कोरोना महामारी के दौर में डॉक्टर्स और पुलिस ने वॉरियर्स की भूमिका तो निभाई ही. लेकिन मीडिया भी एक योद्धा की तरह आगे डटी रही. लगातार यह बताने में जुटी रही कि कहां पर क्या कमी है. इसी की एक मिसाल भर है यह स्टोरी. आजतक पर 16 मई को मेरठ के गांव की एक कहानी बताई गई थी.
दरअसल आजतक की टीम उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से गांव में कोरोना के कहर की ग्राउंड रिपोर्टिंग करते हुए मेरठ के अम्हेड़ा गांव पहुंची. जहां पर पता चला है कि पिछले 10 से 12 दिनों में 6-7 लोगों की मौत हो गई. गांव के प्रधान रॉबिन सिंह के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांव से नदारद हैं.
परिजनों ने बताया कि गांव में बने स्वास्थ्य केन्द्र में बड़ी घास और ताला लगा है. आजतक की टीम ने भी PHC का मुआयना किया. इसका नतीजा यह हुआ कि खबर दिखाने के बाद जिला प्रशासन ने गांव की सुध ली और अस्पताल में काम शुरू हुआ. गांव के प्रधान रोबिन सिंह सिवाच ने आजतक का धन्यवाद करते हुए कहा कि यहां की हालत दिखाने के बाद ही प्रशासन की नींद टूटी और इस PHC का कायाकल्प शुरू हुआ है.
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16 मई को गांव वालों ने बताया था PHC की कहानी
इससे पहले गांव के प्रधान रॉबिन सिंह ने बताया था कि स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांव से नदारद हैं. उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग से हमने गुहार लगाई है कि गांव में लोगों की टेस्टिंग बढ़ाई जाए पर कोई सुनवाई नहीं हुई. जिस तरीके की कंडीशन है गांव के लोगों में भय का माहौल है. गांव के प्रधान ने यह भी कहा कि लोगों को टेस्टिंग कराने के लिए प्राइवेट लैब में जाना पड़ रहा है. यहां टेस्टिंग की कोई व्यवस्था नहीं है, जिस वजह से गांव के अंदर कोरोना ट्रेसिंग करना मुश्किल हो रहा है.
आजतक की टीम ने भी इस गांव के एक परिवार से बातचीत की थी. जिससे ये पता चला कि उसके घर के शीशपाल वर्मा की मौत सांस लेने में तकलीफ की वजह से हुई. इलाज के दौरान जब ऑक्सीजन सिलेंडर खाली हो गया तो वो दोबारा नहीं मिला. कोरोना और कोरोना जैसे लक्षण के चलते गांवों में कई परिवार उजड़ गए हैं.
शीशपाल की मौत कुछ दिन पहले गांव में ऑक्सीजन न मिलने की वजह से हुई थी. घर वालों के मुताबिक, गांव के लोगों ने सिलेंडर की व्यवस्था की, लेकिन वो 4 घंटे तक ही चला. उसके बाद वह भी खत्म हो गया. दोबारा जब भरवाने के लिए गए तो वो रिफिल नहीं हो सका और ऑक्सीजन की कमी की वजह से शीशपाल की मौत हो गई.
परिजनों ने बताया कि गांव में बने स्वास्थ्य केन्द्र में बड़ी घास और ताला न लगा होता तो शायद एक बेटा अपने बाप को नहीं खोता. आजतक की टीम उत्तर प्रदेश के जिन गांवों में गई वहां के हर एक PHC का यही हाल देखा, जहां न तो डॉक्टर है और न ही नर्स. अगर यहां सही व्यवस्था होती तो गावों में जो लोगों की जान जा रही है शायद वो न जाती.