समाजवादी पार्टी से नाता तोड़ अलग हो चुके शिवपाल यादव ने अब अखिलेश यादव के खिलाफ खुलकर बगावत का बिगुल फूंक दिया है. यदुवंशियों के सर्वमान्य नेता बनने के चक्कर में शिवपाल ने पूर्व सांसद डीपी यादव के साथ दोस्ती और यादव समाज के हक की लड़ाई लड़ने की दिशा में अपने कदम बढ़ा दिए हैं. इस तरह उन्होंने 'यदुकुल पुनर्जागरण मिशन' के मंच पर सूबे के दिग्गज यादव समुदाय के नेताओं को जुटाकर अपने भतीजे अखिलेश के साथ अब दो-दो हाथ करने का ऐलान कर दिया है.
जन्माष्टमी पर ही शिवपाल ने दिया था संदेश
बता दें कि जन्माष्टमी पर यदुवंशियों को खुला पत्र लिखने वाले शिवपाल यादव ने छल-बल से पिता को हटाकर अपमानित करने वाले कंस का जिक्र किया था तो इशारा साफ था कि उनके निशाने पर कौन है. यही ही नहीं उन्होंने जन्माष्टमी के बहाने अपने यादव समुदाय को बड़ा सियासी संदेश ही नहीं दिया बल्कि एकजुट होकर अपने साथ आने की अपील की है. वो यहीं नहीं रुके थे बल्कि उन्होंने यादव समुदाय से अपनी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) को ईश्वर द्वारा रचित किसी विराट नियति और विधान का परिणाम बताया था. उसी दिन साफ हो गया था कि चाचा ने अब भतीजे से सियासी तौर पर पार पाने के लिए का मन बना चुके हैं.
सूबे की राजनीति में लगातार प्रभावहीन होते रहे चाचा शिवपाल यादव के एक कदम ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है. गुरुवार को लखनऊ में आयोजित 'यदुकुल' कार्यक्रम के मंच पर यादव समुदाय के बड़े नेताओं को जुटाकर शिवपाल ने अपने सियासी मंसूबे जाहिर कर दिए हैं. 'यदुकुल पुनर्जागरण मिशन' के बैनर में जिस तरीके से 'नई सोच, नया तरीका, नया नेतृत्व' लिखा गया है, उसके पीछे यादव समुदाय के लिए एक सियासी संदेश है.
शिवपाल यादव और डीपी यादव साथ आए
'यदुकुल पुनर्जागरण मिशन' के शिवपाल यादव संरक्षक हैं तो डीपी यादव अध्यक्ष बनाए गए हैं. ये दोनों ही नेता एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने की रणनीति भी बनाई है. यदुकुल के मंच पर बालेश्वर यादव, सुखराम यादव, मुलायम सिंह के समधी हरिओम यादव सहित तमाम पूर्व सांसद व पूर्व विधायक इकट्ठा हुए थे. भीड़ देखकर उत्साह से लबरेज शिवपाल यादव ने कहा कि यादव समुदाय के साथ-साथ सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने का भी ऐलान कर दिया है. इतना ही नहीं जिस तरह से उन्होंने नए सोच के साथ नए नेतृत्व का नारा दिया है, उससे साफ है कि वो अब यादव समुदाय सपा और अखिलेश से अलग अपना लीडर चुनने का विकल्प दिया है.
शिवपाल यादव भले ही इसे सामाजिक लड़ाई के लिए बनाए संगठन का नाम दे रहे हैं, लेकिन उसके पीछे सियासी मकसद साफ जाहिर होता है. सूबे में यादव समाज की गोलबंदी 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर है. यादव वोटों के सहारे शिवपाल दोबारा से अपनी सियासत को जिंदा करना चाहते हैं तो पूर्व सांसद डीपी यादव भी अपना सियासी वर्चस्व को फिर से स्थापित करना चाहते हैं. ऐसे में दोनों ही नेताओं ने मिलकर यादव समुदाय के जख्मों पर मरहम लगाकर उनके दिल में जगह बनाने की कवायद 'यदुकुल पुनर्जागरण मिशन' के सहारे कर रहें.
बता दें कि उत्तर प्रदेश में तबरीबन 10 फीसदी यादव मतदाता हैं, जो मुलायम सिंह यादव के दौर से सपा के परंपरागत वोटर माने जाते हैं. वक्त बदल और सियासत बदली तो अखिलेश यादव ने 2022 के चुनाव में यादव समुदाय को नजर अंदाज कर ब्राह्मण, दलित और गैर-यादव ओबीसी को साधने में जुट गए. ऐसे में यादव समाज नेता अपने आपको उपेक्षित नेता महसूस करने लगे, लेकिन सियासी हालत को देखते हुए सपा से जुड़े रहे.
यादव वोटों को जोड़ने में जुटे शिवपाल
सपा की कमान अखिलेश यादव के हाथों में आने के बाद मुलायम सिंह के करीबी यादव नेताओं का सियासी प्रभाव पार्टी में कम हुआ. ऐसे में सपा से किनारे किए गए शिवपाल ने अब यादव नेताओं को साथ जोड़ने का बीढ़ा उठाया है, जिसमें उनका साथ डीपी यादव दे रहे हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए शिवपाल ने यदुवंशी कुनबे को जोड़ने की तैयारी शुरू कर दी है. यदुकुल पुनर्जागरण मिशन के मंच पर शिवपाल ने ऐलान कर दिया है कि यदवंशियों को लेकर जिस तरह का ऐलान किया है, उससे उनकी भविष्य की राजनीति भी साफ दिख रही.
सूबे के यादव समुदाय को लेकर शिवपाल ने जिस तरह से अपने कदम बढ़ा रहे हैं, उससे अखिलेश यादव के लिए सियासी टेंशन बढ़ना तय है तो बीजेपी के लिए सियासी संजीवनी भी साबित हो सकती है. शिवपाल और डीपी यादव अगर यदुकुल मिशन के जरिए यादव समुदाय को तबके में सेंधमारी करने में कामयाब रहते हैं तो अखिलेश यादव के लिए 2024 के चुनाव में सियासी संकट गहरा सकता है. इसकी वजह यह है कि सपा के कई सहयोगी साथी साथ छोड़ चुके हैं तो आजमगढ़ सीट पर उपचुनाव में मुस्लिम वोट भी अच्छी खासी संख्या में छिटककर बसपा से साथ चला गया है. ऐसे में यादव वोट भी अगर बटा तो अखिलेश के लिए बड़ी चुनौती
बीजेपी की नजर यादव वोटबैंक पर
वहीं, 2022 विधानसभा और आजमगढ़-रामपुर उपचुनाव में जीत से उत्साहित बीजेपी ने यादव समुदाय के वोटों पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं. हाल ही में मुलायम सिंह यादव के करीबी हरमोहन सिंह यादव की 10वीं पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल हुए, जिसे बीजेपी की रणनीति का हिस्सा माना गया था. इसके अलावा बीजेपी ने हाल ही में पार्टी संसदीय बोर्ड में दो यादव नेताओं को जगह दी है. इन सब बातों से एक चीज साफ होती है कि अखिलेश यादव के लिए अपने यादव वोटबैंक को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो रही है.
यूपी में यादव सियासत
उत्तर प्रदेश में यादव सियासत देखें तो सपा के टिकट पर शिवपाल यादव सहित यादव समुदाय के कुल 23 विधायक 2022 में बने. दो एमएलसी के अलावा मुलायम सिंह यादव सांसद तो रामगोपाल राज्यसभा सदस्य हैं. वहीं, बीजेपी के टिकट पर दो यादव समुदाय के विधायक बने हैं, जिसमें से एक को योगी सरकार में मंत्री बनाया गया है. इसके अलावा दो एमएलसी, दो राज्यसभा सदस्य और एक लोकसभा सदस्य यादव समुदाय से है. बीजेपी के टिकट पर चार यादव जिला पंचायत अध्यक्ष भी बने हैं. बसपा से भी एक सांसद यादव हैं.
यादव वोटों पर विपक्ष के घेराव को देखते हुए सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी सक्रिय हो गए हैं. विधायक रमाकांत यादव से मिलने आजमगढ़ जेल पहुंचे थे तो नोएडा के गढ़ी चौखंडी गांव में स्थित स्वर्गीय रघुवर प्रधान की प्रतिमा का अनावरण कर सियासी संदेश दिया था. इस तरह यादव समुदाय को नाराजगी का कोई मौका अखिलेश अब नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि बीजेपी ही नहीं उनके चाचा शिवपाल यादव की भी नजर है. ऐसे में देखना है कि 2024 के चुनाव में यादवों की पहली पसंद कौन बनता है?