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UP MLC Bypoll: न नंबर गेम-न समीकरण, अखिलेश ने आदिवासी कार्ड खेल कर बीजेपी के सामने कैसे खड़ी की चुनौती?

उत्तर प्रदेश विधान परिषद की दो सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं. बीजेपी के बाद सपा ने भी अपना कैंडिडेट उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है. बीजेपी ने धर्मेंद्र सिंह सैंथवार और निर्मला पासवान को प्रत्याशी बनाया है तो सपा ने आदिवासी समुदाय से आने वाली कीर्ति कौल को उतारा है. बीजेपी आसानी से एक सीट जीत लेगी, लेकिन दूसरी सीट के लिए उसे मशक्कत करनी पड़ेगी.

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अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ
अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश विधान परिषद उपचुनाव में सपा ने आदिवासी समुदाय से आने वाली कीर्ति कोल को मैदान में उतारा है. वो एक अगस्त को नामांकन पत्र दाखिल करेंगे. सपा के पास एमएलसी चुनाव जीतने के लिए न तो नंबर गेम हैं और न ही सहयोगी दलों का साथ. ऐसे विपरीत स्थितियों में सपा चीफ अखिलेश यादव ने कीर्ति कोल को चुनावी रण में उतारकर सियासी थाह लेने के साथ-साथ राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू के खिलाफ जाकर वोट देने से हुए नुकसान की भरपाई का दांव तो नहीं चला है? 

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मिर्जापुर जिले की छानबे विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर चुनावी किस्मत आजमा चुकी कीर्ति कौल आदिवासी समाज से आती हैं और पूर्व सांसद भाईलाल कौल की भतीजी हैं. सपा ने उन्हें एमएलसी उपचुनाव में कैंडिडेट बनाकर बड़ा सियासी चाल चल दिया है. हालांकि, बीजेपी ने भी दलित समुदाय से आने वाली निर्मला पासवान और सैंथवार ठाकुर समुदाय से आने वाले धर्मेंद्र सिंह सैंथवार को प्रत्याशी बनाया है. इस तरह से दो एमएलसी सीटों के लिए तीन कैंडिडेट के उतरने से मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है. 

विधान परिषद चुनाव में सपा ने संख्या बल ना होते हुए भी अपना उम्मीदवार उतारा. इसी बहाने सपा अपने उन विधायकों जिन्होंने द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में क्रॉस वोटिंग और ओमप्रकाश राजभर जैसे पूर्व सहयोगियों जिन्होंने द्रौपदी मुर्मू के आदिवासी होने का हवाला देते हुए वोटिंग की थी. इसके अलावा चाचा शिवपाल यादव जिन्होंने खुलेआम कहकर सपा में क्रॉस वोटिंग किया, उन्हें  इस बार किसी बहाने का अखिलेश मौका नहीं देना चाहते हैं. 

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अखिलेश यादव को भी ये मालूम है कि किसी चमत्कार के बगैर कीर्ति कौल का एमएलसी उपचुनाव जीतना असंभव है. ऐसे में इसे पार्टी की ओर से राष्ट्रपति चुनाव में आदिवासियों के सामने पाप धोने की कवायद के तौर पर ही देखा जा रहा है. इतना ही नहीं सपा अपने विधायकों को भी इसी बहाने जोड़कर रखने की रणनीति है. इसीलिए अखिलेश ने राष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया.  

दरअसल, बीजेपी ने न सिर्फ एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाया बल्कि पूरे आदिवासी बहुल गांव में द्रौपदी मुर्मू के सम्मान में कार्यक्रम भी आयोजित भी किए थे. बीजेपी इसी बहाने आदिवासी इलाकों में अपने सियासी आधार को मजबूत करने में जुटी है. बुंदेलखंड जैसे आदिवासी इलाके में बीजेपी ने प्रशिक्षण शिविर जैसा आयोजन कर सपा-बसपा के पैरों तले से सियासी जमीन खींचना चाहती है. ऐसे में कीर्ति कौल के बहाने अखिलेश यादव का डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज माना जा रहा है. 

बीजेपी नेता डॉ चंद्रमोहन ने aajtak.in से बातचीत करते हुए कहा कि अखिलेश यादव राष्ट्रपति चुनाव में द्रौपदी मुर्मू के खिलाफ वोटिंग कर अपने किए पाप को धोना चाहते हैं, लेकिन आदिवासी लोगों को मूर्ख समझना बंद करें. निश्चित तौर पर हारी हुई सीट पर दिखावे के लिए वो एक आदिवासी उम्मीदवार तो दे सकते हैं, लेकिन जीतने वाली सीट होती तो अपने समीकरण के इतर नहीं सोच सकते. यही सपा की हिप्पोक्रेसी है.

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वहीं, दूसरी तरफ नाम न छापने की शर्त पर सपा के एक बड़े नेता ने कहा कि अखिलेश यादव पहले भी आदिवासी चेहरे को आगे करना चाहते थे, लेकिन कई तरह की खींचतान की वजह से ये नहीं हो पाया था. ये नई सपा है और लोग उम्मीद के साथ नई सपा को देख रहे हैं. बेशक ये सीट मुश्किल है, लेकिन पार्टी के भीतर किसी तरह का बहाना कम से कम कीर्ति कौल के खिलाफ वोट करने का नहीं होगा और विरोध करने वालों को नया बहाना ढूंढना होगा. 

बता दें कि विधानसभा और लोकसभा उपचुनाव में हार के बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव नए तरीके से पार्टी को दोबारा से खड़ी करने की कवायद में है. बीजेपी इन दिनों जितने आक्रमक तरीके से दलित. ओबीसी और आदिवासियों की राजनीति कर रही है, सपा भी अब अपने पुराने फॉर्मूले से इतर इन्हीं तीनों समुदाय पर फोकस कर रही है. बीजेपी को चुनौती देने के लिए सपा का पूरा एजेंडा दलित ओबीसी और आदिवासी पर केंद्रित है. 

एमएलसी चुनाव में सपा ने आदिवासी महिला का चेहरा आगे कर कई राजनीतिक हित साधना चाहती है. सपा एक तरफ तो अपने विधायकों को क्रॉस वोटिंग करने से बचाए रखना चाहती है तो दूसरी ओर बीजेपी को भले ही चुनौती न देने को हो, पर इसी बहाने टक्कर देने और प्रायश्चित करने की उसकी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. 

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रिक्त सीटों पर उपचुनाव

उत्तर प्रदेश की जिन दो एमएलसी सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उसमें एक सपा नेता अहमद हसन के निधन और बीजेपी के ठाकुर जयवीर सिंह के इस्तीफे की वजह से सीटें रिक्त हो गई थी. 11 अगस्त को इन दोनों एमएलसी सीटों के लिए मतदान होना है. विधानसभा के आंकड़ों को देखें तो एक एमएलसी सीटें जीतने के लिए कम से कम 200 विधायकों का वोट चाहिए होगा. 

सूबे में बीजेपी गठबंधन के पास फिलहाल 273 सदस्य हैं, जिस लिहाज से एक सीट पर जीत कन्फर्म है जबकि दूसरी सीट के लिए उसे मशक्कत करनी पड़ेगी. वहीं, सपा के पास 111 तो उसके सहयोगी आरएलडी के पास 8 विधायक हैं. इस तरह से 119 विधायकों का ही आंकड़ा पहुंच रहा जबकि उसे कीर्ति कौल को जिताने के लिए 81 विधायक कम पढ़ रहे हैं. बीजेपी को दूसरी सीट जीतने के लिए 127 वोट चाहिए होंगे. 

सपा अगर अपने विधायकों को जोड़े रखने में सफल रहती है तो बीजेपी के लिए दूसरी सीट जीतने टेढ़ी खीर होगा. बीजेपी अपने दोनों कैंडिडेट में से किसे किस वरियता के आधार पर रखती है, ये देखना होगा. वहीं, सपा अपने विधायकों के अलावा आरएलडी और कांग्रेस के विधायकों का समर्थन तो जुटा लेगी, लेकिन बसपा, सुभासपा और राजा भैया की पार्टी का समर्थन लेना पाना मुश्किल होगा. ये तीनों ही दल फिलहाल बीजेपी के करीब खड़े नजर आ रहे हैं, उसके बाद भी सपा के पास बीजेपी गठबंधन से ज्यादा नंबर हो रहे हैं. 

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