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छोटे शहरों में नगर पालिका, नगर निगम की गाड़ी घरों से कचरा लेने आती है. 'गाना बजता है, गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल'. इस गाने पर मीम तो बहुत बन गए. रील भी बहुत बन गई. लेकिन फिर भी आज हिमालय की तलहटी से लेकर ऊपर तक कूड़े का पहाड़ बनता जा रहा है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि ऐसा कौन कर रहा है? अगर इसे अभी से हटाया नहीं गया तो सांस्कृतिक, धार्मिक से लेकर सामाजिक ढांचे तक पर भविष्य में मुसीबतों का बहुत बड़ा पहाड़ टूटकर गिरेगा.
दरअसल, इन दिनों पहाड़ों पर बर्फ गिर रही है. सब बर्फबारी का मजा लेना चाहते हैं. गर्मी में पहाड़ पर मैगी खाकर फोटो डालना मोबाइल संस्कृति की परंपरा बन चुकी है. लेकिन हिमालय के उन्हीं शहरों में कूड़े का पहाड़ क्यों बनाया जा रहा है? हिमालय की शिवालिक ऋंखला से घिरे ऋषिकेश के लोगों ने आजतक को चिट्ठी लिखी. ऐसे में जरूरी है कि पूरे देश में इस समस्या को सबके सामने लाया जाए. गंगा किनारे, हिमाचल की तलहटी वाले ऋषिकेश को कूड़े के पहाड़ से आजादी दिलाई जाए.
दिल्ली में अक्सर कूड़े के पहाड़ की चर्चा होती रहती है. लेकिन अब ये कूड़े का पहाड़ वहां बना है, जहां गंगा बहती है. कचरानुमा ऊंचा पहाड़ वहां खड़ा है, जहां से हिमालय दिखता है. ऋषिकेश के बीचों बीच कूड़े का पहाड़ बन चुका है, जहां लोग गंगा में रिवर राफ्टिंग करने के लिए जाते हैं. ये कूड़ा उसी ऋषिकेश का है, जहां लोग मैदानी इलाकों में थकान महसूस करने के बाद तरोताजा होने गंगा किनारे जाते हैं. ये कूड़ा उसी ऋषिकेश का है, जो ऋषियों की तपोस्थली, योग की मशहूर स्थली कहा जाता है.
ऋषिकेश में 22 साल से खड़ा होता जा रहा कूड़े का पहाड़
ऐसे में अब ऋषिकेश के लोग ही पूछ रहे हैं कि उन्हें क्यों उनके घरों के पास ही हिमाचल की तलहटी में कूड़े का पहाड़ ऊंचा और ऊंचा किया जा रहा है? इसीलिए ऋषिकेश में 22 साल से खड़े होते कूड़े के पहाड़ की समस्या के बारे में बताना जरूरी है. क्योंकि गंगा नदी से केवल 70 मीटर की दूरी पर सैकड़ों टन कूड़ा इकट्ठा है. ऋषिकेश में कूड़े का पहाड़ है. जिस ऋषिकेश में लोग राफ्टिंग,कैंपिंग, योगा, शांति के नाम पर जाते हैं, उसी ऋषिकेश के लोगों के सामने दो दशक में धीरे धीरे खड़ा होता कूडे का पहाड़ मुसीबत बनता जा रहा है. इसकी ऊंचाई 52 फीट से ज्यादा अब बताई जाती है.
पहाड़ों पर धीरे धीरे जमा होता कूड़े का पहाड़ है ऋषिकेश से लेकर केदारनाथ तक में पहाड़नुमा चिंता खड़ी करता जा रहा है. कोर्ट तक जिस कूड़े को लेकर चिंतित है, वहां अब सरकार कहती है कि लालपानी में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट वाला प्लांट तैयार होते ही जल्द ही इस कूड़े को वहां पहुंचाया जाएगा.
आखिर शहरों में कैसे बनते जा रहे कूड़े के पहाड़?
ऋषिकेश हो या देश के दूसरे शहर. पहले जिन इलाकों को शहर का बाहरी हिस्सा मानकर कूड़े का डंप किया जाता रहा. वहां पहले तो कभी वेस्ट मैनेजमेंट पर ध्यान नहीं दिया गया. नतीजा कूड़ा पहाड़ जैसा होता गया और आबादी बढ़ी तो शहर से बाहर आती गई. परिणाम सबके सामने है. हिमालय तक अब कूड़ा इकट्ठा होता जा रहा है. समाधान जल्द नहीं हुआ तो भविष्य में भुगतना नागरिकों को होगा.
शहरों में कचरे के पहाड़ों को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार ने तीन हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की योजना शुरू करते हुए राज्यों से यह अपेक्षा की थी कि वे भी अगर बराबर का साथ दें तो कचरे के पहाड़ों को समाप्त किया जा सकता है, लेकिन राज्यों की ढिलाई की वजह से ये कोशिश धीमी शुरुआत की शिकार हो गई है. अनुमान है कि लगभग 15 हजार एकड़ जमीन देश में अलग-अलग कूड़े के पहाड़ों में फंसी हुई है.
दिल्ली से लेकर बंगाल तक समस्या एक जैसी
शहरी विकास के विशेषज्ञ देश में लगभग पांच लाख टन कूड़ा रोज निकलने की बात करते हैं. दावा है कि देश में केवल गुजरात और तमिलनाडु ने अपने राज्यों से कूड़ा निस्तारण की योजना पर बड़े स्तर पर काम किया. यहां तक कि दिल्ली को तो गुजरात से ही सीख लेनी चाहिए, क्योंकि गुजरात ने दिल्ली जितना कूड़ा तीन साल में खत्म किया है. लेकिन दिल्ली में तीन कूड़े के पहाड़ को खत्म करने की समय सीमा बार बार बढ़ाई जाती रही है. अब लक्ष्य 2028 तक का तय हुआ है. बंगाल में तो 143 लाख टन कचरा जमा है और तीन साल में केवल नौ लाख टन का निस्तारण हुआ है.
क्यों चुनावी मुद्दा नहीं बनता कूड़ा?
जमीन प्रदूषण, जल प्रदूषण, वायु प्रूदषण से लेकर तमाम बीमारियों की वजह ये कूड़े के पहाड़ बनते हैं लेकिन ना तो ये बड़े चुनावी मुद्दे होते हैं और ना ही जन आंदोलन की जमीन बना पाते हैं. नतीजा कूड़े के पहाड़ को बनने दिया जाता है. लेकिन हिमालय की तलहटी वाले ऋषिकेश से लेकर दूसरे पहाड़ी शहरों में इस समस्या को नहीं समाप्त किया गया तो भविष्य में पहाड़ सिर्फ नहीं टूटेगा बल्कि कूड़े का पहाड़ टूटेगा.