
देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना सैकड़ों शिक्षकों के लिए ‘मौत की मुनादी’ साबित हुई. ये वो शिक्षक थे जिनके कंधों पर इन चुनावों को पूरा कराने की जिम्मेदारी थी लेकिन अपने कर्तव्य के निर्वहन के दौरान इन्हें कोरोना वायरस ने अपनी चपेट में ले लिया और फिर ये खुद को बचा नहीं पाए.
कहते हैं भाई की मौत का गम ताउम्र सताता है, प्रयागराज के हौसला प्रसाद के भाई को नहीं पता था कि उनकी किस्मत में यही गम लिखा है, बुलंदशहर के रामफूल भाटी की पत्नी अपने पति के लिए अस्पताल में एक बेड की खातिर भटकती रहीं, आजमगढ़ के राजमणि यादव की बेटी रोते हुए कहती हैं कि चुनाव न होते तो उनके पिता आज जिंदा होते? सैकड़ों घरों की यही कहानियां हैं. किसी ने अपनी मां को खोया तो किसी के पिता चल बसे, किसी के पति उसे हमेशा के लिए छोड़ गए तो किसी की पत्नी ने साथ जीने मरने का वादा तोड़ दुनिया को समय से पहले अलविदा कह दिया. लेकिन एक बात इन सबके दर्द में कॉमन है कि काश समय पर सुनवाई हो जाती, ड्यूटी से छुट्टी मिल जाती, इलाज मिल जाता!
उत्तर प्रदेश का प्राथमिक शिक्षक संघ कहता है कि पंचायत चुनाव में 1600 से ज्यादा टीचरों की जान गई है, राज्य के निर्वाचन आयोग ने मौजूदा नियम कायदों के हवाले से ये आंकड़ा केवल तीन का बताया है. हालांकि सूबे की योगी आदित्यनाथ सरकार हर मृत कर्मचारी के परिजनों को मुआवजे का वादा कर रही है यानी अंतिम आंकड़ा आना बाकी है.
आंकड़े अपनी जगह है लेकिन जिनके घर से अर्थी उठीं, जनाजे निकले वो जानते हैं कि उन्होंने क्या खोया है. aajtak.in ने उनमें से कुछ के नंबर घुमाए और सिर्फ इतना पूछा कि हुआ क्या था? जवाब में दर्द, बेबसी, पीड़ा, छटपटाहट और अफसोस की वो कहानियां सामने आ गईं जिन्हें सुनकर किसी का भी कलेजा भर आए. हम ऐसे ही कुछ जवाब आपके सामने ज्यों के त्यों रख रहे हैं. कोशिश ये अहसास कराने की है कि किसी की मौत सिर्फ सांसों का रुक जाना, धड़कनों का थम जाना भर नहीं होती. वो महज कोई सरकारी आंकड़ा भी नहीं होती बल्कि ताउम्र चलने वाला गम होती है. दिल और दिमाग पर लगा ऐसा घाव होती है जो नासूर बनकर उम्र भर रिसता रहता है और दर्द देता रहता है.
नाम-राकेश कुमार
मृत्यु- 4 मई,
जगह--बुलंदशहर
बयान-बेटी निशा
मेरे पिता ने यूपी के पंचायत चुनाव में हिस्सा लिया था. वो 29 अप्रैल को वोट पड़वाने गए थे. उनकी तबीयत वोट वाले दिन ही खराब हुई थी. वो जब ऑन ड्यूटी थे तब अपने फोन से बड़े अधिकारियों को मैसेज कर रहे थे. उन्होंने सभी को बताया था कि वे ठीक महसूस नहीं कर रहे हैं. लेकिन किसी ने भी उनके मैसेज का जवाब नहीं दिया. वो मांग कर रहे थे कि उन्हें रिप्लेस कर दिया जाए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. अगर मेरे पिता को उस दिन रिप्लेस कर दिया जाता तो हमें कुछ घंटे और मिल जाते और हम समय रहते उन्हें अस्पताल में एडमिट करवा पाते. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और पापा की तबीयत बिगड़ती गई. जब वे घर आए तब हालत काफी क्रिटिकल हो गई थी और हमने उन्हें अस्पताल में एडमिट करवा दिया था. उनका कोरोना टेस्ट पॉजिटिव आ गया था. हम उन्हें नहीं बचा पाए.
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नाम- शाहाना परवीन
मृत्यु- 27 अप्रैल,
जगह--बुलंदशहर
बयान-शाहाना की बहन
मेरी बहन 13 अप्रैल को पंचायत चुनाव की ट्रेनिंग में गई थीं. ट्रेनिंग से जब से आई थीं उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी. उन्हें हल्का बुखार था. लेकिन फिर भी वे 19 अप्रैल तक अपने स्कूल जा रही थीं. लेकिन जब उन्हें सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी तब उन्होंने स्कूल से छुट्टी ली और फिर 21 अप्रैल को वे रायना अस्पताल में एडमिट हो गईं. लेकिन उनकी हालत खराब होती रही और फिर 27 को उनकी मौत हो गई. यहां कोई सुनवाई नहीं है. घर में मातम पसरा था लेकिन चुनाव वाले फिर भी फोन करके पूछ रहे थे कि शाहाना जी चुनाव ड्यूटी में आ रही हैं ना? इन्हें ये तक नहीं पता कि किसी की मौत हो गई और घर पर मातम पसरा है. कही से कोई मदद नहीं मिल रही है. ऊपर से ये लोग तर्क देते हैं कि चुनाव ड्यूटी में नहीं सिर्फ ट्रेनिंग में हिस्सा लिया था. अब क्या ट्रेनिंग भी चुनाव का हिस्सा नहीं है क्या?
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नाम--रामफूल भाटी
मृत्यु-23 अप्रैल,
जगह--बुलंदशहर
बयान- रामफूल की पत्नी
मेरे पति को पहले कोई दिक्कत नहीं थी. वो बिल्कुल फिट थे. लेकिन जब से वो यूपी पंचायत चुनाव की ट्रेनिंग से आए थे, उनकी तबीयत कुछ ठीक नहीं चल रही थी. शुरुआत में तो सिर्फ हल्के लक्षण थे, ऐसे में हम भी ज्यादा कुछ नहीं समझ पाए. फिर 20 अप्रैल को उनकी तबीयत अचानक से ज्यादा खराब होने लगी. उनका ऑक्सीजन लेवल काफी कम हो गया. हमने तब कई अस्पतालों के चक्कर काटे, लेकिन किसी ने भी एडमिट नहीं किया. फिर पिलखुआ में रामा अस्पताल है वहां लेकर गए. उन्होंने पहले उनका कोविड टेस्ट करवाया और रिपोर्ट निगेटिव आई. इसलिए उन्होंने एडमिट करने से मना कर दिया. हम दो दिनों तक सिर्फ पागलों की तरफ भटकते रहे. कही से मदद नहीं मिल रही थी. उनकी ऑक्सीजन 35 तक पहुंच गई थी. फिर गाजियाबाद के राजनगर में एक हार्ट सेंटर है, वहां हमने उन्हें 22 अप्रैल को एडमिट करवाया. लेकिन तब तक काफी देर हो गई थी. 23 को उनका देहांत हो गया. अब सरकार हमसे कोविड टेस्ट की रिपोर्ट मांग रही है, हम कहां से लाएं, उनकी मौत कोरोना लक्षणों से हुई, लेकिन रिपोर्ट नहीं है.
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नाम--तंजीम अब्बास
मृत्यु--- 30 अप्रैल
जगह--बुलंदशहर
बयान--- तंजीम अब्बास के बड़े भाई
मैं भी शिक्षक हूं और मेरी भी चुनाव में ड्यूटी लगी थी. मेरे छोटे भाई भी 28 अप्रैल को ड्यूटी के लिए गए थे. चुनाव तो 29 को थे लेकिन 28 को पार्टी रवाना हो रही थी. लेकिन जब वे वहां पहुंचे थे, उनकी ड्यूटी पर ही तबीयत खराब हुई थी. मेरे भाई ने इस बात की जानकारी वहां मौजूद अफसरों को दी थी, लेकिन शाम साढ़े पांच बजे तक उन्हें नहीं छोड़ा गया. बाद में भी जब उन्हें जाने के लिए कहा तो असल में उन्होंने ड्यूटी कैंसिल नहीं की, बस कह दिया कि वे चले जाएं. फिर मेरे भाई जब घर आए तो उन्होंने मुझे फोन कर बताया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है. अब मैं उस समय चुनाव ड्यूटी में था, इसलिए अपने एक दोस्त को बोला और हमारे गांव में ही एक सेंटर है वहां उनकी ऑक्सीजन चेक करवाई. उस समय उनकी ऑक्सीजन सिर्फ 54 आ रही थी. प्रशासन की तरफ से मैसेज आते थे कि कुछ अस्पतालों में ऑक्सीजन-बेड के इंतजाम हैं. हम तीन-चार अस्पताल गए, लेकिन कहीं एडमिट नहीं किया गया. फिर मेरठ मेडिकल में किसी तरह उन्हें एडमिट करवाया लेकिन तब कही ऑक्सीजन नहीं मिल रही थी. मैं 5 सिलेंडर के 25 हजार देने को तैयार था, लेकिन नहीं हो पाया इंतजाम. उनकी 30 अप्रैल को मौत हो गई.
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नाम--विनीता
मृत्यु- 26 अप्रैल,
जगह--बुलंदशहर
बयान- विनीता के पति
मेरी पत्नी पंचायत चुनाव की ट्रेनिंग में गई थीं. उनकी तबीयत तभी से खराब होने लगी थी. हम तो पहले से कोशिश कर रहे थे कि छुट्टी मिल जाए, किसी तरीके से ड्यूटी कैंसिल हो जाए, लेकिन कोई सुनवाई नहीं थी. एक छुट्टी नहीं दी गई. वो तो जब से ट्रेनिंग से आई थीं, उन्हें काफी ज्यादा खांसी हो रही थी. हम उन्हें घर ही ले आए थे और डॉक्टर ने जो दवाई बताई थीं, वो दे रहे थे. फिर अचानक से उनकी तबीयत काफी ज्यादा खराब हो गई. हमें समय ही नहीं मिला कि एडमिट करवा पाते, टेस्ट करवा लेते. घर में ही उनका 26 अप्रैल को निधन हो गया. किसी से कोई मदद नहीं मिल रही है. शिक्षक संगठन कह तो रहे हैं, लेकिन कब मिलेगी, कुछ नहीं पता है.
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नाम--विनोद सिंह
मृत्यु- 24 अप्रैल,
जगह--बुलंदशहर
बयान- विनोद सिंह की पत्नी
मेरे पति 11 अप्रैल को ट्रेनिंग में गए थे. 11 की ही रात को उनकी तबीयत खराब हुई थी. हमने तो उनका टाइम पर कोविड टेस्ट करवा दिया था. लेकिन फिर लॉकडाउन लग गया और टेस्ट रिपोर्ट आने में काफी देरी हो गई. कई दिनों बाद जब उनकी रिपोर्ट आई तब वे पॉजिटिव निकले. हमने अपनी तरफ से काफी कोशिश की कि उन्हें कही से ऑक्सीजन मिल जाए. लेकिन कहीं से भी इंतजाम नहीं हुआ. उनकी ऑक्सीजन नहीं मिलने की वजह से मौत हो गई. वो घर में अकेले कमाई करने वाले थे, अब वो नहीं है तो समझ नहीं आ रहा क्या करेंगे. किसी से कोई मदद भी नहीं मिल रही है. ना किसी का फोन आया ना कोई आश्वासन मिला है.
नाम--अफसर अली
मृत्यु- 27 अप्रैल,
जगह--आजमगढ़
बयान- अफसर अली के बेटे
हम लोग तो मुंबई में काम करते हैं, हमारे पापा अकेले रहते थे. उन्होंने 19 अप्रैल को पंचायत चुनाव की पोलिंग में हिस्सा लिया था. वो अपनी ड्यूटी देने गए थे. अब वे पहले भी कई बार चुनाव करवा चुके हैं, इसलिए हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी. लेकिन इस बार जब वे ड्यूटी से वापस आए तो उनकी तबीयत काफी खराब हो गई. अब हम क्योंकि उस समय मुंबई में थे, इसलिए अपनी तरफ से ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे थे. हमारे एक चाचा हैं, वो ही सबकुछ देख रहे थे. फिर किसी तरह से हम 26 अप्रैल को पापा के पास पहुंचे थे. अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि उन्हें अच्छा इलाज मिल जाए. लेकिन तब अस्पतालों के हालात इतने खराब थे कि हम क्या बताएं. कुछ नहीं हो पाया और वो हमें छोड़कर चले गए. हमारे पास उनकी रिपोर्ट है कोरोना पॉजिटिव वाली.
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नाम--अमितोष विक्रम सिंह
मृत्यु- 2 मई
जगह--आजमगढ़
बयान- अमितोष के छोटे भाई
हमारे छोटे भाई की तो 19 अप्रैल को भी ड्यूटी लगी थी और फिर मतगणना के दिन भी ड्यूटी थी. जब वो 19 की ड्यूटी के बाद घर आए थे, उन्हें बुखार और थकान की शिकायत थी. अब बुखार ज्यादा नहीं था, इसलिए हमने उन्हें बुखार की दवाई दे दी. उनकी सेहत में सुधार भी शुरू होने लगा था. कभी बुखार आता फिर उतर जाता. इसके बाद मतगणना से एक दिन पहले जब ट्रेनिंग थी, तब उनकी तबीयत फिर खराब हुई. काफी ज्यादा सीरियस हो गए वो, ट्रेनिंग में भी नहीं जा पाए. उनकी काफी सांस फूल रही थी. हमने डॉक्टर को दिखाया और घर में ही ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतजाम कर दिया. अस्पताल में तो कोई सुविधा थी ही नहीं. उनका कोरोना टेस्ट करवाना था, वो भी नहीं हो पाया. कहीं पर किट मौजूद नहीं थी तो कहीं पर कह रहे थे कि 2 बजे के बाद टेस्ट नहीं होता. काफी कोशिश की, लेकिन नहीं हो पाया. फिर 2 तारीख को उनकी हालत काफी गंभीर हो गई. ऑक्सीजन गिरकर 31 पर पहुंच गया. शरीर में तेज दर्द शुरू हो गया और वो चिल्लाने लगे. फिर बस वो देखते-देखते एक्सपायर कर गए.
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नाम----राजमणि यादव
मृत्यु---- 2 मई
जगह--आजमगढ़
बयान---- राजमणि की बेटी
मेरे पिताजी की आजमगढ़ में ड्यूटी थी और मेरी मऊ में थी. मैं भी एक टीचर हूं. मेरे पिताजी 19 तारीख को ड्यूटी पर गए थे. इसके बाद से ही उनकी तबीयत खराब होने लगी. पहले सिर्फ बुखार और खांसी थी, इसलिए हमने भी सिर्फ दवाई थी और ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी. मेरे पिताजी की मतगणना में भी ड्यूटी लगी थी, लेकिन जब तबीयत ज्यादा खराब हुई, फिर मतगणना वाले दिन ही उन्होंने अधिकारियों को मैसेज डाला और अपनी ड्यूटी कैंसिल करवाई. इसके बाद हम उन्हें सदर अस्पताल लेकर गए और वहां उनकी कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आई. लेकिन क्योंकि वहां कोविड सेंटर नहीं था, इसलिए फिर वहां से उन्हें दूसरे अस्पताल लेकर गए. फिर उनकी मौत हो गई. मैं दावे से कह सकती हूं कि इस चुनाव ने ही मेरे पिता की जान ली है. लखनऊ से किसी का सांत्वना देने के लिए फोन तो आया था, लेकिन अभी तक कोई मदद का आश्वासन नहीं मिला है.
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नाम---राम सूरत
मृत्यु---- 21 अप्रैल
जगह--आजमगढ़
बयान--- राम सूरत के बेटे
मेरे पिताजी की ड्यूटी वाले दिन ही दोपहर तीन बजे तबीयत खराब हुई थी. जिस दिन वोट पड़ रहे थे, वो अपना काम कर रहे थे. लेकिन काम के बीच ही उनकी हालत खराब होना शुरू हो गई थी. फिर उनका फोन हमारे पास आया और हम वहां गए. उन्हें अस्पताल में एडमिट भी करवा दिया. लेकिन जब उनकी हालत और ज्यादा सीरियस हो गई तब अस्पताल ने भी हाथ खड़े कर दिए. फिर हम उन्हें मऊ लेकर जा रहे थे, लेकिन रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया. मेरे पिता की कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट भी उनके निधन के बाद मिली है.
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नाम---संतोष पटेल
मृत्यु---20 अप्रैल
जगह--आजमगढ़
बयान-संतोष पटेल के साले
संतोष जी 19 अप्रैल की ड्यूटी में हिस्सा नहीं ले पाए थे. उनकी तबीयत काफी खराब हो गई थी. उनकी ड्यूटी रिजर्व में थी. लेकिन उन्होंने ट्रेनिंग में हिस्सा लिया था और तभी से उनकी तबीयत बिगड़ना शुरू हुई. फिर 19 तारीख तक तो वो बिल्कुल क्रिटिकल हो गए और हमने उन्हें अस्पताल में एडमिट करवाया. लेकिन उनकी 20 को दोपहर में मृत्यु हो गई. हमें कुछ भी करने का समय नहीं मिल पाया, सबकुछ बहुत अचानक से हो गया. कोरोना का टेस्ट भी नहीं हो पाया था, लेकिन उन्हें एडमिट वहीं करवाया था जहां पर कोविड मरीजों का इलाज चल रहा था. सारे लक्षण कोरोना वाले थे. उनकी मौत के बाद से उनके बच्चे और पत्नी हमारे साथ ही रहते हैं.
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नाम---अंजुम फातिमा
मृत्यु---26 अप्रैल
जगह--गोरखपुर
बयान---अंजुम के भाई
मेरी बहन की तो जिंदगी खत्म हुई ही है, उनका पूरा परिवार भी अब खत्म हो गया है. उनकी छोटी बच्चियां रह गई हैं अब. अंजुम 14 तारीख को ड्यूटी के लिए निकल गई थीं और फिर 15 अप्रैल की भी रात साढ़े तीन बजे काम कर घर वापस आई थीं. लेकिन तभी से उनकी तबीयत खराब रहने लगी थी. शुरुआत में लक्षण हल्के थे, इसलिए घर में इलाज करते रहे. लेकिन फिर 23 अप्रैल को जब ज्यादा सीरियस हो गईं तो अस्पताल में एडमिट करवा दिया. उनकी रिपोर्ट तो पॉजिटिव आ गई थी. 26 तारीख को उन्होंने दम तोड़ दिया. मैं पूरी तरह से इस चुनाव को ही जिम्मेदार मानता हूं. दो साल से सरकार कह रही है कि दो गज की दूरी जरूरी है, आप बताइए चुनाव में कहां थी दो गज की दूरी, अब जिन्होंने वोट डाला, जिन्होंने वोट डलवाया, कितने संक्रमित थे, कोई आंकड़ा नहीं है.
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नाम----दमयंती देवी
मृत्यु- 28 अप्रैल,
जगह--गोरखपुर
बयान- दमयंती के पति
मैं खुद अपनी पत्नी के साथ गया था उनकी ड्यूटी में. वहां से आने के बाद से ही उन्हें बुखार आना शुरू हुआ था. कुछ दिन तक तो हम घर में ही उनका इलाज करते रहे लेकिन फिर 24 अप्रैल को हमने उनका एंटीजन टेस्ट करवाया था. रिपोर्ट पॉजिटिव आई. इसके बाद 26 अप्रैल को हालत उनकी और ज्यादा खराब हो गई. हमें लगा कि उन्हें अस्पताल में एडमिट करवाना पड़ेगा. लगातार कोशिश करते रहे, कई अस्पतालों के चक्कर काटे, लेकिन कहीं जगह नहीं मिली. मेरी पत्नी ने एक अस्पताल के गेट पर ही अपना दम तोड़ दिया. एडमिट करने का तो मौका ही नहीं मिला. पहले वो बिल्कुल फिट थीं, लेकिन चुनाव के बाद ही कोरोना का शिकार हुईं और उनकी मौत हो गई. हमारा सबकुछ खत्म हो चुका है, कौन मदद करेगा, नहीं पता.
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नाम---केशव प्रसाद
मृत्यु- 28 अप्रैल,
जगह--गोरखपुर
बयान- केशव के बेटे
मेरे पिताजी ने पंचायत चुनाव की ड्यूटी में हिस्सा लिया था. पहले एकदम फिट थे, कोई ऐसी बीमारी वाली हिस्ट्री भी नहीं थी, लेकिन फिर जब से ड्यूटी कर आए थे, उनकी तबीयत खराब चलने लगी. कुछ दिन तो वे घर ही रहे, लेकिन फिर 26 अप्रैल को हमने गर्ग अस्पताल में एडमिट करवा दिया. वहां पर उनका प्रॉपर कोरोना टेस्ट नहीं हो पाया था. लेकिन अस्पताल ने हमें एक रसीद दी थी जिस पर लिखा था कि मेरे पिता को कोरोना हुआ है. उनका इलाज चल ही रहा था कि फिर 28 अप्रैल को वो हम सभी को छोड़कर चले गए. शिक्षक संगठन वालों ने हम से कुछ कागज मांगे थे, हमने उन्हें वो दे दिए हैं.
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नाम----नीति पांडे
मृत्यु--- 2 मई
जगह--गोरखपुर
बयान----नीति के पति
मेरी पत्नी गई थीं इलेक्शन ड्यूटी में. वहां से आने के बाद उन्हें बुखार चढ़ा और फिर दूसरी दिक्कतें भी होने लगीं. जब घर पर इलाज नहीं हो पा रहा था, फिर हमने 19 अप्रैल को ही उन्हें अस्पताल में एडमिट करवा दिया. कोरोना रिपोर्ट तो उनकी पहले ही पॉजिटिव आ गई थी. कई दिनों तक उनका इलाज अस्पताल में चलता रहा था. 19 को अस्पताल में एडमिट करवाए थे और फिर दो मई को उनका निधन हो गया. मैं आपको विश्वास से बता रहा हूं पहले वे बिल्कुल ठीक थीं. चुनाव के बाद ही उन्हें संक्रमण हुआ है और वो हमें छोड़ चली गईं. हमारी एक छोटी बच्ची भी है चार साल की जिसने अब अपनी मां को हमेशा के लिए खो दिया है. कुछ समझ नहीं आता क्या करें.
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नाम---किरण सिंह
मृत्यु- 26 अप्रैल
जगह--गोरखपुर
बयान--- किरण के बेटे
मेरी मां ने चुनाव ड्यूटी में हिस्सा लिया था. वहां से आने के दो से तीन दिन बाद उनकी तबीयत खराब होने लगी. फिर उनका कोविड रिपोर्ट भी पॉजिटिव आया. हमने उन्हें अस्पताल में एडमिट नहीं करवाया था, वो होम आइसोलेशन में थीं. घर पर ही ऑक्सीजन का इंतजाम कर दिया था. लग रहा था कि वो ठीक हो जाएंगी लेकिन फिर अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी और 26 तारीख को उनका देहांत हो गया. लेकिन हमें जो डेथ सर्टिफिकेट मिला है, उस पर कोविड से मृत्यु नहीं लिखा है. इसका कारण हम नहीं जानते हैं. मेरी मां के दो टेस्ट हुए थे और वो दोनों में पॉजिटिव आई थीं. हमने शिक्षक संगठन वालों को सारे जरूरी कागज दे दिए हैं.
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नाम---पुष्पा पांडे
मृत्यु- 14 अप्रैल
जगह--गोरखपुर
बयान---पुष्पा के बेटे
मेरी मम्मी 14 अप्रैल को ड्यूटी पर गई थीं. लेकिन ड्यूटी के दौरान उनकी तबीयत खराब हो गई थी. वहां पर जो रिपोर्टिंग ऑफिसर थे, उन्हें मैंने बोला था कि मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है, उनकी जगह किसी और को ड्यूटी पर रख लें. लेकिन वो नहीं माने. मम्मी को बहुत तेज बुखार था, मैंने उन्हें एक कुर्सी पर बैठा दिया था. फिर जब एसडीएम वहां पर आए तो उनको भी मैंने अपनी मम्मी की तबीयत के बारे में बताया. उनके सामने उस रिपोर्टिंग ऑफिसर ने झूठ बोल दिया कि हां वो मेरी मम्मी को जल्दी छोड़ देंगे. जबकि वो पहले मना कर रहे थे. फिर मेरी मम्मी बेहोश हो गईं. ऐसे मैंने कुछ लोगों की मदद ली और उन्हें अस्पताल लेकर गए. वहां से उन्हें दूसरे अस्पताल के लिए रेफर कर दिया गया. वहां पहुंचते ही उनकी मौत हो गई.
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नाम--शिवादित्य चौबे
मृत्यु- 23 अप्रैल,
जगह--वाराणसी
बयान- शिवादित्य की पत्नी
मेरे पति ड्यूटी के लिए गए थे. लेकिन वहां उन्हें काफी तेज बुखार हो गया था. तब उन्होंने अपनी ड्यूटी कटवा ली थी. फिर 21 अप्रैल को हमे उन्हें अस्पताल में एडमिट करवाना पड़ गया था. उनकी हालत काफी सीरियस हो गई थी. उनकी कोविड रिपोर्ट भी पॉजिटिव थी. उनकी तबीयत बस बिगड़ती रही और फिर 23 को वो चल बसे. वो इस घर में अकेले कमाने वाले थे. उन्हीं के खर्चे पर ये घर चलता था. बच्चे भी हैं, बुजुर्ग भी हैं, अब कैसे सबकुछ होगा. हमारा सबकुछ खत्म हो गया है. मेरे बच्चे अनाथ हो गए.
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नाम----द्वारिका सिंह
मृत्यु- 25 अप्रैल,
जगह--वाराणसी
बयान- द्वारिका सिंह के बेटे
मेरे पिता ने पंचायत चुनाव की ड्यूटी की थी. उस ड्यूटी के बाद से ही उन्हें बुखार चढ़ गया था. हम तो पिताजी को कह रहे थे कि किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाते हैं, लेकिन तब उन्होंने बोला कि उनकी तबीयत ज्यादा खराब नहीं है. ऐसे में हमने भी उन्हें कुछ दवाई लाकर दे दी थीं. वो कह रहे थे कि वो बेहतर महसूस कर रहे हैं. लेकिन फिर अचानक से उनकी तबीयत खराब हो गई. हम एक डॉक्टर को जानते थे तो उन्हीं के पास ले गए. उस डॉक्टर ने मेरे पिता के इलाज से मना कर दिया. मैं पूछता रह गया कि क्यों नहीं करेंगे इलाज. हमारे बार-बार कहने पर उन्होंने मेरे पिता को देखा और देखते ही कह दिया कि उन्हें किसी बड़े अस्पताल में तुरंत एडमिट करवाएं. फिर हम उन्हें BHU लेकर गए,लेकिन वहां भी कह दिया गया कि ऑक्सीजन नहीं है. हमारे पिता ने दम तोड़ दिया. हालात इतने खराब थे कि हमारे परिवार के 7 और सदस्य कोरोना का शिकार थे. उस बीच मेरे पिता गुजर गए.
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नाम----सुनील चक्रवाल
मृत्यु- 21 अप्रैल
जगह--वाराणसी
बयान--- सुनील के बेटे
मेरे पिता पीठासीन थे और उनकी चुनाव के दौरान काफी जिम्मेदारी थी. वो 19 अप्रैल को ड्यूटी पर गए भी थे. लेकिन वहां पर अचानक से उन्हें चक्कर आ गए और वो गिर पड़े. वहां पर जो उनके दूसरे साथी मौजूद थे उन्होंने अधिकारियों को बताया भी कि हमारे पीठासीन की तबीयत खराब हो गई है. लेकिन किसी ने कोई मदद नहीं की. उन्होंने बस इतना कह दिया कि उन्हें लेटा दो. अब मेरे पिताजी को स्कूल के अंदर भी नहीं, बाहर सड़क पर किनारे पर लेटा दिया गया. वो तेज धूप में ऐसे ही पड़े रहे. फिर हमें दोपहर किसी तीसरे इंसान ने बताया कि हमारे पिताजी सड़क किनारे लेटे हुए हैं. हम तुरंत उनके पास गए और फिर उन्हें पास एक अस्पताल में लेकर गए. लेकिन उस अस्पताल में ज्यादा सुविधा नहीं थी, ऐसे में जब पापा की हालत ज्यादा बिगड़ी तो हम उन्हें BHU लेकर गए, लेकिन वहां पर कोई बेड खाली नहीं था. बड़ी मुश्किल से वेंटिलेटर मिला. फिर पापा का इलाज शुरू तो हुआ लेकिन हालत काफी सीरियस थी. 20 अप्रैल को तो उनके चेस्ट में काफी इंफेक्शन फैल गया था. कुछ ही देर में उन्होंने दम तोड़ दिया.
नाम---हौसला प्रसाद
मृत्यु--- 20 अप्रैल
जगह--प्रयागराज
बयान--- हौसला के छोटे भाई
हौसला जी ने चुनाव ड्यूटी में हिस्सा भी लिया था और वे बिल्कुल ठीक भी थे. चुनाव से पहले तक उन्हें कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन जब वो अपनी ड्यूटी कर वापस आए थे तो उन्होंने कहा था कि वो ठीक महसूस नहीं कर रहे. अब हमें लगा कि कोरोना का टाइम है, इसलिए छोटे डॉक्टर को दिखाने का फायदा नहीं. फिर हमने 19 अप्रैल को ऑनलाइन ही रात में अपॉइंटमेंट बुक किया और फिर सुबह उनको ले जाने की तैयारी थी. अब हम पर वो एक दिन ही भारी पड़ गया. 20 तारीख को हम उनको लेकर जा ही रहे थे कि बीच में उन्होंने दम तोड़ दिया. हम उनका इलाज करवा पाते, उससे पहले ही वे दुनिया छोड़ चले गए. सबकुछ इतना जल्दी हुआ कि कोरोना का टेस्ट भी नहीं करवा पाए लेकिन लक्षण सारे वही थे. अब जब उनकी मौत हो गई है तो सरकार से तो कोई मदद नहीं मिल रही है, लेकिन लोकल में ही कुछ मास्टर रहते हैं, उन्होंने कुछ रुपये दिए हैं.
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नाम---नीलम दोहरे
मृत्यु- 24 अप्रैल
जगह--प्रयागराज
बयान--- नीलम की बेटी
मेरी मां की ड्यूटी के दौरान ही तबीयत खराब हुई थी. 15 को चुनाव था, लेकिन वो एक दिन पहले 14 को काम करने के लिए पहुंच गई थीं. उसी दिन उनकी तबीयत भी खराब हो गई थी. उन्हें बहुत तेज बुखार था. मेरी मां ने अपनी ड्यूटी कैंसिल करवाने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन बात नहीं बनी. सिर्फ कुछ ही दिनों के अंदर मेरी मां का ऑक्सीजन लेवल काफी ज्यादा गिर गया. उन्हें कई अस्पतालों में ले जाने की कोशिश रही, लेकिन कहीं जगह नहीं मिली. उनका ऑक्सीजन लेवल काफी कम होता जा रहा था. फिर किसी तरह हमने उन्हें जीवन ज्योति अस्पताल में एडमिट करवाया. लेकिन वहां भी एडमिट करने से पहले ही मुझे फीस जमा करनी पड़ी. अस्पताल की तरफ से कुछ एंटीजन टेस्ट करवाया गया लेकिन हमें उसकी रिपोर्ट नहीं मिली. डॉक्टर ने बताया था कि मेरी मां के लंग्स में इंफेक्शन काफी ज्यादा फैल चुका था. हालात ऐसे हो गए थे कि अस्पताल में डॉक्टरों ने मेरी मां के बेड को दूसरे मरीजों के बेड से दूर करना शुरू कर दिया. फिर मैंने 23 अप्रैल की रात में डॉक्टरों से पूछा भी कि आप ऐसे सारे बेड मेरी मां से दूर क्यों कर रहे हैं, तो उन्होंने बस यही बोला कि कोरोना का शक है. उन्होंने कोई टेस्ट नहीं करवाया. मां का ऑक्सीजन 10 से 15 के बीच में चल रहा था. वेंटिलेटर मिल भी जाता तो भी मैं अपनी मां को नहीं बचा पाती. इस चुनाव ने सबकुछ खत्म कर दिया है. ट्रेनिंग के दौरान भी प्रशासन की तरफ से कोई सुविधा नहीं दी गई थी. कोरोना के दौरान भी मेरी मां बस से गई थीं. खाना भी ये लोग थैले में देते थे. कोई सोशल डिस्टेंसिंग नहीं होती थी. सब जगह लापरवाही थी. उसी लापरवाही की वजह से मेरी मां जिंदा नहीं है. मैं बड़ी बेटी हूं, घर में कोई भी कमाने वाला नहीं है. पिता की तबीयत भी ठीक नहीं रहती है. मां के जाने के बाद सब बिखर गया है.