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अखिलेश से अलगाव, माया ने नहीं दिया भाव, अब सिर्फ बीजेपी के सहारे राजभर की नाव

उत्तर प्रदेश में इन दिनों सियासी हलचल काफी बढ़ गई है. ओम प्रकाश राजभर का सपा से नाता टूट गया है और नए दोस्ती की तलाश में है. राजभर अब बसपा से साथ हाथ मिलाना चाहते हैं, लेकिन मायावती उन्हें भाव नहीं दे रही है. बीजेपी भी साइलेंट मोड में है. ऐसे में सियासी मझधार में फंसे राजभर के पास बहुत ज्यादा विकल्प नहीं है?

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ओम प्रकाश राजभर
ओम प्रकाश राजभर

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ सपा की अगुवाई में बना विपक्षी खेमा बिखरने लगा है. सपा से गठबंधन टूटने के बाद सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर अब बसपा से हाथ मिलाने की बात कर रहे, लेकिन मायावती उन्हें तवज्जो नहीं दे रही हैं. बीजेपी भी राजभर को फिर से साथ लेने के लिए बहुत जल्दबाजी के मूड में नहीं दिख रही है. सपा से किनारा कर कहीं राजभर सियासी मझधार में फंस तो नहीं गए हैं? 

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बता दें कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने शनिवार को शिवपाल सिंह यादव और सहयोगी ओम प्रकाश राजभर को 'आजादी' वाला लेटर भेजा तो दोनों ही नेताओं ने अखिलेश के इस 'तलाकनामे' को स्वीकार भी कर लिया. सपा से दोस्ती टूटने के बाद राजभर नए सहयोगी की तलाश में जुट गए हैं. ऐसे में राजभर की पहली प्राथमिकता बसपा नजर आ रही है और मायावती के साथ गठबंधन करने का खुला ऐलान कर रहे हैं.

राजभर को मायावती नहीं दे रही भाव 

ओम प्रकाश राजभर को मालूम है कि बसपा सूबे में अपनी सियासी जड़े जमाने में जुटी है. मायावती अपने संगठन में दलितों के साथ मुस्लिमों को भी ला रही हैं. यही वजह है कि राजभर की कोशिश बसपा से गठबंधन करने की है. राजभर ने कहा कि अब हम गठबंधन के लिए बसपा अध्यक्ष मायावती का दरवाजा खटखाटएंगे. साथ ही उन्होंने कहा कि पूर्वांचल में उनकी पार्टी का मजबूत संगठन हैं. अगर बसपा के साथ उनके समाज का वोटर जुड़ जाएगा तो बसपा और मजबूत होकर उभरेगी. 2024 के पहले अभी बहुत गोलबंदी होगी देखते जाइए. 

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राजभर भले ही अपनी तरफ से बसपा से हाथ मिलाने की बात कर रहे है. लेकिन मायावती ने उनके अरमानों पर पानी फेर दिया. भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद ने राजभर को 'स्वार्थी' करार दिया है. आकाश आनंद ने सोमवार को किसी का नाम लिए बगैर कहा, 'कुछ अवसरवादी लोग भी बहनजी के नाम के सहारे अपनी राजनीतिक दुकान चलाने की कोशिश करते हैं. ऐसे स्वार्थी लोगों से सावधान रहने की जरूरत है.' इससे साफ जाहिर होता है कि बसपा, राजभर को कोई खास तवज्जो नहीं दे रही है. 

राजभर के सामने सिर्फ बीजेपी ही विकल्प

वहीं, ओम प्रकाश राजभर की पार्टी के साथ दोबारा से हाथ मिलाने के लिए बीजेपी भी बहुत ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रही. राजभर ने जरूर कहा कि बीजेपी की ओर से कोई ऑफर आता है तो जरूर राय-मशवरा करेंगे. बीजेपी इस बार उन्हें लेकर बहुत सावधानी के साथ कदम बढ़ा रही है. बीजेपी इस बात को समझ रही है कि मायावती के किनारा करने के बाद सूबे में राजभर के पास कोई खास सियासी विकल्प नहीं बचा रहा है. हालांकि, राजभर ने राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू को समर्थन किया था. 

अंसारी बंधु के चलते राजभर से दूरी

बीजेपी और राजभर की दोस्ती में एक बड़ा रोड़ा मुख्तार अंसारी को माना जा रहा है. राजभर का मुख्तार अंसारी मोह, जिसे बीजेपी पचाने के लिए तैयार नहीं हैं. विधानसभा चुनाव से पूर्व राजभर ने जेल में मुख्तार अंसारी से मिले थे और सूबे में उन्हीं की एक एकमात्र पार्टी है जो अंसारी बंधुओं का खुलकर समर्थन करते रही है. राजभर की पार्टी सुभासपा से मुख्तार अंसारी के पुत्र अब्बास अंसारी विधायक हैं. ऐसे में राजभर न तो अंसारी बंधुओं से किनारा कर सकते और न ही मुख्तार अंसारी के चलते भाजपा उनको साथ नहीं ले सकती. योगी आदित्यनाथ की सरकार अंसारी बंधुओं पर नकेल कर सियासी एजेंडा सेट कर रही है.

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राजभर सियासी मझधार में फंसे

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सपा से गठबंधन तोड़कर ओम प्रकाश राजभर फंस गए हैं. बीएसपी भाव नहीं दे रही है और ऐसे में अब अगर भाजपा के साथ राजभर का गठबंधन नहीं हो पाया तो 2024 के चुनाव में उनके लिए बड़ी सियासी चुनौती खड़ी हो जाएगी. इसके अलावा ओम प्रकाश राजभर ने ओबीसी आरक्षण को दो हिस्सों में बंटाने को लेकर बीजेपी के साथ नाता तोड़ा था, लेकिन अभी भी उसका समाधान नहीं हो पाया है. सूबे में छोटी-छोटी पार्टियों अपने दम पर किसी तरह की कोई उल्टफेर करने की ताकत नहीं रखती है, जिसके लिए राजभर के पास सीमित विकल्प बचे हैं. 

हालांकि, राजभर 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद से भाजपा के प्रति उनका नरम रवैया अख्तियार कर रखा है. ऐसे में अंदर पक रही सियासी खिचड़ी की ओर भी इशारा कर रहा है, लेकिन बीजेपी न तो पत्ते खोल रही है और न ही उन्हें सियासी अहमियत दे रही है. हालांकि, उन्हें वाईश्रेणी की सुरक्षा जरूर मुहैया करा दिया है, लेकिन हाथ मिलाने और सरकार में उन्हें शामिल करने को लेकर अभी तक कोई बात सामने नहीं आ सकी है. ऐसे में देखना है कि राजभर अब सूबे में दोस्ती का नया ठिकाना किसे बनाते हैं? 
 

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