय को जगह दी है. पीएम मोदी ने कैबिनेट विस्तार के जरिए यूपी में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाने के साथ-साथ मजबूत चक्रव्यूह भी गढ़ है.

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केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर और पीएम नरेंद्र मोदी
केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर और पीएम नरेंद्र मोदी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यूपी से मोदी कैबिनेट में 7 मंत्रियों को मिली जगह
  • मोदी कैबिनेट में 3 दलित, 3 ओबीसी, 1 ब्राह्मण
  • मोदी ने कैबिनेट के जरिए साधा जातीय समीकरण

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला कैबिनेट विस्तार बुधवार को किया गया. उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले चुनाव को देखते हुए सूबे से सबसे ज्यादा सात मंत्री बनाए गए हैं. कैबिनेट विस्तार में यूपी से तीन दलित, तीन ओबीसी और एक ब्राह्मण समुदाय को जगह दी है. पीएम मोदी ने कैबिनेट विस्तार के जरिए यूपी में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाने के साथ-साथ मजबूत चक्रव्यूह भी गढ़ दिया है, जिसमें भेद पाना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा? 

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यूपी विधानसभा चुनाव के लिहाज केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में सात मंत्रियों को शामिल किया है, जिसमें बीजेपी कोटे से पंकज चौधरी, भानु प्रताप वर्मा, बीएल वर्मा, कौशल किशोर, एसपी सिंह बघेल और अजय मिश्र हैं. इसके अलावा अपना दल से अनुप्रिया पटेल को मौका दिया गया है. सातों नए मंत्री का चयन पीएम मोदी ने बहुत बारीकी से किया है. इनके जातिगत समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन बनाने का ख्याल रखा गया है.

यूपी के एक मंत्री पर 5 जिले का जिम्मा?

पीएम मोदी सहित यूपी से 9 मंत्री पहले से हैं और अब विस्तार के बाद यह आंकड़ा बढ़कर 16 पर पहुंच गया है. इस तरह पीएम मोदी को छोड़कर अब छह सवर्ण, छह पिछड़ा वर्ग और तीन अनुसूचित जाति से मंत्री हो गए हैं.सूबे में 80 लोकसभा और 75 जिले हैं. ऐसे में एक मंत्री के जिम्मे पर पांच जिले की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने यूपी में 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव पांच-पांच जिलों में बैठकें करके बीजेपी के कमल खिलाने में कामयाब रहे हैं. वहीं, अब मंत्रियों के कंधों पर भी ऐसी ही जिम्मा दिया जा सकता है. 

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माना जा रहा हैकि पीएम मोदी ने इसी फॉर्मूले के तहत सात महीने के बाद यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव में इन्हें मोर्चे पर लगाया जा सकता है. इतना ही नहीं जल्द ही पीएम मोदी और अमित शाह का यूपी दौरा भी शुरू होने जा रहा है. जुलाई के आखिरी सप्ताह में पीएम मोदी वाराणसी में कई परियोजना को हरी झंडी देंगे और यह सिलसिला विधानसभा चुनाव तक जारी रहेगा. ऐसे में पीएम मोदी ने यूपी में अपनी टीम का गठन कर 2022 के चुनाव के लिए मजबूत सियासी आधार खड़ा करने की कोशिश की है.

यूपी से 6 सवर्ण मंत्रिमंडल में शामिल

मोदी में यूपी कोटे के मंत्रियों में पांच सवर्णों की भागीदारी पहले हैं, जिनमें रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, डा. महेंद्र नाथ पांडेय, जनरल वीके सिंह, स्मृति ईरानी और हरदीप पुरी पहले से हैं. वहीं, अब एक और ब्राह्मण को शामिल कर यूपी में विपक्ष द्वारा उठाए जा रहे ब्राह्मणों से भेदभाव के मुद्दे को भी कुंद करने का प्रयास किया गया है. जातीय संतुलन के साथ क्षेत्रीय संतुलन का भी पूरा ध्यान इस विस्तार में रखा गया है. 

बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव से ही बीजेपी के पाले में आ खड़े हुए यूपी में सर्वाधिक आबादी वाले पिछड़ा और अन्य पिछड़ा वर्ग को तीन नए मंत्री बनाकर पीएम मोदी ने 'साथ और विकास' का संदेश दिया है. यह दांव पिछड़ों को अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रही समाजवादी पार्टी के दांव को बेअसर करने वाला माना जा रहा है. इसी तरह बसपा के कोर माने जाते रहे 22 फीसद अनुसूचित जाति के वोट में भी भाजपा अच्छी सेंध लगा चुकी है. इस वर्ग पर मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए दलित वर्ग से भी तीन मंत्री शामिल किए गए हैं. 

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कुर्मी समुदाय को भी साधने की कोशिश

पूर्वांचल में पिछड़ों में कुर्मी समुदाय भी यादवों की तरह सियासी तौर पर काफी ताकतवर है, जिस पर सभी पार्टियों की नजर रहती है. बीजेपी अपनी ओर खींचने के लिए प्रदेश अध्यक्ष के साथ क्षेत्रीय अध्यक्ष का भी चेहरा आगे करती रही है. वहीं, पीएम मोदी गोरखपुर बेल्ट से कुर्मी समुदाय से आने वाले महाराजगंज के सांसद पंकज चौधरी जगह दी है. पंकज चौधरी छह बार के सांसद हैं और पूर्वांचल के कुर्मी समाज के बीच अच्छी पैठ मानी जाती है. 

मिर्जापुर विध्यांचल क्षेत्र से अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल को मंत्रिमंडल में जगह मिली. अनुप्रिया भी ओबीसी वर्ग के कुर्मी समुदाय से आती हैं. मोदी ने अनुप्रिया को शामिल कर सहयोगी दलों के साथ-साथ यूपी के बड़े वोट वैंक को मजबूती के साथ जोड़े रखने का दांव चला है. यूपी में कुर्मी मतदाता 7 फीसदी है, जो सूबे की करीब तीन दर्जन विधानसभा सीटें और 8 से 10 लोकसभा सीटों पर  निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

पूर्वांचल में निर्णायक भूमिका में कुर्मी समाज

यूपी में कुर्मी जाति की संत कबीर नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर, बस्ती और बाराबंकी, कानपुर, अकबरपुर, एटा, बरेली और लखीमपुर जिलों में ज्यादा आबादी है. यहां की विधानसभा सीटों पर कुर्मी समुदाय या जीतने की स्थिति में है या फिर किसी को जिताने की स्थिति में.  

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मौजूदा समय में यूपी में कुर्मी समाज के बीजेपी के छह सांसद और 26 विधायक हैं. केंद्र की मोदी सरकार में दो मंत्री इसी समुदाय से शामिल किए गए हैं. इसके अलावा यूपी में योगी सरकार में कुर्मी समुदाय के तीन मंत्री है. इसमें कैबिनेट मंत्री मुकुट बिहारी वर्मा, राज्यमंत्री जय कुमार सिंह 'जैकी' हैं. इस तरह से यूपी के कुर्मियों पर बीजेपी ने अपनी और भी पकड़ को मजबूत बनाने की कवायद की है. 

आगरा बेल्ट को साधने का बीजेपी प्लान

पश्चिमि यूपी से आगरा के सांसद एसपी बघेल को मंत्रिमंडल में जगह मिली है, जो अनुसूचित जाति से आते हैं. हालांकि, उन्हें पाल जाति से माना जाता है. बघेल समाज यूपी में अति पिछ़ड़ी जाति में आती है, जिसका बृज के क्षेत्र में अच्छा खासा सियासी आधार है. सपा से अपना सियासी सफर शुरू किया और बसपा से होते हुए बीजेपी में आए हैं. ऐसे में पीएम मोदी ने उन्हें कैबिनेट में जगह देकर पाल और बघेल समुदाय को सियासी संदेश देने की कवायद की है. इतना ही नहीं आगरा का इलाका बसपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, जिसे पर बीजेपी इन दिनों काफी मेहरबान है. यूपी के एससी-एसटी आयोग और अल्पसंख्यक आयोग की कमान भी आगरा के नेता को मिली है. 

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पीएम मोदी ने अपनी कैबिनेट में ओबीसी से आने वाले बीएल वर्मा को भी शामिल किया है, जिन्हें पिछले साल ही राज्यसभा में लाया गया था. बीएल वर्मा बदायूं से आते हैं और आरएसएस से जुड़े रहे हैं. बीएल वर्मा ओबीसी के लोधी समाज से आते हैं जो कल्याण सिंह के दौर से बीजेपी का कोर वोटबैंक हैं. यूपी में लोध समुदाय भले ही 3 फीसदी के करीब है, लेकिन जिन इलाके में है, वहां पर जीतने की ताकत रखता है. खासकर मुलायम सिंह की बेल्ट में लोध वोटर ही बीजेपी का सियासी आधार है. 

लोध समुदाय के वोटों पर भी नजर 

कल्याण सिंह अब पहले की तरह राजनीति में सक्रिय नहीं है और लंबे समय से बीमार चल रहे हैं. ऐसे में पीएम मोदी ने उन्हीं के करीबी बीएल वर्मा को अपनी कैबिनेट में लाकर यूपी के लोध समुदाय को साधने का बड़ा दांव चला है. बृज क्षेत्र से लेकर रुहेलखंड और बुलंदेखंड तक लोधी समुदाय सियासी तौर पर बीजेपी के लिए ट्रंप कार्ड साबित हो सकते हैं. 

वहीं, अवध क्षेत्र में लखनऊ के मोहनलालगंज सीट से सांसद कौशल किशोर को पीएम मोदी ने अपनी कैबिनेट में शामिल किया है. कौशल किशोर दलित वर्ग के पासी समुदाय से आते हैं, जो अवध और पूर्वांचल में सियासी तौर पर काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं. दलितों में जाटव-चमार के बाद सबसे बड़ी आबादी पासी समुदाय की है, जो एक समय कांग्रेस का मजबूत वोटबैंक हुआ करता था. लखनऊ, बाराबंकी, हरदोई, रायबरेली, अमेठी, कौशांबी बहराइच, उन्नाव में पासी वोटर निर्णायक भूमिका में है. इसी समीकरण को देखते हुए पीएम मोदी ने कौशल किशोर पर दांव लगाया है. 

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दलितों को भी मिला प्रतिनिधित्व

मोदी कैबिनेट में दलित समुदाय से आने वाले भान प्रताप वर्मा को भी जगह मिली है, जो जालौन जैसे पिछड़े जिले से आते हैं और 30 साल से बुंदेलखंड के इस इलाके में बीजेपी का झंडा बुलंद किए हैं. भानु प्रताप वर्मा जालौन से पांच बार के सांसद हैं. आजादी के बाद जालौन से दूसरी बार ही कोई मंत्री बना है. भानु प्रताप वर्मा बीजेपी के अनुसूचित मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. वो दलितों में कोरी समाज से आते हैं. यूपी में बुंदेलखंड और कानपुर के बेल्ट में कोरी समुदाय काफी अहम भूमिका में है. ऐसे में पीएम मोदी ने उन्हें कैबिनेट में जगह देकर कोरी समाज को सियासी तौर पर बड़ा संदेश देने की कोशिश की है. 

ब्राह्मण समुदाय को सियासी संदेश

यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोटर काफी निर्णायक है, जिसे देखते हुए पीएम मोदी ने रूहेलखंड क्षेत्र के लखीमपुरखीरी से सांसद अजय मिश्र टेनी को मंत्रिमंडल में जगह मिली है. माना जा रहा है कि उन्हें ब्राह्मण चेहरे के तौर पर कैबिनेट में शामिल किया गया है. यूपी में भले ही ब्राह्मण 8 से 10 फीसदी हो, लेकिन राजनीतिक रूप से वो करीब पांच दर्जन विधानसभा सीटों पर असर रखते हैं. हालांकि, मोदी कैबिनेट में ब्राह्मण चेहरे के तौर पर महेंद्रनाथ पांडेय पहले से मंत्रिमंडल में शामिल हैं.  

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