सात फरवरी, 1968 को इंडियन एयरफोर्स के ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट AN12 ने चंडीगढ़ से लेह के लिए उड़ान भरी थी. लेकिन मौसम खराब होने के कारण हिमाचल प्रदेश के रोहतांग रेंज के अंतर्गत ढाका ग्लेशियर में क्रैश हो गया. छह क्रू मेंबर और सिपाही नारायण सिंह बिष्ट समेत एयरक्राफ्ट में सवार 102 लोगों का कुछ पता नहीं चल सका.
1967 में आखिरी बार घर से ड्यूटी पर हुए थे रवाना
उत्तराखंड में चमोली जिले के थराली विकासखंड के कोलपुड़ी गांव के रहने वाले नारायण सिंह सेना के मेडिकल कोर में तैनात थे. सन 1962 में उनकी शादी गांव की ही बसंती से हुई थी. एक आम फौजी की तरह नारायण सिंह भी सालभर में एक बार छुट्टी पर घर आते थे. 1967 में वे आखिरी बार घर से ड्यूटी के लिए गए थे. परिवार में माता-पिता और पत्नी ही थे.
बसंती देवी और शहीद नारायण सिंह (फाइल फोटो)
परिजनों के लिए गुमशुदा की तरह ही थे
56 साल पहले हादसे के दिन यानी सात फरवरी, 1968 को बर्फीली घाटी में सेना के जवानों समेत 102 लोग ऐसे गायब हुए कि ये तक खबर नहीं लगी इनमें से कोई जिंदा भी है या नहीं. लेकिन परिजनों तक हादसे की खबर जरूर पहुंची. इस हादसे का शिकार हुए लोगों में नारायण सिंह के लापता होने की खबर पहुंच गई थी. इसलिए इतने साल वे अपने परिजनों के लिए गुमशुदा की तरह ही थे.
पत्नी बसंती देवी की जिंदगी ने कैसे ली करवट?
जब परिवार तक खबर पहुंची तो पत्नी और माता-पिता समेत गांव वाले सकते में आ गए. हालांकि खबर सिर्फ लापता होने की आई थी. ऐसे में परिवार को आस थी कि आज नहीं तो कल नारायण सिंह लौट आएंगे. अगले 10 साल इंतजार में बीत गए. माता-पिता ढलती उम्र के साथ बीमार रहने लगे, घर में उनके अलावा बहू(बसंती देवी) थीं. घर-परिवार चलाने का संकट आ गया. ऐसे में नारायण सिंह के माता-पिता ने अपने भतीजे भवान सिंह को गोद ले लिया. हालातों के चलते बहू बसंती को उनकी धर्मपत्नी के रूप में रखा गया. वक्त बीता तो परिवार आगे बढ़ा. बसंती देवी की 5 बेटियां और दो बेटे हुए.
छोटे बेटे जयवीर सिंह ने aajtak.in से खास बातचीत में बताया कि जबसे उन्होंने होश संभाला, वे अपने ताऊ नारायण सिंह और उनके साथ हुए हादसे के बारे में सुनते आए हैं. उनकी मां बसंती देवी भी इसका जिक्र करती थीं. पूरा परिवार नारायण सिंह की कोई खबर आने की आस अब भी लगाए बैठा था. लेकिन बेटे के इंतजार में पहले माता-पिता और फिर साल 2011 में पत्नी बसंती भी चल बसीं.
नारायण सिंह लौटे, लेकिन तिरंगे में
जयवीर सिंह बताते हैं कि उनकी मां ने जिंदगी के आखिरी वक्त में भी नारायण सिंह से जुड़ी किसी खबर पाने की आस का दामन न छोड़ा था और फिर वो दिन भी आया, जब 56 सालों बाद किसी अच्छी खबर की आस टूटने के साथ ये इंतजार भी खत्म हुआ. 1 अक्टूबर, 2024 को सेना की ओर से एक चिट्ठी आती है. जिसमें बताया गया कि सेना के लापता सिपाही नारायण सिंह बिष्ट का शव रोहतांग दर्रे से बरामद हुआ है. इस तरह नारायण सिंह लौटे, लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए.
खोजबीन के लिए की गईं कई कोशिशें
दरअसल 1968 में हुए विमान हादसे के बाद अलग-अलग वक्त में इसमें सवार लोगों से जुड़ी खोजबीन जारी रही. कई कोशिशें हुईं. साल 2003 में अटल बिहारी बाजपेयी पर्वतारोहण संस्थान के पर्वतारोही दल ने लाहौल-स्पीति में मलबे में दबे अवशेष खोज निकालने शुरू किए थे. वहीं, कुछ दिन पहले डोगरा स्काउट और तिरंगा माउंटेन रेस्क्यू की ज्वाइंट टीम को बर्फीले मलबे से चार और अवशेष मिले. जिनमें सिपाही नारायण सिंह के अलावा मलखान सिंह और थामस चेरियन की पहचान हो चुकी है.
56 साल पहले हुई मौत, अबतक कैसे रहा सुरक्षित शव?
यहां हैरान करने वाली बात ये थी कि शहीद जवान के शव पर अब भी सेना की वर्दी और उस पर लगी नेम प्लेट लगभग सलामत हालत में थे. जेब में एक कागज भी मिला. जिसमें नारायण सिंह के गांव के साथ उनकी पत्नी बसंती देवी का नाम भी था. सेना के अफसरों के मुताबिक, कई साल पहले मौत होने के बावजूद भी शव बर्फ में होने की वजह से काफी हद तक सुरक्षित था.
3 अक्टूबर को नारायण सिंह का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव कोलपुड़ी पहुंचा. जयवीर सिंह ने बताया कि 56 साल बाद शहीद के पार्थिव शरीर के आते ही इस वीर सपूत की शहादत पर पूरा गांव भारत माता के जयकारों से गूंज उठा. पूरे सैन्य सम्मान के साथ नारायण सिंह को अंतिम विदाई दी गई. जयवीर सिंह का कहना है कि उनकी मां के आखिरी सांस लेने तक उनकी आंखों में इंतजार साफ देखा जा सकता था. उनके जीवित रहने तक हमें सरकार की ओर से कोई सुविधा नहीं दी गई. अगर आज मां जीवित होतीं तो उन्हें शहीद की पत्नी का दर्जा मिलता.