क्या संवेदनहीन हो गई है उत्तर प्रदेश सरकार? क्या मौजवाद में बदल गया है मुलायम सिंह यादव का समाजवाद? ये सवाल इस लिए उठ रहे हैं क्योंकि प्रदेश में जहां एक ओर लोग मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित राहत शिविरों में ठंड में मरने के लिए मजबूर हैं वहीं सैफई में लोक कला संस्कृति को बढ़ावा देने के नाम पर बॉलीवुड के ठुमके पर पानी की तरह पैसा बहाया गया.
कहते हैं जब रोम जल रहा था वहां का शासक नीरो बंशी बजा रहा था. ऐसा ही कुछ नजारा उत्तर प्रदेश में भी देखने को मिला. सैफई महोत्सव में एक ओर जश्न मनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों को राहत शिविर में भी कोई राहत नहीं मिल रही है.
मुजफ्फरनगर से सैफई तक में बदल गई प्रदेश की तस्वीर...
एक ही प्रदेश में दुनिया कैसे बदल जाती है ये मुजफ्फरनगर से सैफई का फासला बताता है. पांच घंटे का ये सफर तय कर लें, तो दोजख से जन्नत का सफर पूरा हो जाए. मुजफ्फनगर में दंगा पीड़ितों के राहत शिविर की बदइंतजामी के साथ सैफई महोत्सव की तस्वीरों को देखें तो मन में यही सवाल उठेगा कि आखिर यूपी सरकार को क्या हो गया है?
कहीं चकाचौंध तो कहीं बेबसी के आंसू...
बॉलीवुड के तमाम छोटे-बड़े सितारे मुलायम और अखिलेश के अंगने में उनकी धुन पर नाचने पहुंचे थे. वहीं सैफई से कुछ दूर मुजफ्फरनगर अपनी बेबसी पर आंसू बहा रहा था. आज मुजफ्फरनगर भी सोचता होगा कि काश मेरी किस्मत सैफई जैसी होती. एक तरफ ये दुआ कि काश ये रात थम जाए, दूसरी तरफ बदइंतजामी के बीच राहत कैंपों में कड़ाके की ठंड से जूझते दंगा पीड़ितों की दुआ कि काश रात जल्द कट जाए. मुजफ्फरनगर के कैंप में लोग मरें तो मरें फर्क नहीं पड़ता. सैफई में जश्न फीका नहीं होना चाहिए. सैफई में बीती रात के चकाचौंध को देखकर यही समझ में आता है.