उत्तर प्रदेश के जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में प्रतापगढ़ उन चुनिंदा सीटों में से एक है, जहां बीजेपी का अब तक खाता नहीं खुला है. वहीं, 2010 का चुनाव छोड़ दें तो 1995 से लेकर चार बार जिला पंचायत के चुनाव में रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया का ही जादू चला. सूबे में इस बार बीजेपी की सरकार होने के नाते पहली बार जिला पंचायत की कुर्सी पर कब्जा जमाने के लिए जोर आजमाइश कर रही है जबकि सपा सबसे बड़ी पार्टी है और कांग्रेस किंगमेकर की भूमिका में है. ऐसे में प्रमोद तिवारी ने राजा भैया के साथ हाथ मिलाकर सपा और बीजेपी रोकने ही नहीं बल्कि जिले में नई सियासी इबारत लिखने के भी संकेत दे दिए हैं.
प्रतापगढ़ के जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में बीजेपी की ओर से क्षमा सिंह मैदान में है जबकि सपा ने अमरावती देवी को मैदान में उतारा है. वहीं, राजा भैया ने अपनी जनसत्ता पार्टी से माधरी पटेल को उम्मीदवार बनाया है. इस तरह से प्रतापगढ़ में जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए त्रिकोणीय मुकाबला है. ऐसे में सबके अहम भूमिका में जिले के कद्दावर कांग्रेसी नेता प्रमोद तिवारी आ गए हैं.
जिले में किसके कितने पंचायत सदस्य
जिला पंचायत के कुल 57 सदस्य है, जिनमें से सबसे ज्यादा 17 सदस्य सपा के जीतकर आए हैं. जनसत्ता पार्टी से 11 सदस्य जीते हैं जबकि बीजेपी के महज 7 सदस्य जीते हैं. इसके अलावा 5 सदस्य कांग्रेस के जीते हैं और 17 अन्य जीते हैं. अन्य में बसपा, निर्दलीय, आम आदमी पार्टी के सदस्य हैं. जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर कब्जा करने के लिए 29 सदस्यों के बहुमत की जरूरत है.
बसपा ने पहले ही जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव से अपने को अलग कर लिया है. ऐसे में चुनाव से पहले सदस्यों को अपने पाले में करने के लिए सियासी दिग्गजों में खींचतान मची है. प्रमोद तिवारी ने कांग्रेस के साथ-साथ निर्दलीय सदस्यों में से 7 सदस्यों को अपने साथ मिला लिया है, जिसके चलते अब उनके पास कुल संख्या 12 हो गई है. वहीं, जिला पंचायत पर काबिज होने के लिए बीजेपी के दिग्गज नेता भी डेरा डाले हुए हैं.
किंगमेकर की भूमिका में प्रमोद तिवारी
प्रतापगढ़ जिले की सियासत की नब्ज को करीब से टटोलने के बाद दांव खेलने में माहिर कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी एक बार फिर किंगमेकर की भूमिका में नजर आ रहे हैं. जिला पंचायत के चुनाव में कांग्रेस के सिर्फ पांच जिला पंचायत सदस्य होने के बाद भी भाजपा और सपा को रोकने के लिए उन्होंने गोट बिछा दी है. अब वह अपनी रणनीति में कितने सफल हो पाते हैं, इसका पता तीन जुलाई को मतदान के बाद चलेगा.
सूबे में भले ही कांग्रेस का ग्राफ गिरा है, लेकिन कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी का प्रतापगढ़ में दबदबा बरकरार है. पंचायत चुनाव में कांग्रेस के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले सिर्फ पांच सदस्यों को जीत मिली थी. परिणाम आने के बाद उन्होंने सात और सदस्यों को साध लिया. लालगंज में मौजूद बारह सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से उसी व्यक्ति को अपना वोट देने की बात कही, जिसे प्रमोद तिवारी अपना समर्थन देंगे.
प्रमोद तिवारी-राजा भैया साथ आए
साल 2011 में प्रमोद कुमार मौर्या को अध्यक्ष बनवाने में भी प्रमोद तिवारी का अहम योगदान था. सपा समर्थित प्रत्याशी घनश्याम यादव को रोकने के लिए प्रमोद तिवारी ने पूरी ताकत झोंक दी थी, उनके प्रयास से ही क्षेत्रीय दलों ने एकजुट होकर बसपा प्रत्याशी प्रमोद कुमार मौर्य को जीत दर्ज कराई थी. इस बार चुनाव में प्रमोद तिवारी ने राजा भैया के जनसत्ता दल को समर्थन का ऐलान कर दिया है.
प्रमोद तिवारी के समर्थन के बाद राजा भैया की जनसत्ता पार्टी के उम्मीदवार माधरी पटेल का सियासी पल्ला काफी भारी हो गया है. जनसत्ता पार्टी के 11 सदस्य है और प्रमोद तिवारी के 12 सदस्यों के बाद यह आंकड़ा 23 पर पहुंच गया है. इसके अलावा राजा भैया ने पिछले दिनों जिले विश्वनाथगंज के अपना दल (एस) के विधायक आरके वर्मा के घर गए थे, जिसके बाद माना जा रहा है उनके समर्थन से जीते दो सदस्य भी साथ आ सकते हैं. इस तरह से राजा भैया के प्रत्याशी के जीत की राह आसान होती नजर आ रही है.
प्रतापगढ़ की सियासत पर राजा का दबदबा
बता दें कि पिछले ढाई दशक से प्रतापगढ़ की सियासत में राजा भैया की तूती बोलती है और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में उनके समर्थक की ही जीत होती रही है. साल 1995 में राजा भैया के करीबी हरिवंश सिंह की पत्नी अमरावती सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुईं थीं. फिर साल 2000 में बिदेश्वरी पटेल, साल 2005 में कमला देवी और वर्ष 2016 में उमाशंकर यादव अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे.
मायावती की सरकार में पहली बार बसपा ने 2010 में खाता खुला था और बसपा प्रत्याशी रहे प्रमोद मौर्य ने राजा भैया के समर्थक घनश्याम यादव को पराजित किया था. राजा के इस चुनाव में मात प्रमोद तिवारी के चलते हो गई थी. पिछले चुनाव में सपा का भी खाता खुल गया था, यह बात और है कि सपा ने सिर्फ प्रत्याशी घोषित किया था और चुनावी रणनीति राजा भैया व उनकी टीम ने बनाई थी. इस बार राजा भैया और प्रमोद तिवारी मिलकर सपा और बीजेपी दोनों ही पार्टियों को जिला पंचायत पर काबिज होने से रोकने में जुटे हैं. यह समीकरण ऐसे ही बना रहा तो 2022 के चुनाव में नई सियासी इबारत लिखी जा सकती है.