उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय की 27 विधान परिषद (एमएलसी) सीटों के लिए नतीजे आ गए. सूबे की 36 एमएलसी सीटों में 9 सीटों पर बीजेपी पहले निर्विरोध जीत दर्ज कर चुकी थी और बाकी बची 27 सीटों में से 24 सीटों पर जीत हासिल की है. इस तरह बीजेपी ने 33 सीटें जीती हैं तो तीन सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ा है. वहीं, माफिया व एमएलसी बृजेश सिंह की पत्नी अन्नपूर्णा सिंह निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर वाराणसी-चंदौली-भदोही सीट पर जीत दर्ज करने में कामयाब रही हैं जबकि बीजेपी प्रत्याशी सुदामा पटेल अपनी जमानत भी नहीं बचा सके.
काशी में बीजेपी को मिली करारी मात
वाराणसी-चंदौली-भदोही क्षेत्र की एमएलसी सीट पर माफिया बृजेश सिंह की पत्नी व निर्दलीय प्रत्याशी अन्नपूर्णा सिंह ने जीत दर्ज की. वाराणसी एमएलसी सीट पर अन्नपूर्ण सिंह को 4234 वोट मिले हैं तो सपा उम्मीदवार उमेश यादव को 345 और बीजेपी प्रत्याशी डॉ सुदामा पटेल को 170 वोट मिले हैं. इस सीट पर बीजेपी प्रत्याशी की जमानत तक नहीं बच सकी.
वाराणसी एमएलसी सीट पर पर कुल 4949 मतदाता थे, जिनमें से 4876 मत पड़े थे. इनमें से 127 वोट किन्हीं कारणों से निरस्त कर दिए गए हैं, जिसके चलते 4749 वैध वोट पड़े. ऐसे में इस सीट पर जीतने के लिए आवश्यक कोटा- (4749/2) + 1 = 2375 हासिल करना था. ऐसे में बीजेपी प्रत्याशी को महज 170 वोट ही मिल सके है जबकि अन्न पूर्णा सिंह निर्धारित कोटा से काफी ज्यादा मत मिले हैं.
विधान परिषद का चुनाव लड़ने के लिए भी एक सिक्योरिटी मनी उम्मीदवार को डिपोजिट करनी पड़ती है. विधान परिषद चुनाव के लिए सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को 10 हजार और एससी-एसटी वर्ग के उम्मीदवार को 5 हजार रुपये जमा कराने पड़ते हैं. चुनाव आयोग के मुताबिक, जब कोई उम्मीदवार को सीट पर पड़े कुल वोटों का 1/6 यानी 16.66 फीसदी वोट हासिल नहीं कर पाता तो उसकी जमानत जब्त हो जाती है. वाराणसी सीट पर बीजेपी प्रत्याशी सुदामा पटेल को 16.66 फीसदी वोट मिलना तो दूर की बात एक फीसदी वोट भी हासिल नहीं हो सका. यहां पर कुल पड़े वोट के उन्हें 0.02 फीसदी वोट मिले हैं.
पिछले दो दशक से वाराणसी एमएलसी सीट पर बृजेश सिंह के परिवार का कब्जा है. पिछली बार 2016 के एमएलसी चुनाव में निर्दलीय बृजेश सिंह खुद मैदान में उतरे थे, जिन्हें बीजेपी ने वॉकओवर देते हुए अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था. बीजेपी ने इस बार सत्ता में होने के चलते सुदामा पटेल पर दांव लगाया, लेकिन वाराणसी की जेल में बंद बृजेश सिंह ने अपनी पत्नी को निर्दलीय उतारकर बीजेपी को मात दी थी.
वाराणसी विधान परिषद सीट पर दो बार बृजेश सिंह के भाई बीजेपी के टिकट पर जीत चुके हैं तो एक बार उनकी पत्नी अन्नपूर्णा सिंह 2010 में बसपा के टिकट पर एमएलसी रही हैं जबकि एक बार खुद बृजेश सिंह निर्दलीय जीते हैं. इस तरह से पिछले 24 सालों से उन्हीं के परिवार के पास यह सीट है. एक बार फिर से बृजेश सिंह की पत्नी ने जीतकर साबित कर दिया है कि वाराणसी में माफिया बृजेश की सियासी ताकत कम नहीं हुई.
प्रतापगढ़ में राजा भैया का दिखा दम
प्रतापगढ़ की स्थानीय निकाय विधान परिषद सीट पर बीजेपी को करारी मात खानी पड़ी है. बीजेपी से पूर्व विधायक हरिप्रताप सिंह को राजा भैया की पार्टी से उतरे अक्षय प्रताप सिंह उर्फ गोपाल भैया ने मात दी है. अक्षय प्रताप बाहुबली नेता व कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के रिश्तेदार हैं. राजा भैया ने इस सीट पर अक्षय प्रताप को जिताने में पूरी ताकत झोंक रखी थी.
राजा भैया के समर्थन से अक्षय प्रताप सिंह प्रतापगढ़ सीट से लगातार पांच बार से एमएलसी बनते आ रहे हैं और छठी बार चुने हैं, तीन बार से वो सपा के टिकट पर एमएलसी बन रहे हैं और 2016 में निर्विरोध चुने गए थे. 2018 में राजा भैया के अखिलेश यादव के साथ रिश्ते बिगड़ने के बाद अक्षय प्रताप सिंह सपा छोड़कर जनसत्ता पार्टी में शामिल हो गए थे और अब बीजेपी को मात देकर अपना वर्चस्व बनाए रखा,
सूबे में योगी सरकार के आने के बाद तमाम बाहुबली नेताओं पर नकेल कसी गई है, लेकिन राजा भैया के सियासी वर्चस्व को बीजेपी प्रतापगढ़ में तोड़ नहीं पाई. जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में बीजेपी ने सूबे भर में एकतरफा जीत दर्ज की थी, लेकिन प्रतापगढ़ सीट पर राजा भैया के समर्थित प्रत्याशी से बीजेपी को करारी मात मिली थी. इसके बाद विधानसभा चुनाव में कुंडा सीट पर राजा भैया के सामने बीजेपी प्रत्याशी की जमानत तक नहीं बची. राजा भैया कुंडा सीट पर खुद जीते और बाबागंज सीट पर अपनी पार्टी के विनोद सरोज को जिताने में कामयाब रहे. ऐसे में अब देखना है कि एमएलसी चुनाव में वो अपना सियासी वर्चस्व बचाए रख पाते हैं कि नहीं.