उत्तराखंड के जंगलों में धधक रही आग पूरी तरह से काबू में नहीं आ रही है. यहां जंगलों को बचाने के लिए राज्य सरकार भरसक प्रयास कर रही है. हेलीकॉप्टर के साथ ही आर्मी की भी मदद ली जा रही है. अब उत्तराखंड सरकार ने जंगल में आग की घटनाएं रोकने के लिए एक और पहल की है. सरकार यहां ग्रामीणों से चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली पेड़ की पत्तियां (पिरूल) खरीद रही है.
उत्तराखंड सरकार पिरूल को 50 रुपये प्रति किलो की दर से खरीद रही है. इसके बाद अब बड़ी संख्या में ग्रामीण जंगलों में परुल इकठ्ठा कर सरकार को बेच रहे हैं. चीड़ के पेड़ से सूखकर ये पत्ते गिरते हैं. जब जंगलों मे आग लगती है तो इन पत्तियों के जरिए आग बेहद तेजी से फैलती है. जंगलों में आग फैलने की सबसे बड़ी वजह इन्हीं पत्तियों को माना जाता है.
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बीते दिनों मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों के साथ बड़ी बैठक कर ग्रामीणों से परुल खरीदने की घोषणा की थी. इसके बाद पिरूल लाओ, पैसे पाओ अभियान चलाया गया. अब ग्रामीण बड़ी संख्या में जंगलों से पिरूल इकठ्ठा कर रहे हैं और सरकार को 50 रुपये प्रति किलो की दर से बेच रहे हैं.
दरअसल चीड़ की पत्तियां, जिन्हें पिरूल कहा जाता है, गर्मी होते ही वह हवा के साथ पेड़ों से झड़ने लगती हैं. इनमें आग बहुत तेजी से फैलती है. गर्मी के सीजन में चीड़ के जंगलों में लीसा निकालने का सीजन शुरू हो जाता है. लीसा इतना ज्वलनशील होता है कि उसमें लगी आग पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है.
सरकार ने लोगों से की थी अपील
बीते दिनों सोशल मीडिया पर सरकार की ओर से कहा गया था कि रुद्रप्रयाग पहुंचकर जंगल में बिखरी हुई पिरूल की पत्तियों को एकत्र करते लोगों को जुड़ने का संदेश दिया गया. पिरूल की सूखी पत्तियां वनाग्नि का सबसे बड़ा कारण होती हैं. जनता से अनुरोध है कि आप अपने आस-पास के जंगलों को बचाने के लिए युवक मंगल दल, महिला मंगल दल और स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर इसे अभियान के रुप में संचालित करने का प्रयास करें.
50 करोड़ का फंड अलग से रखा गया
वनाग्नि को रोकने के लिए सरकार 'पिरूल लाओ-पैसे पाओ' मिशन पर भी कार्य कर रही है. इस मिशन के तहत जंगल की आग को कम करने के उद्देश्य से पिरूल कलेक्शन सेंटर पर ₹50/किलो की दर से पिरूल खरीदे जाएंगे. इस मिशन का संचालन पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड द्वारा किया जाएगा. इसके लिए ₹50 करोड़ का कार्पस फंड पृथक रूप से रखा जाएगा.