देश में हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है. राइट टू एजुकेशन (RTE) के तहत मुफ्त शिक्षा का प्रावधान भी है. संविधान की तरफ से बाकायदा इसे मौलिक अधिकारों में शुमार किया गया है. लेकिन लगता है कि ये अधिकार की बातें अब तक सिर्फ कागजों में ही दर्ज हैं. यूपी के बुलंदशहर के स्कूल की कहानी तो यही बताती है.
यहां के स्कूल शिक्षा की बदहाली की नई कहानी बयां कर रहे हैं. जिन हाथों में किताब होनी चाहिए थी, उन्हीं मासूमों के हाथों में कचरा, झाड़ू है. बच्चों को शिक्षा के बदले बेगार में लगाया गया है, क्या ये बाल मजदूरी नहीं है? जिन हाथों को अपना भविष्य संवारना था, उनसे स्कूल की गंदगी साफ कराई जाती है.
जो हाथ बड़े होकर देश की गाड़ी खींचते, वो आज यहां स्कूल का रिक्शा खींच रहे हैं. यही नहीं, इलाके के प्रधान के भाई बच्चों के सामने स्कूल में बीड़ी फूंकते हुए नजर आते हैं. वे स्कूल में मास्टरजी की कुर्सी पर बैठकर बच्चों को धूम्रपान की शिक्षा बांटते हुए दिखते हैं.
शिक्षा के अधिकार का ये मजाक वैसे तो यूपी के बुलंदशहर के एक प्राथमिक सरकारी स्कूल में उड़ाया जा रहा है. लेकिन ऐसी कहानी कमोबेश हर जगह की है. पढ़ाई के नाम पर बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ पर ये दो सफायी भी सुनायी दी. एक को ऐसा कुछ भी नहीं दिखा और दूसरी को मजबूरी ही दिखती है बस.
वैसे स्कूल की शिक्षिकाओं से इससे बेहतर जवाब की उम्मीद भी नहीं थी, जब यूपी के बेसिक शिक्षा मंत्री ही मजबूरी गिनाने में लगे हुए हैं तो आगे क्या कहा जाए.
अब इस सिस्टम से शिक्षा की उम्मीद क्या करें जो मजबूरियों का ठीकरा भी मासूमों के सिर पर ही फोड़ते हैं. वैसे सिस्टम चलाने वाले अपनी पीठ अब भी ठोंक रहे होंगे कि भले ही शिक्षा ना दे पाएं, अधिकार तो दे ही दिया है. जब तक शिक्षा मिले, तब तक इस अधिकार से ही काम चला लीजिए.