यूपी के बड़े राजनीतिक परिवार में जन्म लेने वाले, भारत के पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह के बेटे और यूपी सीएम अखिलेश यादव प्रदेश की जनता से आजकल कुछ खफा खफा से हैं. वजह है जनता में घटती लोकप्रियता की फिक्र. जी हां, अगर चेहरा पहचानने को लोकप्रियता का पैमाना मान लिया जाए तो पिछले दिनों कम से कम दो मौकों पर उनसे मिलने आए आम लोग मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पहचान नहीं पाए.
न CM को पहचाना, न मंत्री को
और तो और जोर दे कर पूछने पर भी ये लोग ना तो यूपी विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडे, न ही पीडब्लूडी मंत्री शिवपाल यादव और न ही सीएम अखिलेश यादव को पहचान पाए. इस बात ने अखिलेश यादव को असमंजस में डाल दिया. खास बात ये थी कि अखिलेश उस वक्त बेमौसम बरसात से पीड़ित किसानों को राहत राशि बांट रहे थे. मुख्यमंत्री का दावा है कि मुआवजे की ऐसी रकम न तो किसी दूसरे राज्य ने और न ही केंद्र सरकार ने कभी बांटी. ऐसे में मदद ले रहे किसान और उनके परिवारों का उन्हें ना पहचान पाना उन्हें सकते में डाल गया.
अखिलेश ने कहा, 'आप बताइए 7 से 12 लाख तक की मदद पहुंचा रहे हैं. फसलों का नुकसान हुआ वहां भी मदद पहुंचाई. अभी जब मुख्यमंत्री कार्यालय में जहां एक कार्यक्रम था जहां एक सदस्य की मदद कर रहे थे. लोक निर्माण मंत्री और विधान सभा अध्यक्ष थे मेरे साथ. जिनकी मदद की जा रही थी उस महिला से पूछा कि आप लोक निर्माण मंत्री जी को पहचानती हैं, उसने कहा नहीं. स्पीकर साहब को भी नहीं पहचानती थी वो. और तो और हमें भी नहीं पहचानती थी. तो अगर हम ठीक तरह से अपनी बात, समाजवादियों की बात लोगों तक पहुंचा दें तो सोच लीजिये कितने सदस्य बन जाएंगे. हम तो कई दलों को अकेले उत्तर प्रदेश में ही पीछे छोड़ देंगे.'
अखिलेश ने छलकाया पहचान का दर्द
दरअसल सीएम अखिलेश यादव बीजेपी के सदस्यता अभियान पर पत्रकारों के सवाल का जवाब दे रहे थे जिस पर बोलते-बोलते पहचान खोने का दर्द खुद-ब-खुद छलक आया. उनके मुताबिक सपा सरकार लगातार प्रदेश के विकास और जनता की भलाई के काम कर रही है, मगर इस काम का ठीक से प्रचार नहीं हो पा रहा है. इसके लिये अखिलेश यादव ने पार्टी के कार्यकर्ता और सरकार को तो जिम्मेदार ठहराया ही. साथ ही ये भी कह डाला की जिस प्रदेश की जनता अपने सीएम को नहीं पहचान पा रही है वहां की मीडिया को भी इस घटना से सबक लेना चाहिये.
जब उनसे पूछा गया कि लोग उन्हें क्यों नहीं पहचान पा रहे हैं, तो उन्होंने कहा, 'देखिये हम लोगों को गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए. कई बार लोग नहीं पहचानते हैं. जनेश्वर मिश्र जी ने कहा था एक बार मुझको. और मैंने कई बार लोगों से पूछा है और वो बिलकुल सही निकली बात. मान लो हम समाजवादी पेंशन दे रहे हैं. गरीबों की मदद कर रहे हैं और गरीब ही हमें पहचान नहीं पा रहा है. ये मदद हमारे कार्यकर्ताओं को... और हमें आपकी मदद से करनी चाहिये. बल्कि हमारे-आपके लिए भी सबक है कि हम आपसे मदद ले रहे हैं तब भी नहीं पहुंच रही बात. और हमारा कार्यकर्ता भी नहीं पहुंचा पा रहा है. और सरकार भी नहीं बता पा रही है कि ये योजना समाजवादी पार्टी ने.... देखो अब ये आरोप मत लगाना की कार्यकर्ता काम नहीं कर रहा है. मैं ये कह रहा हूं कि हमारे वर्कर्स को ये एक्सरसाइज करनी चाहिये पॉलिटिकल सिस्टम में कि समाजवादी पेंशन समाजवादी सरकार दे रही है. समाजवादी सरकार है इसलिये किसानों को इतनी राहत दी गई है. सपा सरकार है इसलिये किसानों का दुर्घटना बीमा पांच-पांच लाख रुपये और कई परिवारों को 12-12 लाख रुपया दिया गया है. पूरे प्रदेश में.'
क्या चुनाव से पहले की छटपटाहट है?
जाहिर है बीते लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद जिस तरह यूपी सरकार ने विकास के एजेंडे पर जोर दिया है अपनी बात लोगों तक न पहुंचा पाने की छटपटाहट सीएम अखिलेश यादव की बातों से साफ झलक रही है. विधान सभा का 2017 में होने वाला चुनाव सिर पर है और ऐसे में नई नई योजनाओं के ताबड़तोड़ उद्घाटन और लोकार्पण कर समाजवादी पार्टी की सरकार वोटरों के बीच अपनी छवि सुधारना चाहती है. शायद इसलिए बेमौसम बरसात के बाद किसानों की मदद के लिये जहां केंद्र ने अभी तक 253 करोड़ रुपया ही भेजा है यूपी सरकार 1400 करोड़ रुपये बांट चुकी है. ऐसे में उनकी सरकार से मदद पाने वाले किसानों और आम लोगों का उनको न पहचान पाना सीएम अखिलेश यादव को बुरी तरह खटक रहा है.