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ओवैसी का मुस्लिम-ओबीसी समीकरण, छोटे दलों के सहारे बड़ा धमाल करने का प्लान

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी यूपी में मुस्लिम-ओबीसी समीकरण बनाने की कवायद में जुट गए हैं. ओवैसी के यूपी मिशन में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर अहम कड़ी बन रहे हैं, जिनके सहारे छोटे-छोटे दलों को मिलाकर सूबे में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनने का ख्वाब संजो रहे हैं. 

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ओम प्रकाश राजभर और असदुद्दीन ओवैसी
ओम प्रकाश राजभर और असदुद्दीन ओवैसी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • असदुद्दीन ओवैसी और ओम प्रकाश राजभर का गठबंधन
  • राजभर के नेतृत्व में ओबीसी जातियों के दलों का गठबंधन
  • यूपी में मुस्लिम और ओबीसी की सियासी ताकत काफी अहम

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक बिसात अभी से बिछाई जाने लगी है. सपा से लेकर बसपा और कांग्रेस सूबे की सत्ता में वापसी की कोशिशों में जुटे हैं तो ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी यूपी में मुस्लिम-ओबीसी समीकरण बनाने की कवायद में जुट गए हैं. ओवैसी के यूपी मिशन में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर अहम कड़ी बन रहे हैं, जिनके सहारे छोटे-छोटे दलों को मिलाकर सूबे में एक बड़ी राजनीतिक ताकत बनने का ख्वाब संजो रहे हैं. 

असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार को लखनऊ में ओम प्रकाश राजभर से मुलाकात की है. राजभर ने हाल ही में ओबीसी समुदाय के आठ दलों के साथ मिलकर बीजेपी के खिलाफ भागीदारी संकल्प मोर्चा नाम से गठबंधन बनाया है. इस मोर्चा में ओम प्रकाश राजभर की  सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी), बाबू सिंह कुशवाहा की अधिकार पार्टी, कृष्णा पटेल की अपना दल (के), प्रेमचंद्र प्रजापति की भारतीय वंचित समाज पार्टी, अनिल चौहान की जनता क्रांति पार्टी (आर), और बाबू राम पाल की राष्ट्र उदय पार्टी शामिल है. 

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AIMIM भी राजभर के इस गठबंधन का अहम हिस्सा बन सकती हैं, क्योंकि राजभर के साथ ओवैसी बिहार में किस्मत आजमा चुके हैं, जिनमें ओवैसी की पार्टी को पांच सीटें भी मिली हैं. ओवैसी ने सीधे तौर पर कहा, 'हम दोनों साथ बैठे हैं और हम ओम प्रकाश राजभर जी की लीडरशिप में साथ खड़े हैं और काम करेंगे.' इतना ही नहीं उन्होंने सपा से अलग होकर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष शिवपाल यादव के साथ भी गठबंधन करने के संकेत दिए हैं. इससे साफ जाहिर है कि ओवैसी इस बार मुस्लिम-ओबीसी समीकरण के सहारे यूपी के चुनावी रणभूमि में उतरने का प्लान बनाया है.  

यूपी में 52 फीसदी ओबीसी वोट

बता दें कि उत्तर प्रदेश में सरकारी तौर पर जातीय आधार पर पिछड़ा वोट बैंक का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक यूपी में सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का है. लगभग 52 फीसदी पिछड़ा वोट बैंक में 43 फीसदी वोट बैंक गैर यादव बिरादरी का है, जो कभी किसी पार्टी के साथ स्थाई रूप से नहीं खड़ा रहता है. इतना ही नहीं पिछड़ा वर्ग के वोटर कभी सामूहिक तौर पर किसी पार्टी के पक्ष में भी वोटिंग नहीं करते हैं.

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उत्तर प्रदेश की सियासत में पिछड़ा वर्ग की अहम भूमिका रही है. माना जाता है कि करीब 50 फीसदी ये वोट बैंक जिस भी पार्टी के खाते में गया, सत्ता उसी की हुई. 2017 के विधानसभा और 2014 व 2019 के लोकसभा में बीजेपी को पिछड़ा वर्ग का अच्छा समर्थन मिला. नतीजतन वह केंद्र और राज्य की सत्ता पर मजबूती से काबिज हुई. ऐसे ही 2012 में सपा ने भी ओबीसी समुदाय के दम पर ही सूबे की सत्ता पर काबिज हुई थी जबकि 2007 में मायावती ने दलित के साथ अति पिछड़ा दांव खेलकर ही चुनावी जंग फतह की थी. 

अतिपिछड़ा समुदाय की सियासत

उत्तर प्रदेश की राजनीति में जब बात पिछड़ा वर्ग की आती है तो यादव को छोड़कर अन्य पिछड़ी जातियों की सियासत काफी अलग खड़ी नजर आती है. सूबे में ओबीसी वोट बैंक में करीब डेढ़ सौ और जातियां हैं, जिन्हें अति पिछड़ों में आती हैं. उत्तर प्रदेश में कई ऐसे छोटे-छोटे दल मौजूद हैं जो एक वर्ग विशेष के वोट बैंक के सहारे ही अपनी सियासत करते हैं और बड़े-बड़े दलों से राजनीतिक समीकरण बनाते रहते हैं, लेकिन इस बार ये खुद आपस में हाथ मिला रहे हैं. सूबे में अति पिछड़ा वोटबैंक की बात करें तो हर एक विधानसभा सीटों एक से डेढ़ लाख वोट तक है, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका अदा करता है. 

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यूपी के वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि यूपी में सभी राजनीतिक पार्टियों की नजर अति पिछड़े वोटों पर है, क्योंकि बीजेपी ने पिछले चुनाव में इन्हीं मतों के सहारे सत्ता में वापसी की थी, लेकिन ओम प्रकाश राजभर अब बीजेपी से अलग हैं और पिछड़ी जातियों की पार्टियों को एकजुट कर रहे हैं. इसका हिस्सा असदुद्दीन ओवैसी बनते हैं तो सूबे में सपा और बसपा जैसे दलों के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी. यूपी में करीब 22 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जिनके बीच ओवैसी अपना आधार बढ़ाना चाहते हैं. 

ओबीसी राजनीति प्रयोगशाला 

ओम प्रकाश राजभर पिछला चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लड़े थे और चार सीटें जीतने में कामयाब रहे थे. हालांकि, बाद में योगी सरकार पर पिछड़े वर्ग के साथ किए वादे न पूरे करने के आरोप में अलग हो गए थे. राजभर समुदाय पूर्वांचल में एक महत्वपूर्ण वोटबैंक है. गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़, चंदौली, भदोही, वाराणसी व मिर्जापुर में इस बिरादरी की आबादी 12 लाख से अधिक है. इस बिरादरी के नेता के तौर पर ओमप्रकाश राजभर ने पहचान बनाई है और ओवैसी के साथ मिलते हैं तो कई सीटों पर समीकरण बदल सकते हैं, क्योंकि इन्हीं इलाकों में मुस्लिम मतों की संख्या भी अच्छी खासी है. 

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राजभर के गठबंधन के साथ अनिल चौहान की जन क्रांति पार्टी भी शामिल हैं. पूर्वांचल के कई जिलों में चौहान मतदाता काफी अहम भूमिका अदा करते हैं. इन्हें स्थानीय भाषा में नोनिया के नाम से जाना जाता है. विशेषकर मऊ, गाजीपुर और जौनपुर के अधिकतर विधानसभा क्षेत्रों में इनकी संख्या अच्छी-खासी है. पूर्वांचल में इनकी भी संख्या 8-9 लाख के करीब है, लेकिन सियासत में अपनी जगह नहीं बना सके हैं. ऐसे ही राष्ट्र उदय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबू रामपाल हैं, जो गड़रिया समुदाय से आते हैं. सूबे में करीब 3 फीसदी वोट है, जो काफी महत्वपूर्ण हैं. 

ओम प्रकाश राजभर ने गठबंधन के ऐलान के दौरान कहा था कि यह पिछड़ी जातीयों के दलों का गठबंधन है, जहां जिस पार्टी के समुदाय के लोग ज्यादा होंगे वही पार्टी वहां पर चुनाव लड़ेगी और बाकी ओबीसी की जातियों उसे समर्थन करेंगी. इसी फॉर्मूले पर हमारे गठबंधन में सीट बंटवारे किए जाएंगे. हाल ही में राजभर ने शिवपाल यादव से भी मुलाकात की थी और अब उन्होंने ओवैसी के साथ गले मिले हैं. एक तरह से साफ है कि अगर इन दोनों दलों की भी इस भागेदारी मोर्चे में एंट्री होती है तो सूबे में छोटे दल बड़ा धमाल करने की हैसियत में नजर आ सकते हैं. 

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