उत्तर प्रदेश की सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे है, जिनमें से जौनपुर की मल्हनी सीट पर सबकी निगाहें हैं. मल्हनी सूबे की उन चुनिंदा सीटों में से एक है, जहां पर बीजेपी अभी तक कमल नहीं खिला सकी है. ऐसे में बीजेपी उपचुनाव के जरिए इस सीट पर इतिहास रचने का ख्वाब देख रही थी, पर बाहुबली नेता और पूर्व सांसद धनंजय सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतरकर मुकाबले को काफी दिलचस्प बना दिया है.
मल्हनी के सपा विधायक रहे पारस नाथ यादव के निधन के बाद खाली हुई सीट पर उनके बेटे लकी यादव को सपा ने टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा है. लकी यादव अपने पिता के निधन की जनता से सहानुभूति मिलने की उम्मीद लगाए हुए हैं. वहीं, बीजेपी इस सीट से कभी जीत नहीं पाई है, लिहाजा उसने अपना खाता खोलने के लिए युवा नेता मनोज सिंह को मैदान में उतारा है. कांग्रेस ने ब्राह्मण कार्ड के चलते राकेश मिश्रा को प्रत्याशी बनाया है, जबकि बसपा ने यहां से बसपा प्रत्याशी जय प्रकाश दुबे मैदान में उतरे हैं.
उत्तर प्रदेश की जिन सात सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं, उनमें से छह सीटें बीजेपी के पास और जौनपुर की मल्हनी सीट सपा के कब्जे में थीं. मल्हनी सीट पर पिछले दो बार से सपा के पारसनाथ यादव जीत दर्ज कर रहे थे, लेकिन अब उनकी राजनीतिक विरासत संभालने के लिए उनके बेटे लकी यादव मैदान में उतरे हैं.
मल्हनी सीट पर फतह करना बीजेपी के लिए चुनौती है. ऐसा इसलिए क्योंकि मल्हनी सीट पर ठाकुर और यादव समुदाय के वोटर का बोलबाला रहा है और इन्हीं दोनों समुदाय से यहां विधायक चुने जाते रहे हैं. यादव समुदाय से परसनाथ यादव तो ठाकुर समुदाय से बाहुबली धनंजय दो-दो बार जीत दर्ज कर चुके हैं.
सपा के पारसनाथ यादव यहां से 2012 और 2017 में यादव वोट एकमुश्त पाकर जीत दर्ज करने में कामयाब रहे थे. वहीं, धनंजय सिंह भी यहां से जीत का परचम फहराने में कामयाब रहे हैं. 2007 में वो निर्दलीय विधायक बने थे और 2009 में सांसद चुने जाने के बाद उनके पिता यहां से बसपा के टिकट पर जीत दर्ज करने में कामयाब रहे.
2012 में धनंजय सिंह पत्नी डॉ. जागृति सिंह और फिर 2017 के चुनाव में धनंजय सिंह को लगभग 50 हजार वोट मिले थे, लेकिन जीत नहीं मिल सकी थी. एक बार फिर से चुनावी मैदान में उतरे हैं, जिसके चलते बीजेपी के मनोज सिंह के लिए चुनौती खड़ी हो गई है. मल्हनी का कास्ट कॉम्बिनेशन ही कुछ ऐसा है. इस सीट पर ठाकुर और यादव मतदाताओं की संख्या लगभग बराबर है.
धनंजय सिंह ठाकुरों के वोट हासिल करने में कामयाब रहते हैं. वहीं, यादवों के एकमुश्त वोट से सपा जीतती रही है. इस बार भी समीकरण कुछ ऐसे ही हैं. बीजेपी ने ठाकुर प्रत्याशी उतारा है तो सपा ने यादव दांव चला है. इसके अलावा कांग्रेस और बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेला है. ऐसे में निर्दलीय धनंजय सिंह ने चुनावी ताल ठोककर सारे समीकरण को बिगाड़ दिया है और अब उनके उतरने से बीजेपी के लिए एक बार कमल खिलाना आसान नहीं दिख रहा है.