हाथरस कांड को लेकर जिस तरह से विपक्ष आक्रमक है, उसने बीजेपी की चिंता को बढ़ा दिया है. कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा मुखर हैं. वहीं, यूपी के प्रमुख विपक्षी दल सपा और बसपा इस मामले में काफी देर से जागे जबकि कांग्रेस कार्यकर्ता पहले दिन से ही सड़क पर उतरकर योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं.
हाथरस की दलित बेटी को इंसाफ के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा अध्यक्ष मायावती सोशल मीडिया में सक्रिय हैं, लेकिन अभी तक सड़क पर नहीं उतर सके हैं. हालांकि, राजनीति में अक्सर देखा गया है कि ऐसे मामलों में राष्ट्रीय पार्टियों से कहीं ज्यादा क्षेत्रीय पार्टियां आक्रमक रहती हैं, लेकिन हाथरस मामले में ही नहीं बल्कि हाल में तमाम ऐसी घटनाएं हुई हैं, जहां सपा-बसपा से आगे कांग्रेस सक्रिय दिखी है. सूबे में चौथे नंबर की पार्टी कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल के तौर पर अपनी जगह बनाती जा रही है जबकि दोनों क्षेत्रीय पार्टियां अपनी सियासी जमीन खोती नजर आ रही हैं.
हाथरस मामले पर सपा-बसपा
अखिलेश यादव विदेश में होने के चलते हाथरस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर योगी सरकार को घेरने में जुटे हुए हैं. सपा इस मामले में भले ही देर से जागी, लेकिन बिना अपने नेता के पार्टी कार्यकर्ताओं ने सूबे में कई जगहों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किए हैं. सपा नेता का एक प्रतिनिधि मंडल रविवार को हाथरस जाकर पीड़िता के परिवार से मिला. वहीं, बसपा प्रमुख मायावती न तो खुद सड़क पर उतरीं और न ही उनकी पार्टी के कार्यकर्ता दिखे.
बसपा का दलित प्रमुख वोटबैंक
बसपा यूपी ही नहीं बल्कि देश भर के दलितों की पार्टी मानी जाती है और मायावती उनकी नेता मानी जाती हैं. इसके बावजूद हाथरस मामले में मायावती ने या तो ट्वीट किया या फिर प्रेस कॉन्फेंस के जरिए अपनी बात रखी है. हालांकि, बसपा का प्रमुख वोट दलित ही रहा है, लेकिन फिर भी पीड़िता के परिजनों से मिलने वो नहीं पहुंचीं. इस मामले में जिस तरह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी खुलकर सामने आए हैं, उस तरह सपा-बसपा नजर नहीं आई है.
कांग्रेस ने समझी मुद्दे की गंभीरता
उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार काशी यादव कहते हैं कि हाथरस मामले को लेकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व यानी राहुल-प्रियंका ने मुद्दे की गंभीरता को समझा और उसे उठाने में देर नहीं की. इससे पहले भी सोनभद्र की घटना को लेकर प्रियंका गांधी सबसे मुखर रही हैं जबकि ये काम यूपी में सपा-बसपा को करना चाहिए था. कांग्रेस ने जिस तरह से दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है, वो आने वाले समय में सपा-बसपा के लिए संकट खड़ा कर सकता है. हालांकि, बसपा तो पहले भी किसी भी घटना को लेकर सड़क पर नहीं उतरती थी, लेकिन सपा के सड़क पर न उतरने से उसके नेता और कार्यकर्ता दोनों में निराशा पैदा हो रही है.
काशी यादव कहते हैं कि सपा और बसपा ऐसी ही रहे तो कांग्रेस यूपी में अपनी सियासी जमीन तैयार करने में सफल रहेगी. 1989 तक कांग्रेस का वोटबैंट दलित, मुस्लिम और पिछड़े हुआ करते थे. कांग्रेस इन्हीं वोटों को साध रही है, जो फिलहाल सपा और बसपा के साथ है. कांग्रेस के लिए ये एक शुरुआत हुई है और अब प्रियंका गांधी की क्षमता पर है कि वो इसे कितना आगे ले जा पाती हैं. वहीं, अब देखना है कि सपा और बसपा आगे भी ऐसा ही रुख अख्तियार करते हैं या फिर कांग्रेस को देखकर अपनी सक्रियता बढ़ाएंगे.
बसपा-बीजेपी के लिए चिंता का सबब
वहीं, उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं कि विपक्ष के रूप में पिछले कई सालों से प्रदेश से बसपा गायब है जबकि प्रियंका गांधी को सूबे की कमान दी गई है तब से कांग्रेस की सक्रियता बहुत बढ़ गई है. एक विपक्षी दल के रूप में मायावती अपनी भूमिका का निर्वहन सही तरीके से नहीं कर पा रही हैं बल्कि सीएए-एनआरसी, अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर मायावती सरकार के सलाहकार की भूमिका में खड़ी दिखी हैं. हालांकि, मायावती उत्तर प्रदेश में दलित की सबसे बड़ी नेता हैं और सूबे में दलितों की पहली पसंद बसपा है, लेकिन हाथरस मामले में जिस तरह से वो सिर्फ बयानबाजी कर रही है और कांग्रेस सड़क पर उतरकर आंदोलन कर रही है, उससे मायावती के लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी हो सकती है.
सुभाष मिश्रा कहते हैं कि हाथरस कांड पर कांग्रेस की आक्रमता से बसपा और बीजेपी को राजनीतिक तौर पर नुकसान हो सकता है. मायावती का दलित का मुद्दा ना उठाना उनकी छवि को नुकसान पहुंचाता है. यूपी में वाल्मिकी समाज बीजेपी का वोट बैंक रहा है तो इस मामले से बीजेपी के लिए भी समस्याएं हो सकती हैं. सूबे में सपा को पूरी तरह से दलितों का वोट नहीं मिलता है, लेकिन यह संदेश मुसलमानों के बीच भी जा रहा है और कांग्रेस को सूबे में अपनी जमीन तैयार करने का मौका मिला तो सपा और मुस्लिमों के बीच खाई भी पैदा हो सकती है.